पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४३३

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• विद्याकर वाजपेयों-विद्यापन ""अपवर्ग अर्थात् मोक्षलाभ होता है और सभी क्लश दूर जाते द्वारा ख्यात, वह जो विद्या द्वारा मशहूर हो, विद्वान् । ___ हैं। हातपय ब्रह्मविदा परांविद्या है । उपनिषद् नामक विद्यातीर्थ (सं० क्लो०) १ महाभारतके अनुसार एक प्रसिद्ध ग्रन्थ वा शब्दराशि प्रतिपादित ब्रह्मविषयक विज्ञान प्राचीन तीर्थका नाम । (पु०) २ तैत्तिरीयकसारके रच. हो परराविधा है। यह पराविद्या ऋग्वेदादि नामसे प्रसिद्ध पिता। ३ शङ्कराचार्य सम्प्रदायके वो गुरु। शब्दराशि वा तत्प्रतिपाद्य विषयके शानसे श्रेष्ठ है। विद्यातीय शिष्य-जोपन्मुक्तिश्विकके रचयिता। ये हो 'ऋग्वेदादि शब्दराशि या तत्प्रतिपाद्य विषय अर्थात् , सुप्रसिद्ध भाष्यकार सायणाचार्य थे। • कर्मका मान भी विद्या तो है, किन्तु यह अपरा विद्या है। विधात्य (सं० क्लो०) विद्यायाः भायः त्व। विद्याका ब्रह्मविदुषा फर्मविद्यासे उत्कृष्ट है। कर्मायया स्वयं स्वतन्त्र- रूपमें अर्थात् उस समय फल नहीं देतो। कर्म का अनुः विद्यादत्त-पक कयि । ये कायस्थतातीय तथा विजयपुर- टान करनेसे उसका फल किसो दूसरे समय होता है। राज जयादित्यकी सभामें मौजूद थे। कर्मफल विनश्वर है। किन्तु ब्रह्मविद्या स्वतन्तभाधम | विद्यादल (सं० पु०) भू यक्ष, भोजपत्रका पेड़। उसी समय संसारनिवृत्तिका भी फल देती है, फिर भी विद्यादाता (सं०वि०) विद्यादातृ देखो। ' यह फल विनाशो नहीं है। इस कारण वेदविद्या और विद्यादातृ (सं०नि०) विद्यां ददातीति दातृच् । १ विद्या कर्मविद्यासे ब्रह्मयिया श्रेष्ठ है। शिक्षा देनेवाला । २ पांच पिताके अन्तर्गत एक पिता। "तताएरा ऋग्वेदो यजुवेंदो सामवेदोऽथर्ववेदः, अन्नदासा, भयत्राता. पत्नी के पिता, विद्यादाता और • शिक्षा कल्पो ध्याकरणं निरुक्त छन्दो ज्योतिमिति ।" जन्मदाता ये पांच पितृतुल्य हैं। (प्रश्नोपनि०) विद्यादान (सं० क्लो०) विद्यायां दानं । १यिया देना, इसका तात्पर्य यह है, कि ऋग्वेद, सामवेद, यजुवेंद, शिक्षा देना। ३पुस्तक देना। विद्या शब्द देखो। अथ वेद, शिक्षा, फल्प, ध्याकरण, निरुक्त, छन्दा, ज्योतिष विद्यादायाद ( सं० पु०) विद्याका उत्तराधिकारी, शिष्य इन सोका विज्ञान तथा तत्प्रतिपाद्य कर्मविज्ञान अपरा• 'परम्परा। विदया है। विद्यादास-ग्रजवासी एक वैष्णवकवि । १५६३ ई० में ५ देवीमन्त। . . . . इनका जन्म हुआ था। विद्याकर बाजपेयी-माचारपद्धतिफे रचयिता रघुनन्दनने विद्यादेवी (सं० स्त्रो०) विद्या अधिष्ठात्री देवो। १ सर. माधिगतितत्समें इनका वचन उद्धत किया है। । सतो । २ जैनियों की सोलह जिनदेवियों में से एक देवाका विद्याकर मिश्र मैग्रिल-क्षमझाय्य के टोकाकार। .. नामा । विद्यागण (सं० पु. ) धौद्वग्रन्थावलोविशेष । । विद्याधन ( सं० क्लो) विषया अर्जितं धनं । विद्या विद्यागम (सं० पु०) विद्यायाः आगमः । विद्यालाम । द्वारा उपार्जित धन ! यह घन अविभाज्य है. कोई भी इसे विद्यागुरु (सं० पु०.) यह गुरु जिससे विद्या मिली हो, वांट नहीं सकता। इसको सोपार्जित धन कहते हैं । पढ़ानेवाला गुरु, शिक्षक। विद्यालब्ध (छात्रवृत्ति )धन, मित्रलब्ध (विवाहके 'विद्यागृह (सं० पु०) यह स्थान जहां विद्यागिक्षा दी जाती · समय शाशुर आदिस प्राप्त ) धन तथा माविज्यलब्ध है, विद्यालय, पाठशाला। (पौरोहित्य क्रियालम्प) धन दायादा.दे अर्थात् हिस्सेदार विद्याचक्रवत्तों-सम्प्रदायप्रकागिनो नामको काव्यप्रकाश 'द्वारा विमन नहीं होगा। . .:- टोकाके रचयिता। पण रख कर जो धन प्राप्त किपा जाता है अर्थात् विधाचण (स० पु. ) विद्याचुत देखो। किसो एक विषयको गीमांसा करनेके लिये विद्वान् विद्याचुञ्चु (सं० पु०) विद्यया वित्तः विद्या (तेन वितरचु- यक्तिक पाम उपस्थित हो उनसे कहा जाय, "आप इस • अपचनपी 1 पा ५२१२६ ) इनि चनप चुञ्चुप चा विद्या विषयको स्थिर कर दीजिये, मैं यह पण रखता हूं, Vot XXI. 92