पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४४७

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विधानगर ३७७ विद्यानगरके सिंहासन पर बैठे थे। इनके सेनानायक | वापरला नगरम तथा विजप्रवाहाके कनकदुर्गा-मन्दिरमें रामराजने कर्नूल जा कर यहांके दुर्गाध्यक्ष यूसुफ आदिल | पाया गया है । १५२६ ई० में इन्होंने नरसिंहमूर्तिकी संघीयकको समरमें परास्त किया, पोछे ये दुर्गको अधिः । स्थापना की। कार कर लस्कर (जागोरदार) रूपमें कार्य करने लगे। | कृष्णदेवरायने पश्चिममें कृष्णा, उत्तम श्रीशैल, पूर्व. इम समय चोर नरसिंहेन्द्र के बैमानेय माता कृष्णदेवराय में कोएडवाड, दक्षिण में तनापुर और मदुरा तक अपना उनके मन्त्रीके कार्याने नियुक्त हुए थे। कृष्णदेवरायकी। राज्य फैलाया था। उन्हों के शासनकालमें मदुराम नायक असाधारण क्षमता थी। तेलगूभाषामें कृष्णदेयका | राज्य प्रतिष्ठित हुआ था। कृष्णदे बने संस्कृत और तेलङ्ग प्रशंसासूचक बहुत-सी कविताएं देखो जाती हैं। भाषाको उन्नतिके लिये धड़ी चेष्टा की थी। उनकी सभा कृष्णदेव राय। में अट दिग्गज पण्डित रहते थे। कृष्णदेव इधर जैसे कृष्णदेवको पक कवितासे जाना जाता है, कि १४६५. | चोर थे, उधर उनकी भगवद्भक्ति भी यथेष्ट थी। महाराज ई० में कृष्णदेव रायालुका जन्म हुआ। विद्यानगरके प्रतापरदने चेष्णय जान कर उनके हाथ अपनी कन्याको राजाओंके इतिहासमें कृष्णदेवरायका.नाम बहुत प्रसिद्ध | समर्पण कर दिया था। इसके सिवा उनकी और भी हैं। इन्होंने १५०६ से १५३० ई० तक प्रवल पराक्रम | एक स्त्री थी। चिन्नादेवीसे एक कन्याने जन्मग्रहण और अदम्य उत्साहरू राज्यशासन किया । इनके शासन- किया । कृष्णदेव १५३० ई० में परलोकको सिधारे । मृत्यु के समय विद्यानगरको समृद्धि बहुत चढी पढ़ी थी।। के समय इन्हें एक भी पुत्र न था। कृष्णदेवने उत्तरमें कटक पर्यन्त अपनो विजयपताका फह - अच्युत। राई थी। इन्होंने उड़ीसाके सुविख्यात वैष्णव राजा कृष्णदेव रायालुको मृत्युफे बाद अच्युतेन्द्र रायालु प्रतापरुद्र देवको कन्यासे विवाह किया । १५१६ ई० विजयनगरके सिंहासन पर बैठे । १५३० से १५४२ ई० उडोसाराज के साथ इनकी जो सन्धि हुई उससे उड़ीसा तक इन्होंने राज्य किया। अन्युन राय और कृष्णदेव राज्यकी दक्षिण सीमा कोन्दापरली विजयनगरको उत्तर रायको ले कर भगत मतभेद देखा जाता है । एक तान्न सोमा रूपमे निर्दिष्ट हुई। इन्होंने पहले द्वाविदेशको | शासनसे मालूम हुआ है. कि अव्युत राय कृष्णदेव राय- अपने राज्यमें मिला लिया । महिसुरके उमातुरके गङ्गा के वैमात्रेय भाई थे। कृष्णदेयके पिता नरसिंहने भोवि. राजने इनको अधीनता स्वीकार की। इस युद्ध में शिव- म्विका नामको एक और स्त्रीका पाणिग्रहण किया था। समुद्रका दुर्ग और श्रीरङ्गपट्टन इनके हाथ लगा। इनके इस स्त्रीके गर्मसे नरसिंहके जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसोका बाद सारा महिसुर इनके अधिकारमें गा गया। १५१३ | नाम अच्युत वा अच्युतंद्र था। कृष्णदेवफे एक भो सन्तान १०में इन्होंने नेलोरफे उदयगिरि प्रदेशमें अपनी गोटो | न थी, फिर एक दूसरी शिलालिपिमें लिखा है, कि अच्यु जमाई। इसो स्थानमे कृष्णास्वामोका विग्रह ला कर तेंद्र कृष्णदेवके पुत्र थे। १५३८ ई०में अच्युतेंद्रने कोएड इन्होंने विद्यानगर में स्थापन किया। १५१५६०में इनके घोडू तालुकमें गोपालस्यामोका मन्दिर बनवा दिया था। सेनानायक तिम्म गरसुने गजपति शासनकर्ताक मधि | शिलालिपिसे यह बात मालूम होतो है । अच्युतेंद्र बड़े फत कोएडवीड़, दुर्गको अधिकार किया। इसके बाद | धार्मिक थे। ये अपने पूर्णपुरुष कृष्णदेव रायालुको तरह दक्षिण प्रान्तके कितने दुर्ग इनके हाथ लगे थे । इस | देयमन्दिर निर्माण, देवप्रतिष्ठा, ब्राह्मणोंको ब्रह्मोत्तर दान समय सारा पूर्वी उपकूल इनके शासनाधीन हुआ। आदि अनेक सत्कार्योंमें रुपये खर्च कर गये हैं। उन्होंने १५१६ ई०में इन्होंने कृष्णानदोके उत्तर अपना शासन- तिनयेली नगरमें अपना माधिपत्य फैलाया और कलमें ममाय फैलाया। १५१८ ई० इन्होंने जो अनुशासन लिख दुर्ग वनवाया था। कर देयोत्तर सम्पत्तिका प्रबन्ध कर दिया वह पण्डरा. सदाशिव राय। तालुकाके पेहकाफनी प्राममें, घोरभद्दे के मन्दिरमें, १५४२१० में अच्युतको मृत्यु हुई। पीछे सदाशिव vol xxi, 93,