पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४६३

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विद्याभरण-विद्यारण्यस्वामी एक वैधकान्य प्रणयन किया । निर्णयामृतमें अल्लाड़- जगद्गुरु श्रीविद्यारण्यस्वामी नामसे विख्यात हुए। नाथने इनका मत उल्लेख किया है। 'संन्यासाश्रम प्रहण करनेके बाद विजयनगर या विदया. विधाभरण (सं० क्लो०) विदुपा-पय भामरणं । १ विद्या नगरराजबंशसे आपका जैसा सम्बन्ध था, संन्यासोके कराभरण, विद्याभूषण । (त्रि०) विद्या पय आभरणं जोपनको वैसी घटना विशेष मालोचनाको सामग्री है।

यस्य । २ विद्यारूप माभरणविशिष्ट, यिदुयायिभूपित। । ____ संग्पासाश्रमायलम्बनके पहले इनका नाम माधया-

विद्याभरण-खएडनखण्डखादुपटीकाके प्रणेता। चार्य था। दाक्षिणात्यफे सुप्रमिद शास्त्रविद् मरद्वाज विद्याभूपण-एक प्रसिद्ध पण्डित। इनका प्रकृत नाम था | गोत्रीय ब्राह्मण सायण इनके पिता थे। इनको माताका बलदेव विद्याभूषण। इन्होंने १७६५ ई० में उत्कलिका नाम श्रीमतीदेवो था । घेदभाष्यकार सायणाचार्य इंगके यालरी टीका, ऐश्वयंकादम्बिनीकाथ्य, सिद्धान्तात नामक कनिष्ठ माता थे। गोविन्दभाष्यटोका, गोविन्दविरुदावलीरीका, छन्दा. ___तुगभद्रानदी तटयों के सुप्रसिद्ध हाम्पीनगरके • कौस्तुभ और उसको टोका, पद्यायलो, भागवत-सन्दर्भ । निक्ट सन् १९८६ शक(१२६७ ई में ) माधव. टीका, साहित्यकौमुदो और रूपगोसामिरचित स्तवमाला का जन्म हुआ । पिताक अध्यापनागुणसे दोनों की टोका लिखी। दरिद्र ब्राह्मणकुमार विद्यागिक्षा विशेष पारदर्शी हो . विद्य भृत् (६० पु०) १ विद्याधर । यिद्यां विमति भृः । उठे। साथ ही दोनों भाई धोरे धोरे पृयक भाषसे या किम् । २ विद्वान् । । । एकयोगसे घेदोएनिपदादिका भाष्य और नाना प्रन्य विद्यामणि (सं० पु.) विद्या पर मणिः। १ विद्यारूप रचना करने लगे। संन्यासाश्रम प्रहण करने के पहले रत. घिया। विद्याधन । माधवाचार्यने माचारमाघा वा पराशरमाधव नामसे विद्यामय ( सं० लि.) विद्ग वरूपे मयट् । विदया. - पराशरस्मृतिका व्याख्या, जेमिनोय न्यायमाल विस्तर स्वरूप, विदुषाप्रधान, जो पूर्ण पण्डित हो। । या अधिकरणमाला नामसे मामांसासूत्रमार, मनुस्मृति- विद्यामहेश्वर (स० पु०) शिलिङ्गभेद ।। व्याख्यान, कालमाधवीय या कालनिर्णय, व्यवहार-माध. विद्यामाधव-मुहर्रादर्पणके रचयिता । . ..वीय, माधयोयदोधिति. माधवीय भाष्य (दाल), मुरर्श- विद्यामार्ग (स० पु० ) वह मार्ग जो मनुष्यको मोक्षकी माधवीय, शङ्करविजय, सवंदर्शनसंप्रद और वेदभाप्यादि ओर ले जाय, श्रेषः मार्ग1 : . .. । कई प्रन्यों की रचना को । इन सव मन्थों के अन्तिम ..विचारण्य (सं० पु०) माधवाचार्य । संन्यासाश्रम भागमे माधवाचार्थने अपने पिताके नाम और गोत्र प्रहण करनेके पाछे पे इस नामसे परिचित हुए । आदिका उल्लेख किया है। .

. विद्यानगर और विद्यारयय स्वामी देखो। दीक्षा लेने के बादसे हो माधय घ्र ह्मणोचित संस्कारयश

विद्यारण्य गुरु-गारसम्प्रदायके ग्यारहवें गुरु। . . तुङ्गभद्रा नदोके किनारे निक्ष्य प्रा और स्नानादिसे निवृत्त विद्यारण्यतीर्थ-एक संन्यासो। विश्वरदत्तफे गुरु हो हाम्पोक सुप्रसिद्ध भुवनेश्वरी मन्दिर में जाते और थे। इन्होंने सांख्यतरह अन्य धनाया।: यहां देवोको अर्चना करते थे। यौवनको उद्दाम आकांक्षा. विधारण्यस्वामो (जगद्गुरु)--शङ्कामतावलम्बी संन्यासि! ने माधयामार्थक हदयको अच्छी तरह मधना भारम्भ सम्प्रदायफे ग्यारह गुरु । ये पूज्यपाद विद्याशङ्करतीर्थ- पिया। दारिद्रा दुवको सहते हुप शुक शास्त्राध्ययन . के ( १२२८ १३३३ ३०) शिष्य थे। संन्यासाश्रम प्रहण उनको गच्छा न लगा। क्रमशः अर्धालामाशा अमिभूत - करनेके बाद ये विद्यारण्यस्थामी या विद्यारण्य मुनिके हो उठे। विजयध्वजपंशीय मानगुण्डो-राजवंशका ऐश्वर्य नामसे परिचित हुए थे। सन् १३८० ई०में इनके पूर्व- .. पत्तों सतोर्थ नौर १०३.गुरु भारतो .कृष्णातीर्थ के * डाक्टर पुगसने व ब्राह्मणको उपक्रमणिकामें विद्या (१३३३:१३८० ई०) तिरोधान होने पर ये शृङ्गरी मटके । रपयकै रचनाविषयमें विशेष गवेषण, पूर्वा युक्ति पशन को है ।