पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४६४

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- .. विद्यारण्यस्वामी उनका प्रपोड़ित करने लगा । घे परधीकातर हुए सही, [ खेलनेके लिये तुङ्गभद्राके दक्षिणी किनारे (जहां इस किन्तु कर्मवश किसों दूमरी वृत्तिने लग गये और उस समय विजयनगरका ध्वंसावशेष.पड़ा हुआ है ) घम? से हो उनको अच्छा फल प्राप्त हुआ। थे। ऐसे समय उन्होंने देखा, कि एक खरगोश सेजोसे स्वयं ऐश्वर्यावान् होनेको भाशासे माधव इएदेवोके _मा कर बाघ और सिंहशिकारी कुत्तोंको क्षत विक्षत और शरणापन्न हुए और देवोको तुएिके लिये बड़ा कठोरतोसे आहत कर रहा है। राजा अपने कुत्तों को इस तरह तपासाधना करने लगे। देवी भुवनेश्वरीने प्रसन्न हो कर आक्रान्त होते देख घहुत चकित हुए और इस अद्भुत " कहा, "वत्स! इस जन्मम तुम्हारे धनप्राप्ति की कोई और. नैसर्गिक घटना पर पिनार करने लगे। इसी माशा नहा। दूसरे जन्ममें मेरे प्रसादसे तुम अतुल | चिन्तामें मग्न हो कर घरकी ओर चले । रास्ते में सम्पत्तिके अधिकारो हो सकोगे।" उस नदोके किनारे उपासनामें रत एक (माधवाचार्य) देवीके वापर सुन कर माधवके चित्तमें वैराग्य उत्पन्न | संन्यासीस भेट हुई। उन्होंने इस घटनाका विवरण उस । हुआ। उन्होंने संसारधर्मको निलाअलि दे कर संन्यासा. हांन्यासीसे कह सुनाया और इसका यथार्थ तय पूछ।।। श्रम प्रहण किया। सन् १३३१ ई० में वे अपनी जन्मभूमि! उस समय सन्यासोने राजाको जहां यह घटना हुई थी, - हाम्पो नगरको छोड़ कर 'गेरोकी ओर चले और वहां | उस स्थानको बतलानेके लिये कहा। राजाने भी सोन्यासी. पहुंच कर वहांके सुप्रसिद्ध शङ्कर-मठाधिकारी आचार्य को वह स्थान दिग्ना दिया । संन्यासीने उस समय राजासे प्रयर विद्याशङ्करतीर्थ के चरणों पर गिरे। उस व्याकुल कहा, कि तुम इस स्थानमें किला और राजप्रासाद चित्त युवक माधवको शान्तिके प्रयामो देख विद्यातायने । निर्माण करो। तुम्हारे द्वारा प्रतिष्ठिन यह नगर धनधान्य उनको स्थान दिया और उनको विद्याधुद्धिका प्रावय , और राजशक्तिमें गन्यान्य- राजधानियोंका शीर्ष स्थान देख दयाचित्तसे उनको शिष्य पद पर नियुक्त शधिकार करेगा ।.राजाने उस संन्यासीका बादेश पालन किया। माधवाचार्य ने उसी वर्ष सम्पासाश्रम प्राण | किया। शीघ्र ही यहां एक प्रासाद और राजकायॉप. । किया था। इसके कुछ दिनों बाद विद्यातीर्थ सन् १३३३ पोगो अट्टालिकायेतेपार कर दो गई। राजाने हान्यासी...' ६०मे परलोकप्रयासी हुए। इसके बाद माधवाचार्य के मतानुसार इस नगरका नाम विद्याजन' रखा हम के अप्रवत्ती शिष्य भारतीकृष्ण जगद्गुरुको गद्दी पर ___* पुर्तगोज भ्रमणकारी Fernao Nunia अन्दाज सन् इसो वर्ष में अर्थात् सन् १३३३ ३४ ई० में ही दिल्लीके | १५३६ ई० में विजयनगरके राजा मच्युतरायको सभामें उपस्थित थे। वादशाह महम्मद तुगलकको फोजीने दाक्षिणात्य हिन्दू । उन्होंने अपने भ्रमणवृत्तान्तमें उपर्युक्त घटनाका विवरया दिया राजनशकं ऐश्वर्यासे ईन्वित हो पहले मानगुण्डा | है। उक्त किम्बदन्तीसे मालूम होता है, कि किसी संन्यासी के पर आक्रमण किया । नगर पर घेरा डालनेके समय हिन्दू नामानुसार रस्त विजयनगर पुनः संस्कृत हा कर विद्याजन' और मुसलमानों में घोर संघर्ण उपस्थित हुआ । इस नामसे प्रसिद्ध हुआ है। विद्याजन शब्द विद्यारपयका अपश . भाषण युद्धमे विजयध्वजवंशीय अतिम राजा | मालूम होता है, सम्भवतः विद्यारपयनगर संक्षेपमें विद्यानगर हुभा जम्बुकेश्वर मारे गये। पे राजा निःसन्तान थे । यादशाह है। नुनोजके मतसे देवरायका पुत्र बुक्कराय था। घुक्करायने बान. यह सोचने लगे, कि गहो पर किसको हौठाया जाये; राज के सोमान्त तक सारे उड़ीसे पर अधिकार कर लिया था । विद्या. " परिवारमें ऐसा कोई बचा न था, कि उसे गद्दो पर | नगरको ऐतिहासिक पालोचना करनेसे मालूम होता है, कि गैठाते। मन्त्रीने मा कर कहा, कि गद्दी पर दौठने लायक रै बुक या १ले देवराय प्रवास पराक्रान्त राजा थे । - पुर्तगोज । युद्ध में कोई नहीं बचा है । अन्तमें बादशाहने उसो ऐतिहासिक घटनाओं में बड़ी गड़बड़ो मचा दी है। को राज्यसिंहासन पर गैठाया। . . या अपने ग्रन्थमें उन्होंने लिखा है, कि पादशाह महम्मद किम्वदन्ती है, कि राजा. सन १२३० ई०में भानगुण्डी पर माक्रमण किया और ." कोठे।