पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४७३

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विद्यत् । ३६३ • से तटतटस्सना विद्युत् प्राणियोंको एकाएक भय देते | प्रकारको है। वृहत्संहितामें विद्युल्लता, विद्युहामन् हुए जीव और इन्धनके ढेर पर गिरती है। आदिशन्दोंका प्रयोग देखनेसे मालूम होता है, कि यह - यह उल्का अन्तरीक्षमा ज्योतिः पदार्थ मानी जाती | सव शब्द विभिन्न प्रकारकी विद्युत्में ही आरोपित है। ज्योतिशास्त्र में धिष्ण्य, उल्का, अंशनि, विद्युत् और हुए हैं। उन्हें माधुनिक वैज्ञानिकको Sinuous, । तारा पे पाच प्रकारके मेद लिखे हैं। इनमें से उल्का अनेक ramilied, meandering आदि अनेक प्रकारको विद्युत् भेद देखे जाते है । अनि नामक यंत्र मनुष्य, गज, अश्य, (lightening) समझने में कोई भूल न होगा। विष्णुपुराण- मृग, पायाण, गृह, तरु और पश्यादि पर. जोरसे शब्द में (१।१५) कपिला, गतिलोहिता, पोता और सिता नाम- करता हुआ गिरता है। पृथियो पर गिरनेसे वह चकेकी | की चार प्रकारको विद्युत्का उल्लेख है। श्रीधरखामोने · तरह घूम कर उस जगहको फाड़ देना है। विद्युत् हठात् लिखा है, कि तुफानके समय कपिला, प्रखर ग्रीष्मकालमें तट-तट शन्न करके प्राणियों को भयभीत तो कर देती! अतिलोहिता, वृटिके समय पोता और दुर्भिक्षक दिन है, पर वह साधारणतः जोय गौर इन्धनके ऊपर गिरती सिता नामको विद्युत् दिखाई देती है। है तथा उसी समय उसको जला देती है। विद्युनका! । आधु.नक वैज्ञानिकों के मतसे मेघ ही विद्युतता आकार कुटिल और विशाल है। 'एकमात्र कारण है, किन्तु सभी अध्यापक इसे माननेको . विद्युत् और अगनि प्रायः एक ही है , किन्तु प्ररुति- | तैयार नहीं। परन्तु उन्होंने परीक्षा करके देखा है, कि .विशेषको पृथक्ता निकरण करके उनके दो विभाग निर्देश समुद्र और स्थल भागको अपरयाली वायुको तडित् । 'किये गये हैं। ज्योतिर्वितश्रेष्ठ उत्पलने अशनि शब्दका | (Electricity) एक भावापन्न नहीं है, किन्तु जलफे वापी- अर्थ "अश्मयपंणमुल्का भेदो घा" लगा कर सन्देहको दूर भूत होते हो उसमें तड़ित दिखाई देती है तथा मेघको कर दिया है। मतपय इन्हें पर्शमान Meteorites या जलफेणामें यह विद्यमान रहती है। वाष्पकणाके एकल aerolites समझने में कोई आपत्ति नहीं देखी जातो। । और घनीभूत होनेसे वह जलकणामें परिणत होती है - विद्युत् और अशनिफा दूमरा भी है, उसी तथा उसाके साथ मावद तड़ित् विद्युत्के आकार में गर्धमें साधारणत: उसका प्रयोग हुआ करता है। विद्यत- दिखाई देती है। फिर वाराणा घनीभूत होने में धूलि- के उत्पत्ति कारण सम्बन्धमें श्रीपतिने कहा है, कि कणाकी भी आवश्यकता होती है। सुजल समुद्र में बाड़वानि नामकी अग्नि रहती है । उसी. इन सब विषयोंकी एक एकको पर्यालोचना करनेसे से घूममाला निकल कर पवन द्वारा आकाश-पथों लाई | मालूम होता है, कि विद्युत्को सम्भावनाके सम्बन्धमें ' जाती और इधर उधर विक्षिप्त होती है। . पोछे सूर्यको आधुनिक शानके साथ प्राचीन ज्योतिर्यि दोको उतिको • किरण पड़नेसे जब यह उत्तप्त हो जाती है तब उसमेंसे । उतनो विमिन्नता नहीं है। जो सव अग्निस्फुलिङ्ग निकलते हैं, यहो विद्युत् हैं। विद्युत् मऔर अशनि एक नहीं है। उनके धातुगत कमी कमी यह विद्युत् अन्तरीक्षसे स्खलित हो कर भू- अर्थसे ही पृथकता निरूपण की जा सकती। इयुत पृष्ठ पर गिरती है तथा जगत्का यहुन अनिष्ट करतो है। धातु दीप्ति अर्थम विद्युत् तथा संहति अर्थम अशधातुसे विद्युत्पातके सम्बन्धमें उक्त प्रकारका कहना है, कि अशनि शद हुआ है। चेदमें गशना शब्दसे क्षेपणीय पैद्युत तेजमें जद मकस्मात् मिट्टो आदि मिल जाती है, ! प्रस्तर समझा जाता है। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है, कि तथ वह प्रतिकूल या अनुकूल पवनके भाघातसे माफाश इन्द्रका यन्त्र पत्थर पा लोहेका था। अनि शब्दसे हम में पात्याकी तरह भ्रमण करने लगती है । अकालमें वृष्टि लोग सिर्फ Globular lightning और lightning पातके समय यह पृथिवी पर गिरती है. तथा वर्षाकाल । tubes or fnigurites समझा जाता है। शेषोक अपने __में धूल के नहीं उठनेसे विद्य तपात मी होने नहीं पाता। | हो प्रचलित अंगरेजो Thunderbolt शब्दका व्यवहार . . पार्थिय, जलीय मोर तैजसके भेदसे विद्युत् तोन | हुआ है। Vol. XXI, 99%