पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४७४

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विद्यावश-विधुत् . विद्यावंश (सं० को०) विद्याको तालिका । जैसे-धनुर्भिधा, विद्यासागर (स.लि.) १ सर्वशास्त्रवित् । सागर जैसे आयुर्शिदुपा, शिल्पविद्या, ज्योतिर्निया इत्यादि। सय रतोंका आधार है, वैसे हो सब विशारतों का शो विधायत (सं० लि०) विद्यास्त्यस्येति विद्या मतुप मस्य आधार है,, वही विद्यासागर कहलाता है । (१०) २ एक व। विद्याविशिष्ट, विद्वान् । खएडनखएडबाघटीकाकार। ३ कलादीपिका नामको... विद्यावलभरस (सं० पु०) रसोपविशेष । प्रस्तुत प्रणाल- भट्टिकाव्यटोकाके रचयिता । भरतमलिक और समरकोप.. रस १ माग, तांबा २ भाग, मैनसिल ३ भाग, हरताल टोकामे रमानाथने यह टीका उदत की है । ४ महा. १२ भाग, इन्हें एक साथ मिला कर करेले के पत्तोक रसमें | भारतके एक रोकाकार । ५ एक प्रसिद्ध वगाला पंडित। घाटे। पंछे तानपातकं मध्यभागमें रख कर वालुका. ईश्वरचन्द्र देखो। यन्त्र में पाक करे। यन्त्र के ऊपर रखे हुए धान जय विद्यास्नातक ( स० पु०) मनुके अनुसार यह स्नातक जो. फूट जाय, तब पाकका हुआ जानना चाहिये। इसकी | गुरुके घर रद्द कर वेदाध्ययन समाप्त करके घर लौटा हो। माला २ वा ३रता है। यह विषमज्वरनाशक मानाविध च्छन (सं० पु०) राक्षस | .:. गया है। इसके सेवन कालमें तैलाभ्यङ्ग और अन्नविच्छिन्ना (स' स्रो०)१ स्थावर विपके अन्दर मूल. ' भोजन निषिद्ध है। विप 1 २ एक राक्षसाका नाम । (कथासरित्सा० २५।१६६) विद्यावागाश भट्टाचार्य-न्यायलीलायती प्रकाशदीधिति- शशाघात विद्युजिह ( स० पु०) पिंध, दिव चञ्चला जिहा यस्य । विवेकके रचयिता। विद्यावान् (सं० पु०) विद्वान्, पण्डित । १ रामायण के अनुसार रावणके पशफे एक राक्षसका। नाम ! २एक यक्षका नाम । विद्याविद् (स'० पु०) विइयां वेत्ति यिद किप् । विद्वान्, । विद्यु जिहा ( स० स्त्री०) कार्तिकेयकी एक मातुकाका पण्डित । विद्यायिनाद ( स० पु०) विद्या विनोदा। १ विद्या नाम। द्वारा चित्तविनोदन । २ संस्कृत शास्त्रविद् पंडितोंकी एक विविध ज्ज्याल ( स० पु०) एक राक्षसका नाम। उपाधि । ३ निर्णयसिन्धुधृत एक स्मृतिनियन्धकार । विजयाला ( स० स्त्रो०) विद्य न इव ज्याला यस्याः। ४ भोजप्रबन्धधृत एक थि । ५ देयोमाहात्म्य टाकाकार। । फलिकारी या कलियारों नामक वृक्षा ६ प्राकृतपघटोकाफे प्रणेता। ये नारायणफे पुत्र थे। विद्युत् ( स० नो.) विशेपेग धोतते . इति वि.युत : विधावियत (स० त्रि.) शानके विपरीत, बुद्धिसे बाहर । (भ्राजभासेति । पा ३।२।१७७ ) इति क्यिप् । १ सध्या। विद्याविशारद (स.पु.) विद्यानिपुण, पण्डित । (मेदिनी) विद्योतते या घत-पिव। . २ तड़ित्, विजली । विद्यावेश्मन (स० सी०) विद्याया पंग गृहं । विद्या- पर्याय-शम्पा, शतहदा, हादिनो, ऐरावती, क्षणप्रभा, गृह, विद्यालय, स्कूल। सौदामिनी, चञ्चला, चपला, ( अमर ) पीया, सौदानो, .. विद्यावत (सं० पु०) वह व्रत जो गुरु के घर रह कर विद्या चिलमीलिका, सज्ज, अत्रिरप्रभा.. अस्थिरा, मेघमशा, . शिक्षाके उद्देश्यसे धारण किया जाता है। अशनि, चटुम्ला, मचिरोचि, राधा, नीलाञ्जना । (जटाधर) विद्यावतस्नातक ( स० पु. ) मनु के अनुसार गृहस्थमेद, . यह विद्य त् चार प्रकारको है। अरिष्टनेमिकी पत्नी विद्या और प्रतस्नातक गृहस्थ । जो गुरुके घर.रह कर के गर्भसे इसकी उत्पत्ति हुई है। (विष्णुपु० ११५ १०)- येद समाप्त और व्रत असमाप्त करके अपना घर लौटता इन चार प्रकारको वियोंमें कपिलवर्णकी विद्युत् है, उसे विद्यास्नातक और जो प्रत समाप्त और वेद होनेसे वायु, लोहितवर्ण को होने से भातप, पीतवर्णको असमाप्त करके अर्थात् समूबा घेद विना अध्ययन किये. होने से वर्पण तथा असितवर्णकी विद्य त् होनेसे दुर्भिक्ष . ही घर लौटता है, उसे व्रतस्नातक कहते हैं। घेद और होता है। ३ एक प्रकारको योणा । . . . . मत दोनों समाप्त कर जो अपना घर लौटता है, वह ४ उरकाभेद । वृहत्संहितामें लिखा है, कि पिण्य, विद्यावतस्नातक कहलाता है। ' । अनि, विद्युत् आदि उका अनेक प्रकार की है। उनमें