पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४७९

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विधवा ४०१ यदि पुत्र और पौत्र हो, तो तर्पण नहां भी करनेसे चल । वैशास्त्र महीने में जलकुम्भदान, कार्सिक महीने में देवस्थान- सकता है। वैशाख, कात्तिक और माघ मास में विधवा | में पृतदीप दान, माघ मासमें धान्य और तिलका उत्सगे को विशेष नियमवती हो कर गंगादिका स्नान, दान, तीर्थ | करना विधयाका पकान्त कर्राव्य है। सिवा इसके यात्रा और सर्वदा विष्णुका नाम स्मरण करते रहना पैशाख महीने में वह जलसनकी प्रतिष्ठा और देवताओं चाहिये। पर जलधारा, पादुका, व्यजन, छल, सूक्ष्मवस्त्र, कपूर. . 'काशीखएड'में विधवा धर्म और कर्तव्याकर्तव्य. ' मिश्रित चन्दन, ताम्बूल (पान), सुगन्ध पुष्प, कई तरह के का विषय इस तरह लिखा है-स्यामीको मृत्यु होने पर , जलपान, पुष्पपात, तरह तरहफे पानीय द्रव्य, मंगूर - यदि यह सती न हो सके, तो उसको उचित है, कि अपने आदि फल पतिकी प्रातिके उद्देश्यसे स६ ब्राह्मणोंको दान चरित्रको रक्षा अपनी जान दे कर करे। क्योंकि, चरित्र दे। नष्ट होनेसे उसका नरक सुनिश्चित है। चरित्रहीन विधया- यह कार्तिक मासमें ययान्न या एक प्रकारका अन्न फे पति और पिता, माता आदि सभी स्वर्ग में होने पर भी भोजन करे। पृन्ताक और घरवटो खाना नहीं चाहिये। पहाँसे अधोगामी होते हैं। जो स्नो पतिको मृत्युफे बाद। इस मास तेल, मधु और फूलको थालीमें भोजन विल्कुल पथानियम पातिव्रत्य धर्मका प्रतिपालग करती है, यह निषेध है। इस समय मौगायलम्यन करना ही उत्तम है। मृत्यु के बाद फिर पनिसे मिल कर स्वर्गसुख भोग करतो मौनो हो कर रहनेस मासके अन्तमें घण्टादान, पानमें है। विधयाका चूडायन्धन पति के बन्धनका कारण होता । भोजन नियम करनेसे घृतपूर्ण कांस्य पातदान, भूमि है। इसलिये विधवा सदा मस्तक मुण्डन करातो रद्द।। शय्या करनेसे अन्त में शय्यादान, फल त्याग करनेसे विधाको रात दिनमें एक दार हो भोजन करना चाहिये, फलदान, धाग्य त्याग करनेसे धाग्य या धेनु दान करना दो घार नहीं । त्रिरात्र, पञ्चरात्र या पञ्चयतका अवलम्बन उचित है । देवादि गृहों में धृत प्रदीप दान अवश्य कर्त्तव्य या मासोपयासवत, चान्द्रायण, कृच्छ चान्द्रायण, पराक- और सब दानोंसे ही यह दान श्रेष्ठ है। व्रतं या तप्तकृच्छ व्रत आचरण करना चाहिपे। जितने माघ मासमें सूर्य दिखाई देने पर स्नान करना विध- दिन विधवा जोवित रहे, उतने दिन ययान्न, फल, शाक, वानों के लिये उत्तम है। इसी तरह विधवा नित्य मान और केवल जल पान कर जीवनयात्रा निर्वाह करेगी। कर यथासामर्थ्य नियमसंयमका पालन करे। इस विधया यदि पलंग पर मोती है, तो वह अपने पति-! मासमें ब्राह्मणों, संन्यासियों और तपस्थिको पचान, को अधोगति कराती है । अतएव उसे अपने पतिके मिष्टान्न और अन्यान्य सुमिष्ट द व्य भोजन करापे। सुखकी इच्छासे जमीन पर हो सोना उचित है । विघया- शीत निवारणके लिये सूखी लकड़ीका दान, कईदार को कमो उबटन और गध द प्य नहीं लगाना चाहिये।। मिर्जाई या कुरता और दुपट्टा, मजीठ रंगसे रंगा कपड़ा, प्रतिदिन उसको सपने पिता और पितामहफे उद्देश्यसे | जातोफल, लयंग लगा कर पानका वीड़ा, यिचित्र कम्बल, उनके नाम और गोत्रका उच्चारण कर कुश और तिलो निर्वातगृह, कोमल पादुका और सुगध उद्वर्त्तन दान एक द्वारा तर्पण करना चाहिये तथा उसे पतिस्यरूप करने चाहिये । देयागारमें कृष्णागुरु आदि उपहार द्वारा विष्णुको पूजा करना आवश्यक है। उसे सर्वव्यापक पतिरूपी भगवान प्राप्ति हों, ऐसा भावना फर देवपूजा । विष्णुका पतिरूपमें ध्यान करना चाहिये। पतिकी जोषि करनी चाहिये। इस तरह विविध नियम और प्रतो का तावस्थामें विधवा जिन चीजोका प्यार करतो थी, ये सब अनुष्ठान कर वैशाख, कार्तिक और माघ पे तीन महिने चोजे सदा ग्राह्मणको दान देती रहे । बैशाख, कार्तिक, विताने चाहिये। और माघ महीने में विधवाको विशेष संयमसे रहना , विधवा स्त्री प्राण कएठागत होने पर भी बैल पर न चाहिपे । . . .. .. . . . चढ़े और रंगीन वस्त्र न पहने । मर्त तत्परा विधया स्नान, दान, तीर्थयात्रा, धारंवार विष्णुका स्मरण, पुत्रों से बिना पूछे कोई काम न करे । इस तरह दिन Yol. xxI 101