पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४८६

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४०४ विधवा इसके द्वारा वाग दत्ता फन्याका विवाह भी निषिद्ध हुआ अपत्यशोभात् यातु श्री भरिमतिपर्त्तते। .:. है । स्यामसंहिता, धशिष्ठमंहिता प्रभृति संहिताओं में ! सेह निन्दामघाप्नोति पतिलोवञ्च हीयते ॥ .. भी अनन्यपूर्विकाका प्रहण निषिद्ध है । विधया स्त्री नान्योत्पन्ना प्रजास्तीह न चायिस्प परिमहे । । अन्यपूर्घिका, अनन्यपूर्षिा नहीं है, विधवाका विवाह न द्वितीयश्च साध्वीना श्वचित् भत्तोपदिभ्यते ॥ .. अब शास्त्रीय है। पतिं हित्वा पकृष्ट' स्वमुत्कृष्टं या निपेवते । ____ पारस्करगृह्यसूत्र में लिखा है, कि गुरुगृहसे समां निन्द्य घ सा भयेल्लोफे परपूर्वेति चोच्यते ॥" घर्तनके बाद कुमारीका पाणिग्रहण करो। कन्याको हो । (मनु ५।१६०-१६३) कुमारी कहते हैं । अदत्ता कन्या ही कुमारी कहलाती है। पिता या भ्राताने जिसको दान किया है, सोध्यो स्त्री जो एक धार दान कर दी गई, यह पुनः प्रदान नहीं की | उसीकी कायमनोवाफ्यसे श्रुश्रूषा करें । उसको मृत्यु हो । जा सकती। कुमारीदानको ही विवाह कहा जा सकता | जाने पर ब्रह्मचर्यका अवलम्बन कर दिन विताये। इस है। विवाहिताका फिरसे दान विवाह कहला नहीं । ब्रह्मचर्मके गुणसे वह पुत्रहीनो होनेसे भी वर्ग जायेगी। सकता । "अग्निमुपघाय कुमा•ः पाणिं गृह्णीयात् त्रिषु- जो स्त्री सन्तानको कामनासे स्वामीका अतिवर्शन कर । प्रिघूत्तरादिपु ।" (पारस्करगृह्यसूत्र) व्यभिचारिणो होतो है, यह इहलोक निन्दित और पति : ___"कन्याशब्दार्थ कध्यते, 'कन्या फुमारो' इत्यमरः, | लोकसे वञ्चित होती है। स्वामीफे सिवा अन्यपुरुषस 'कन्यापदस्यादत्तस्त्रीमातवचनेन' इत्यादि दायभाग। उत्पन्न पुनसे कोई भी धर्मकार्य नहीं होता। इस तरह रोकायां आचार्यचूडामणिः। 'कन्यापदस्यापरिणीता- के व्यभिचारसे उत्पन्न पुन शास्त्र के अनुसार पुत्र-पदफ मात्रवचनात्' इति रघुनन्दनः । इत्यादि वचनैः कुमारी. योग्य नहीं। . नामेव परिणये विधाहशब्दयाध्यत्य नत्तूढायां ।" मनुने | मनुने विशेषरूपसे कहा है-'न द्वितीयश्च साध्वीनी. लिखा है, कि कन्या एक बार प्रदत्त और ददानि अर्थात् कचित् भत्तोपदिश्यते' अतपय विधया स्त्रीका दूसरो बार दान भी एक बार होता है, यह दो वार नहीं होता। पतिग्रहण विवाहपदवाच्य नहो । परपुरुषकै उपभोग सम्पत्ति सजन द्वारा एक बार ही विभक्त होती है, इस | द्वारा स्त्री संसारमै निन्दनीय होती है और दूसरे जन्मम तरह कन्याका दान भी एकवार हो होता है, द्वितीयबार | शृगालयोनिमें जन्म लेती है और तरह तरह के पापरोगों- नहों। से आक्रान्त हो कर अत्यन्त पीड़ा भोग करती है। जो सकृदंशो निपतति सत्कृतकन्याय प्रदीयते । स्त्री कायमनायाफ्यसे संयत रह कर स्वामीको भतिक्रम सकृदाहुदर्दानीति त्रीपयेताणि सता सकृत् ॥ (मनु ६४७) , नहीं करती, वह पतिलोक पाती है। इससे विधयाभों- सुतरां इस वचनके अनुसार भी कन्याको पफ धार | को पुनः विवाह करना कदापि विधिसङ्गत नहीं | . दान कर चुकनेपर फिर उसको दान नहीं करना चाहिये ।। ____ दीर्घकाल तक ब्रह्मचर्य, कमण्डलु धारण, देवरसे अतएव दशाकन्याके खामीफे मृत्योपरान्त उसका पुत्रोत्पादन, दत्ताकन्याका दान और द्विजातियोंका अस. विवाह नहीं होता। और भी लिखा है- धर्ण कन्याको पाणिग्रहण कलियुगमें निपिद्ध है । अर्थात् ' "यस्मै दद्यात् पिता खेनात् भ्राता वानुमते पितुः । पहले ये सव प्रचलित थे। 'दत्ताकन्याका दान' इस मसि तं अभूपेत जीवन्तं संस्थितच न संघयेत् ॥ विधवाफा विवाह निषिद्ध बतलाया गया है। धर्मशास्त्रमें मङ्गलार्थ सास्त्ययनं यशस्वास प्रजापते। . और भी लिखा है, कि इस कलियुगमें दत्तक और मौरस प्रयुज्यते विवाहेषु प्रदान स्वाम्यकारणम् ॥" इन दो प्रकारफे पुत्रों की व्यवस्था है। इसके सिवा और (मनु० ॥१५१.-१५५) जो पुत्र होते हैं, यह,धर्मकार्यके अधिकारी न होंगे। "मृते भर्तरि स्वाध्वी स्त्री ब्रह्मचय्ये व्यवस्थिता।.. विवाह पुत्र के लिये किया जाता है। विवाहिता गिधयाके • स्वर्ग' यगच्छत्पुत्रादि यथा ते ब्रह्मचारिणः ॥ . गर्भसे उत्पन्न पौनर्भवका पुत्रस्य जब निषिद्ध हुमा, तब