पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४८८

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४०६ विधान-विधानसप्तमीबत ... सौ कल्लका ४२० मन्वन्तरका ब्रह्माका एफ मास (३० आरम्भ कर पौषमासको शुक्लासप्तमो पर्यन्त प्रति मासको दिन)। इसी प्रकार ३६० कल्प, ५०४० मस्यन्तरफा ब्रह्माका सप्तमी तिथिमें करना होता है। इस प्रतमें सर्वाना एक वर्ष (१२ मास) होता है। ब्रह्माकी परमायु सौ संव और सूर्यास्तवका पाठ करना फर्त्तव्य है। यह मत कर त्सर तक है, जिसमें से ५० वर्ष या आधा समय बीत | नेसे रोग नष्ट होता है तथा संपत्ति लाभ होती है। यह चुका। वर्तमान ५१वां वर्ष और श्वेतवाराहकल्प मारम्भ | प्रत मुख्य चान्द मासको शुक्लासप्तमी तिथि करनेका.. हो कर उसके ६ मन्वन्तर थोत गये है। अभी वैवखत | विधान है। . .. . मन्यन्तर चलता है। • इस व्रतका विधान इस प्रकार लिखा है। प्रतफे। विधालो (स. स्त्री०) यि-धा-तृच् डीम् । १ विधान करने । पूर्व दिन संयत हो फरः रहना होता है। प्रतके दिन . घालो, धनानेवाली, रचनेयालो । २ व्यवस्था करनेवाली, सबेरे प्रातःकृत्यादि करके स्वस्तिवाचन और सङ्कल्प करे । प्रबन्ध करनेवाली। ३ पिपली, पोपल । "गो कर्तव्येऽस्मिविधानसतमीव्रतकर्मणि भी पुण्याई विधान (सं० को०) विधा-ल्युट् । १ विधि, नियम । | भवन्तोऽधिववन्तु ओं पुण्याई" इत्यादि '३ पार पाड २ करण, निर्माण, रचना। ३ करिकवल, उतना चारा | करे। इसके बाद स्वस्ति और ऋद्धि तथा 'सूर्य सोमः' जितना हाथो एक बार मुझमें डालता है, हाथीका प्रास। इत्यादि मन्त्र का पाठ कर सङ्कल्प करना होता है । जैसे- ४ वेदादिशास्त्र । (मनु १।३)५ नाटकाविशेष, नाटफर्म ___"विष्णुरोम् तत्सदोमद्य माघे मासि शुषले पक्षे . यह स्थल जहां किसी वाक्य द्वारा एक साथ सुख और | सप्तम्यान्तिथावारभ्य पोषस्य शुक्ला सप्तमी यावत् प्रति. दुख प्रकट किया जाता है। ६ जनन, उत्पत्ति करना।। मासीय शुक्सप्तम्यां अमुकंगोत्रा थोषमुकदेवशर्मा ७प्रेरण, भेजना । ८ आशाकरण, अनुमति देना । । धन, भारोग्यसम्पत्कामः: अभीएतत्तत्फलमाप्तिकामो या ' सम्पत्ति । १० पूजा, अर्चन । ११ शत्रुताचरण, हानि पहुं विधानसप्तमीघ्रतमहं करिष्ये।" चानेका दांवपेच । १२ प्रहण, लेना। १३ उपार्जन, - इस प्रकार सङ्कल्प करके वेदानुसार सूक्त पाठ हाशिल । १४ विपम । १५ अनुभव । १६ उपाय, ढंग, करे। पोछे शालग्रामशिला या घटस्थापनादि करके तरकीय.। १७ विन्यास, किसो फार्याका बायोजन, कामका | सामान्यार्घ और भासनशुद्धि मादि करके गणेश, शिवादि होना या चलना। पञ्चदेवता, मादित्यादि नवप्रद और इन्द्रादि दशदिक पिधानक (सं० लो०) १ व्यथा, फ्लेश, यातना। २.विधि, पालकी पूजा करनी होती है। इसके बाद पोडशोपचार विधान। (वि० ) ३ विधानवेत्ता, विधि या रीति से भगवान सूर्यदेवको पूजा करके उनका स्तप पाठ जाननेवाला। करे। प्रति मासकी शुक्लासप्तमी तिधिमे इसी नियमसे विधागग (स० पु०) विधानं गायतीति गै-ठक । पण्डित, पूजा करनी होती हैं। किन्तु प्रत्येक मासमें सङ्कला विद्वान् । नहीं करना होता। प्रथम मासके सङ्कतपसे हो सभी विधाना (स.पु०) विधानं जानातीति विधान शाक। मासोका काम चला जाता है। १ पण्डित, विद्वान् । (ति०) २ विधानवेत्ता, विधि या . यह व्रत करके धारहो महीने में बारह नियम पालन रोति जाननेवाला। करने होते हैं। यथा--(१) माघमासमें मकघनके पत्तो. विधानशास्त्र ( को०) व्यवस्थाशास्त्र, व्यवहारशास्त्र, का सिर्फ मकुर खाना होता है। (२) फाल्गुनमासमें आईन। जमीन पर गिरनेसे पहले ही जी भर पोली गायको गोबर विधानसंहिता (सं० स्त्री०) विधानशास्त्र।. . खानेका नियम है। (३) चैत्रमासमें एक मरिचभक्षण, विधानसप्तमी ( स० स्त्री०) माघशुक्लासप्तमी। (४) नौशाखमासमें थोड़ा जल, (५) ज्येष्ठमासमें पके विधानसप्तमीवत (स० को०) सप्तमी तिथिमें कर्तव्य व्रत- केले के पोचकी कणामाल, (६ ) पाढमासमें यव. विशेष। यह मत माघ मासको शुक्लासप्तमी तिथिसे' परिमित कुशमूल, (७) श्रावणमासमें अपराहकालको