पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५०३

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विग्रनयाहिन-विनयपिटक ४१७ विनयपाहिन (स.लि.) मिनयं गृहातीति विनय प्रह- के कारण महाकश्यपने सोचा, कि मगधपति अजातशत्रु णिनि । विधेय, वश्या "विधेये विनयग्राहो पचने- यहांके एक अनुरक मक हैं। उनकी राजधानी राजगृहमें स्थित आश्रयः।' (अमर) . :, । एकत्र होनेसे भोजन मादिको तय्यारो उनके यहां हो यिनयज्योतिस् (सं० १०) एक मुनिका नाम। .सफेगी । इस विचारके अनुसार पांच सो स्थविर राज.

: . . . . . (कथास०.७२।२०१) । गृहफे निकटवत्ती भारशैलफे सत्तपनो (सप्तपणों) गुहा-

विनयता (स. स्त्रो०) विनयस्य भावः तल टाप् । विनय . में एकत्र हुए। इस महासमाके महाकाश्यपके सभापति का भाष या.धर्म, विनय । । . . . हुए । उनके अनुमतिफमसे उपालिने घुझोपयिष्ट विनय विनयदेव (स.पु.) एक प्राचीन कविका नाम । प्रकाश किया। उपालोने कहा, कि मिक्ष भोक लिये विनयधार (सपु०) पुरोहित । (दिव्या० २१.१७) भगवान्ने विनय प्रकाश किया है। यह विनय हो भग. यिनयन (स.नि.) १ विशेषरूपसे नयन । २ विनिः | पानका उपदेश, यही धर्म, यही नियम है। पराजिक, संघातिदेश, दुनियत, विंशम्निसीप प्रायश्चित्त, बहु- विनयपत्र (सलो०) विनयसूत्र, दरखास्त ।' शाखीय धर्म, सप्ताधिकरण ये विशेष लक्ष्य है। उप. यिनयपाल-लोकप्रकाश नामक प्रन्धके रचयिता स म्पदालाभ या संघमें प्रवेश करने की योग्यता और विनयपिटक-मादि बौद्धशास्त्रभेद। . आदि बौद्धशास्त्रः 'अयोग्यता, पापस्सोकार, निर्जनवास, भिक्ष के पालनीय 'समूह तीन भागों में विभक्त है-विनय, सूत्र और अभि• धर्म और पूजाको यिधि या विनयमें लिपिबद्ध हैं। "धर्म। पे तीनों शास्त्र विपिटक या तीन पिटारा नामसे उपालि और मानन्द, विनय और सूत्रके प्रवक्ता कहे प्रसिद्ध है। इन तीन पिटारे युद्ध और युद्ध के उपदेश. जाते थे सहो, किन्तु इसमें सन्देह नहीं, कि अन्यान्य मूलक तस्य आदिके सम्पन्ध जो कुछ जानने लायक | स्थविरोंने भी विनय और सूत्रसंप्रहमें साहाय्य किया था विषय हैं, वे सभी संरक्षित हैं।. ..'. : इसके बाद कालाशोकके राजत्यके समय घेशालीके . ' युद्धदेय अपनो शिष्यमएडली और उनके फर्शय बलिफाराम नामफ स्थानमें ७०० भिक्षु ओंने एकत्र मिल अर्थात् श्रमण या भिक्षार्गके सम्बन्धमें जो उपदेश कर फिर एक समाका आयोजन किया। इस सभाम 'दे गये हैं, उन्ही उपदेशोंका विनयपिटकमें समावेश | पश्चिम-मारत और पूर्व भारतफे भिक्ष मोमें यथेष्ट मत. किया गया है। किस तरह विनयपिटक सङ्कलित भेद उपस्थित हुभा था। जिपुत्र सप भिक्षु मोने कुछ हुआ, इसके सम्वन्धमें नाना बौद्ध अन्धों में ऐसी हो घात हो कर दलबन्दी कर ली। जो हो इस सभा भी विनय · मिलती है-घुद्धदेयके महापरिनिर्वाणके कुछ समय | संगृहोत हुभा था। पाद उनके प्रधान शिष्य महाकश्यपने सुना हिशारि पिय पक्षाने और एक महासंघको योजना की। पुत्रकी मृत्युफे साथ ८०००० मिक्ष ओं, मौद्गलायनको | इस सभामें जो सप विषय गृहीत हुप थे, उनमें कितनों मृत्युफे बाद ७०००० हजार मिक्ष मों और तथागतके | हो का इस समा पएडन किया गया। इसी कारणसे परिनिर्वाणके समय १८००० भिक्ष गौने देहत्याग किया। मदीशासक और महासर्यास्तियादियों के संकलित यिनय. है। इस तरह प्रधान प्रधान सब मिक्ष भोंके देहत्याग के साथ महासांघिकोंके विनय कुछ कुछ पार्यपप करने के बाद तथागतके उपदिष्ट विनय, सूत्र और मातृका दिखाई देता है। या धमिधर्म फिर कोई शिक्षा नहीं करता था। इस जो हो, सम्राट अशोकके समय पिनपपिटक यथा. • कारणसे बहुतेरे लोग नाना रूपसे पारोप करते है। इन रोति लिपिबद्ध हुमा था यह हम प्रियदशीकी मावा-मनुः गइयों को मिटाने के लिपे महाकश्यपने निर्वाण स्थान शासन लिपिसे जान सके है। भोटके दुल्वमन्यमें चार .कुशिनगरमै सभोको एकत्र करनेको इच्छा प्रकट की। प्रकारफे विनियों का उल्लेख है। जैसे--विनययस्तु, किन्तु इसो समय स्थविर गांपतिक निर्वाणलाम करने | पिनययिमन, पिनयासक मौर धिनयोत्तरमन्य । पे समी rot xx] -100