पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५०५

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विनष्टतेजस-विनायकपुर

४१६ हुा ।' ४'क्षयित, जो विकृत या खराब हो गया हो, विनाभव (सं० पु०) विना भू अप। १ विनाश । २ जो व्यवहारफे योग्य न रह गया हो, जो निकम्मा हो | विरह । गया हो। ५ अतीत, जो बीत गया हो। विनाभाय (सं० पु०) पृथकत्यहीन, वियोगविहीन । विनष्टतेजस ( स० वि०) विनष्ट तेजोयस्य । तेजोहीन, विनाभाधिन (सं. नि०) व्यतिरेक भावनाकारी, धि- जिसका तेज नष्ट हो गया हो। विनय ( स० स्त्री०) वि-गश-क्तिच् १ विनाश। विनाभाष्य (स निक) विनाभावयुक्त, जिसमें भाय ग .२लोप। ३ पतन। विनस (स० वि० ) विगतो नासिका यस्य, नासिका विनाम (सं० पु० ) वि.नम-धन । १ नति, झुकाव, टेढ़ा- शब्दस्य नसादेशः । गतनासिक, नासिकाहीन, जिसे | पन । २किसी पीड़ा द्वारा शरीरका झुक जाना । नासिका ग हो, विना नाकका, नकटा । - पर्याय-विप्र, ( विनायक (सं० पु०) विशिष्टा नायकः। १ बुद् । २ विख, विनाशक। गगड़। ३चिन्न, वाघा 18 गुरु। ५गणेश । स्कन्दपुराण- विना (सं० अव्य०) वि (विनाभ्यो नानागौन सह । पा) में विनायकके अवतारको वर्णना लिखी है। गाय और ५।२।२७) इति ना। १ यज्जैन। पर्याय-पृथक, चैष्णव ये दो विनायक गण हैं। अन्तरेण, ऋते, हिकक, नाना । (अमर) २ व्यतिरेक, छोड़ देवताको पूजा किये जाने पर पहले विनायकको पूजा कर, अतिरिक्त, सिया । ३ अभावमें, न रहनेको अवस्था करनी होती है, बिना विनायकको पूजा किये कोई पूजा में, वगैर। हो नहीं करनी चाहिए, करनेसे यह सिद्ध नहीं होती (पृथग विनानानाभिस्तृतीयान्यतरस्या । पा २२३३२) पृथक | तथा पूजाके वाद कुल देवताको पूजा करनी पड़ती है। विना और नाना शब्दके योगमें द्वितीया, तृतीया और ६पीठस्थान विशेष । यहाँकी शक्तिका नाम उमा- पञ्चमो विभक्ति होती है। देवो है। (देवीभागवत ३०७१) विनायत ( स० वि०) विना अन्तरेण कृतम् । त्यक, विनायक-बहुतेरे प्राचीन प्रन्यकारों के नाम | १ तिथि- छोड़ा हुमा।. प्रकरणके प्रणेता। २ मन्त्रकोपके रचयिता। ३ विर- विनाति ( स० स्त्री० ) त्याग, व्यतिरेश। हिणी-मग्नोबिनोदके प्रयनकर्ता । ४ पैदिकच्छन्दः चिनागढ़-एक प्राचीन नगरका नाम। प्रकाशके प्रणेता। ५ नन्दपण्डितका एक नाम । ६ एक विनार (स० पु०) चर्मनालो, थैली । (शतपथबा० कषि। भोजप्रवन्धमें इनका उल्लेख है। पडगुरुके ५३।२।६) २ मद्यप। पिनाडिका (सं० स्त्री०) विगता नाडिका यया। एक एकतम । ८ शाहण्यायनमहाब्राह्मणभाष्यकार गोविन्दके गुरु। घडोका सांठवा.भाग, पल । दश गुरु अक्षर उम्पारण करनेमें जो समय लगता है, उसे. प्राण कहते हैं । दश विनायककेतु ( स० पु०) गरुड़ध्वज, श्रीकृष्ण । विनायकचतुश्री (स० स्त्रो०) माघ महीनेकी शुक्ला. प्राणमें एफ पिनाडिका काल होता है।। चतुषों, गणेशचतुर्थों, इस दिन गणेशका पूजन और व्रत यिनाड़ी (सं० स्त्री० ) विनाडिका नामक कालमेद। ___. होता है। सरस्यतो पञ्चमोके पहलेका दिन विनायक- (वृहत्स० २ म०) पिनाथ (सं०नि०) विगतः नाथो यस्य । विगतनाथ, - चतुर्थी है। भाद्रमासकी शुक्लाचतुर्थी भी गणेशचतुर्थी · प्रभुरहित, जिसका कोई रक्षक न हो, अनाथ। - कहलाती है। यह ग्रन करनेसे बड़ा पुण्य होता है। '। (रामायण ॥३५॥४५) । भविष्योत्तरपुराण और स्कन्दपुराण, विनायक प्रतका शिर उल्लेख है। (गणेशचतुर्थी देखे। विनादित (सं०नि०)शब्दित। २ पुनद्वित। चिनायकपुर (स' क्ली) एक प्राचीन नगरका नाम । .. . ..' ' . (दिव्या ५४०१६) : . . .:. :(दग्वि०५३०१३)