पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५१

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झप वाटीदीर्घ-बाड़ेयोपुत्र परमात्मने स्वादा-मन्त्र द्वारा विषणुकी-पूना की जाती है । घाट्यालिका (स.स्त्री० ) लघु पाट्यालक, छोरा इसके बाद श्रीवासुदेव और पृथ्योकी करनी होती है। परियारा। इस प्रकार पूजा करके स्वगृह्योक्त विधि द्वारा शाल- | वाट्यालो (सं० स्त्री० ) वाट्याल गौरादित्वात् डोप । होम-करना पड़ता है। इसके उपरान्त दक्षिणान्त तथा वाट्यालक, पीजयंद। मच्छिद्रावधारणादि करके कार्य शेप करना चाहिये। वाड़ ( स० पु०) धातनामनेकार्थत्वात् पाड़-घेटने भाये पीछे ब्राह्मणभोजन तथा समर्थ होने पर आत्मीय स्वज- | पोजन नाम परासीय बा| घम्। चेटन, वेठन । नादिको भोजन करना चाहिये। वाडभीकार ( स० पु. ) यड़भोकारवंशीय एक धैयाकरण. पाटीदोध ( स०'पु०) वाट्यां वास्तुभूमी दोघः सर्वोच्च का नाम । (अगों प्रा० ३२६) स्वात! 'इत्कटवृक्ष। वाडभीकार्य (संपु०) घोडभीकोरवंशोद्भव । (पा ४१११५१) याटक (संलो०) भृष्ट यब, भुना हुआ जी। वादब ( स० पु०) या यज्ञान्तःस्नानं याति प्राप्नोति घाहदेव (स० पु०) पक राजाका नाम । पाड़-वा-क। १ ब्राह्मण। पड़वायां घोटक्या जाता .(राजतर० ७ १३॥३) वड़वा-अण। २ यहचानल । पर्याय-ओन्ध, सघर्शक, घाटय-(-० को०) चाट्यालक, वला, यरियारा । अध्यग्नि, बड़वामुख । ३ पडवासमूह, घोड़ियोंका पाटयक (स: ली०) भृष्ट यय, भुना हुमा जी। ४ वडवा-सम्बन्धो। याट्यपुरुष (स'० क्लो०) १ चन्दन। २ कुङ्कम, फेसर।। "चाइयकर्ष (सं० लो०) उत्तरमें स्थित एक गांव । पाट्यपुष्पिका (सत्रो०) वाट्यपुष्पी, पला। . (पा ४२११०४) पाट्यपुष्पी (स. स्त्री०) वाट्य वाट्यां साधुओएनीय वायहरण । सलो०) घोड़ी ले कर भागना । या पुष्पं यस्याः गौरादित्यात् डीप-। वाट्यालक, पला, याडवहारक (म. पु.) वडवा अपहरणकारी, यह जो वीजवंद। घोड़ी चुराता हो। घाट्यमए (म पु०) यवमएडविशेष, थिना भूमी या पाडवहार्य ( को०) घडयाहत कोतदासका कार्य । .लिकेदले हुए जौका मोड़ । एक भाग दले हुए जो बाइयाग्नि ( स०पु०) १ समुद्रके अन्दरको भाग २ चौगुने पानी में पकानेसे वाट्यमंड पनता है । वैद्यक में यह समुद्री आग: यह भाग जो समुद्र में दिखाई देती है। हल्का वचिकर, दोपन, हद्य तथा पिरा, -श्लेप्मा, पायु चाडवास्तिरम (म0पु0) म्यौल्याधिकारमें रसौपघ. और आनाइनाशक कहा गया है। विशेष। इसके बनानेको तरोका-पिशुद्ध पारा, गंधक, पाटया (सस्त्री०) घट्यते चेष्टते इति वट-वेष्टने ण्यत् तावा और हरताल का बराबर बराबर माग ले कर यद्वा घाटयां वास्तुप्रदेशे हिता, घाटी यत् राप्-।- वाट्या | आरके धमें एक दिन महन करके गुजा भरकी गोली लफ, योजयंद। . बनाये। यह औषध मधुके माथ चाटनेसे स्थौल्यरोग चाट्यापनी (स. स्त्री० श्वत याटयालक, -सफेद । प्रमित होता है। बीजपंद। (चरकसू०.४ म०) पाड़वानल (मपु०) घड़गानल, चाइयाग्नि । । घाट्याल (म.पु.) बारी-अनि भूपयतोति अल अण् । पाइयेय (म.वि.) पड़वा ( नद्यादिभ्यो दक् । पारा) याटयाला, वीजयंद। . इति ढक। बड़वानल, यड्या-सम्बन्धी। पाटयालक (सपु०) याट्याल एव स्वार्थे फन्, चारों ! वाइश्य ( को०) पाइयानां समूदः (माझयभानव. अलति भूषयनोति अल-घुल था। १ परियारा, बीज- श्यायन । पा ४५४२) इति समूदायें यन् । 'याड़य. 'पंद। पर्याय-शीतपाकी, पाट्या, भद्रादनी, घला, समूह, घोडियों का झुड। .. . . पाटो, विनय, पाट्यालो, घाटिका। २ पीतपुष्पचला. या पीपुत्र ( पु) एक वैदिक भाचार्यका माम। पीला योजयंद। " . . Vol. XXI. 12