पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५१३

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४२७ विन्दुनाग-विन्दुसरस. याता बाहर हो कर नवोप, पृन्दावन मादि नाना | योले, 'हे भगवन् ! आप सर्वाव्यापी है सही, फिर भी सप स्थानोंका भ्रमण कर लौट आते हैं। साम्प्रदायिक मत | जीवों की विशेषत: मोक्षामिलापो व्यक्तियों को भलाईके प्रहण करने के बाद जो इस तरह यात्रा प्रवृत्त होते है, लिये आप इस पञ्चनर तीर्घा में अयस्थान फरे' तथा मेरे घे ही यथार्थमें वैष्णयपद प्राप्त कर देवपूजा और | नामसे प्रसिद्ध हो कर भक्त और अभक्तको मुक्ति प्रदान मन्त्रोपदेगदान के अधिकारी होते है। करें।' ऋषिके पाषय पर प्रसन्न हो कर श्रीविष्णुने महाग विद्यारियों को व्यस्था कुछ और ही है। कहा, 'तुम्हारा माधा नाम अपने नाम के आगे जोड़ कर थे इस तरहकी तीर्थयात्राको आवश्यकता नहीं समझते ।। मैं विन्दुमाधव नामसे प्रमिद हो काशो याम करूंगा। किन्तु ग्वण्डेत प्रभृति विदुधारी साधारणतः इस | सोपापनाशक यह पञ्चनदतो मानसे तुम्हारे नाम तरहकी तीर्थ यात्रा करते हैं और पे ही प्राह्मणशूद्रादि। पर 'बिन्दुतीर्ण नामसे प्रसिद्ध हुआ। इस पञ्चनद गातियों को मन्त्रदीक्षा देते हैं। तो में जो स्नान और पितरों का तर्पण कर विन्दुमाधयके ___सागदायिक किमी व्यक्तिको मृत्यु होनेसे ये शय दर्शन करते हैं, उन्हें फिर कभी भी गर्भवास यन्त्रणाका देहको जलाने और यहां की मिट्टी कोड़ कर दूसरी जगह | भोग नहीं करना होता ।' कार्शिक मासमें सूर्योदय एक घेदी बना कर उस पर तुलसीका पृक्ष रोपते हैं। कालमें ग्रलवर्यपरायण हो यदि कोई विन्दुती स्नान मृत्युके दिन गयके समीप ये लोग अन्न रन्धन कर रखने करे, तो उसे यमका भय नहीं रहता। यहां चातुर्मास्य और घेदी प्रस्तुत होने पर उसके समीप एक पंखा प्रत, अमावमें फार्शिकीवत अधया केवल ब्रह्मचर्या का और एक छाता रख दिया जाता है । नौ दिन तक | अवलम्बन कर विशुद्ध चित्तसे कार्तिक मास विताये, अशीच मनाया जाता है। 'दश दिग पे गाध श्राद्ध दीपदान या विष्णुपाता करनेसे मुक्ति दूर नहीं रहती। करते है शोर इसके उपलक्षमें स्वसम्प्रदायो धैष्णय. रधान एकादशीको विन्दुनी में स्नान, विन्दुमाधयकी को आमन्त्रित कर भोजन कराते हैं। किसी प्राचीन गौर| अर्चना और रात्रि जागरणपूर्वक पुराणश्रवणादि करने. प्रवीण व्यक्तिको मृत्यु होने पर पे दाहके बाद मृतककी से जन्मभय नहीं रहता । ( काशीख०६० अ०) हड़ो ले कर अपनो यास्तु या उद्यास्तु भूमिमें गाड़ देते हैं | विन्दुर (स० पु०) किसी पदार्थ पर दूसरे रंगके लगे भोर प्रति दिन दिनमें पुष्पचन्दन द्वारा उसकी अर्चना करते हुए छोटे छोटे चिह, युदकी । . है तथा सन्धया उपस्थित होने पर दीप भी जलाते हैं। विन्दुराजि (स'० पु०) राजिमान्सर्पविशेष, एक प्रकार- पिन्दुनाग-राजपुतानेके फोटा राज्यान्तर्गत शेरगढ़ राज्य का साप। के एक सामन्तका माम। - विन्दुरेखक (सपु०) विन्दुविशिष्टा रेखा यत्र कन् । विन्दुगन ( म० पु.) बिन्दुः पत्रे यस्य । भूज पृक्ष, पक्षिभेद, एक प्रकारको चिडिया। भोजाबका पेड़। . विन्दुल (सपु०) अग्निप्रकृति कोरविशेष, अगिया नामका विन्दुमति (सं० स्त्री० ) विन्द मती देखो। कीड़ा जिसके छूनेसे शरीरमे फफोले निकल भाते हैं। विन्दुमतो (सं० स्रो०) राजा शशिबिन्दुको कन्याका नाम|| विन्दुवासर ( स० पु०) विन्दुपातस्य यासयः। सन्ता- विन्दुमाधव-काशोको एक विष्णुमूर्ति। एक समय | नोटप्रतिकारक शुकरात दिन। भगशन उपेन्द्र चन्द्रशेखरको अनुमति पा कर काशो | विन्दुमरस ( स० क्लो०) विन्दुनामक सः । पुराणोक्त । नगरो भाये। यहां ये राजा दिवोदासको काशीसे | सरोवरविशेष। मत्स्यपुराणके. मतसे इस बिन्दुसरफे निकाल पादोदक तीर्थ केशवरूपमें अबस्थान कर पचनद उत्तर फैलास, शिव और सौ पधिगिरि, हरितालमय तीर्थको महिमा प्रचार कर रहे थे। इसो समय अग्नि-1 गौरगिरि तथा हिरण्यङ्गविशिष्ट सुमहान् दिव्योपधिमय 'बिन्दु नामक एक ऋपने उन्हें स्तव द्वारा संतुष्ट किया। गिरि है। उसीके नीचे काश्चनसन्निभ एक बड़ा दिश्य 'भगवान्ने उनसे पर मांगने के लिये कहा। इस पर ऋषि सर है, इसोका नाम. विग्दुसर है। भगीरथने गङ्गाके