पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५२२

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. • विन्ध्याचल ..

में एक साधारण हामफुण्ड भो स्थापित होता है । गण्डा ? ऊंचो ४/५ फुट लम्यो कुलंगी देवी प्रतिमा रखी हुई है हो इसे प्रज्यलित करते हैं और नित्य समायी और देवी-, यद भी एक पत्थरमें खुदी हुई है। .. दर्शनार्थी यात्री घ्राह्मण जो चबूतरे पर धैठ कर होम : . भोगभायाके मन्दिरमें फूल.और जलाबलि दे कर पूजा . नहीं करते। वे देवीदर्शन के बाद तीन या पांच,पार | की व्यवस्था है। यहां केवल पुष्पांजलि देनी पड़ती है। माहुति दे कर चले आते हैं। इस मन्दिरमें बलिदानको | यहां सब जातिके लोगोंका प्रवेशाधिकार है। यहां बलि व्यवस्था बड़ी लोमहर्षण है। परिणतवयस्क पशुको हो | दान के यूपकाष्ठ है, किन्तु बलिको बहुलता नहीं। गुहाको यलि देनेकी शास्त्र में व्यवस्था है, किन्तु यहां ६-८ दिनके बगल इस मन्दिरमें एक शम्बूकापर्श पथ है। उससे हो - घरका भी बलिदान दिया जाता है। यलिदानके पशुमो. / कर गर्भस्थानमें पहुंचने पर एक काली प्रतिमा दिखाई . में ऐसे हो शिशु वरोंकी संख्या सैकड़े पीछे ७५ है।। देती है। यह मूर्ति भी पत्थर पर खुदी हुई है। पण्डो. ' दुर्गोत्सवफे समय यहां नवराति उत्सव होता है। उस का कहना है, कि यह काली फंस राजाकी इष्टदेवो थीं। '. समय नौ दिन तक भोगमाया देवीको प्रतिमा एक हलदीसे ध्रीकृष्ण जव मधुरासे, द्वारका चले गये, तब साकुओंने . रंगे हुए गमछेसे ढकी रहती है। इस भोगमायाके निकट मथुराको लूट लिया और उन्होंके द्वारा यह मूर्ति यहां हो नानकशाही एक आस्ताना है । सन्ध्या समय इस | : लाई गई है। भास्तानामें प्रन्थ साहवको मारति गौर स्तोत्रपाठ होता है। योगमायाफे मन्दिरके चबूतरे पर बड़े हो कर मीचे यह स्तोत्रपाठ सुनने में बड़ा मनोरम लगता है । भोगमाया | : सूत्राकारमें गङ्गाका प्रवाह देखने में बड़ा सुन्दर लगता के घाट पर खड़े हो कर वगलमें मत्युग्ध विन्ध्यशैलधौत है। योगमायाके मन्दिरसे नीचे जमीन पर रेल चलती हुई गंगाकी तरंगलोला और दूसरी ओरमें समतल फसलवाले देखनेसे मालूम होता है, कि दियासलाई के डिब्बेको ट्रेन खेतोंके ऊपरसे गंगाकी प्रमादलोला बहुत सुन्दर दिखाई | जा रही हैं। । . . देती है। योगमायाके मन्दिरको वगल में सीताकुण्ड, अगस्त्य- मिर्जापुरका रास्ता पकड़ कर एकासे जाने पर तीन | कुएड और ब्रह्मकुण्ड नामके तीन तीर्थ है। ब्रह्मकुण्डको घण्टामें विंध्याचल के मूलशिखरमालावे. पाददेश तक पहुंचा चारों ओर देखने पर मालूम होता है, कि किसी समय जाता है। इस स्थानमें एक सुन्दर धर्मशाला है। यात्री। यहां एक जलप्रपात था। यहां समतल भूमि बड़े हो कर यहां एक दिन एक रात रह सकते हैं। इस धर्मशालाके | ऊपरको देखनेसे भय-विस्मयसे एक अननुभूत तृप्ति उत्पन्न पगलसे योगमायाके मन्दिरके चूड़ा पर चढ़ना पड़ता है। होती है । जलप्रपातजात पातीय स्तरनिचय द्वारा यह चूहा यहां सबसे बड़ी ऊंची है। पथ दुरारोह पर्वतशिखर अधिक ऊंचाई पर दिखाई देता है । नीचे नहीं, किंतु कहीं तो पर्वतगात्र पकड़ कर हो चढ़ना पड़त . समतल भूमि पर इस समय वर्षाका, जलवाहित नाला है या कहो कही सीढ़ियां भी बनी है। भोगमायाका | गङ्गामें जा कर, मिल गया है। दोनों बगल में वृक्ष- मन्दिर जैसे जोड़ाईसे बना है वैसे योगमायाका मदिर राजिको गभीर छायाकी वजहसे अन्धकार है । प्रपातके नहीं बना है। योगमायाका मदिर एक पर्वतंचूड़ाको | शीर्षस्थानमें एक लम्बे सेमरका वृक्ष मानो चूड़ा रूप, चारों ओरसे छिल कर मंदिराकृतिका तय्यार किया गया अवस्थित है। .. अाधे पथमें एक प्रस्रवण और कुण्ड है । है। इसके भीतर एक गुहा योगमायो अवस्थित हैं। इस कुएड भी अति सामान्य है। पर्वतको दरारसे अनवरत । गुहाका द्वार बहुत तंग है। कोई आदमो खड़े हो कर इस । बुन्द बुन्दसे जलकुण्डमें पड़ता है। यहां स्नान के सिना "में प्रवेश नहीं कर सकता-शिर झुका कर जाना होता | अन्य कोई तीर्थकृत्य नहीं है। इससे कुछ दूर पर सीता. है। मोटी देहवालॊको प्रवेश करनेका कोई उपाय नहीं। फुण्ड है । सोताकुण्डके निकट सीताजीको रंधन ये मदिरके एक छिद्रमे देवीका दर्शन करते हैं। मंदिर- .शाला है। यह केवल एक :मकानका भग्नावशेष है। " • गुहामें श्राद आदमो-यैठ सकते हैं। यहां भी एक दो फुट सीताकुण्डका जङ्गल बड़ा उपकारी है। प्रामोंके अधिवास