पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५२६

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२ विपर्यस्त-विपाक हैं। माल्यकारिका) विशेष विवरण अविद्यादि शब्दमें देखो । , विषधन - ( स० त्रि०) वि-पू-युट । १.वि । 'इधरका उधर, · उलटे 'पुलर। ४ भ्रम, भूल | पवित्र करनेवाला । (पु.)२ पिशुद्ध पवन ५ सयवस्था, गड़बड़ी ।। ६ नाश ! ... या। विपर्यस्त ( स० ति० ) · वि-परि-शस्त । १ जिसका | विषवना (स. स्त्री०) विशुद्धा पचनी पस्या, 'विपर्यय हुआ हो, जो उलट पुलट गया हो । २ अस्तव्यस्ता साप। जिसमें विशुद्ध वायु हो। 'गड़बड़, चीपट। ३ परावृत्त । विपथ्य (स' त्रि.वि.पू-यत् ( मचो यत् । पा.३१॥ विपर्याण (स.लि.) विपर्याय, व्यक्तिकम। शोधनीय, गोधन करनेके योग्य। . . विपर्याय (. पु०) विगतः पर्यायो यस्य, वि-परि-इ-धम् । विपशिन ( म० पु. ) एक युद्धका नाम । (हेम पर्यायका व्यतिक्रम, क्रमपरिवर्शन, नियमभंग।. विपशु (सनि०) पशुरहित, पशुशून्य। . ' विपर्यास (सं० पु०) वि-परि अस धम् । १ विपर्याय, विपश्चि ( स० वि०) विपश्चित, पण्डित ।', ' उलट पुलर; इघरका उधर । ' ( अमर ) २ आप्रमात्मक विपश्चिक (स. पु०) पण्डित । (दिव्या० ५४८) बुद्धिभेद, मिष्यासान, औरका मोर समझना । जो विपश्चित् ( स ति.) बिप्रचित् किप विशेष' । यथार्थमे वह नहीं है, उसे . गही जाग कर जो अयधार्थ पिप्रमष्ट चेतति चिनोति चिन्तयति -या पृषोदरादि शान उत्पन्न होता है, उसका नाम विपर्यास है । जैसे- रज्जु सर्प नहीं है फिर भी मप्रमात्मक छानके कारण अर्थात् शारत्रका यथार्थ अर्थ. जिसको नजरमें उसे सई समझते हैं । भाषापरिच्छेदमें लिखा है, कि ! जो उत्तम ज्ञानी अर्थात् सम्यफरूपसे तस्वम हो जिस वस्तुमैं जो नहीं है (जैसे शमें कभी पीतपर्ण ! उत्तमरूपसांचयन : (शास्त्रका मर्मार्थ संप्रद ) कर नहीं है ) उस वस्तु में तस्मकारक जो घुद्धि हैं, उसे ठाप्रमा हो, जो उत्तम चिन्तामोल हों, अर्थात् चिन्ता द्वारा धुद्धि कहते हैं । यह अपमा बुद्धि अर्थात् भ्रमबहुल पदार्थका निर्णय करने में समर्थ हो, जो पण्डित हों पदा में विस्तृत होनेसे उसका नाम विषयांस पड़ा है। विद्याम् हो, जो सार्थतस्दी हो. वे हो विपर्छ जैसे हमें आत्मधुद्धि मादि। सच पूछिपे तो शरीरमें कहलाते हैं। . . . आत्माके गुणक्रियादि कुछ भी नहीं है, फिर भी विपश्चित { लि.) पण्डित.। । विपश्चित् देखो। मात्मक शामके कारण बहुतेरे शरीरको ही मारमा.मानते विपश्यन (सी ) बौद्ध मत, प्रकृत मान, यथार्थ है। . .. विपश्यना ('स'. स्त्रो०) सूक्ष्मदर्शिनो, दिव्यबुद्धि ३ पूर्णसे विगद्ध स्थिति, एक वस्तुका दूसरे स्थान पर र्यामित्व शक्ति। ।। ।। ..... " होना। ४सी चाहिये. उससे विरुद्ध स्थिति, औरका । विपश्यिन् ( सं० पु०) घुद्धभेद ।।... ' विपस् (स. क्लो०) १ मेधा, बुद्धि। .२ जान, स. विपर्च (स त्रि०) विगत पय सन्धिरधान' यस्य । विपांशुल ( स.लि.) पांशुलरहित । : (भारत बना चिच्छिन्गासन्धिक, जिसके शरीरका जोड़ विश्लिट हो । विपाक (स' चिपन-भावे कर्मणि वा गया हो। . . . ___.. .. . १ पचन, पाफ। (भागवत्ता५।१६।२०) २ स्वेद, पसी विपल ( सी० ). विभक्त' पल': येन। सरयका ३र्मका फल- ४ फलमाल। ५. एक अत्यन्त छोटा विमाग, एक पलका साठवां भाग! कर्ण) : अर्थात् ६० विपलको एक पल, ६० पलका एक दण्ड,६०, दण्डका एक अहोरात। . ) . !! विपाक है। विपलायन ( स० नि०) पलायनकारी, भागनेयाला होता है, ... विपलाश (सनि०) पत्रहीन, विना परोका। .. १° पलहान, विना पत्रकार का होता है और। । . परिणामी उसका जो माला 1. यह तोलन