पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५२८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


४४४ विपाक गहो सकता, क्योंकि मदृएजन्मयेवनीय अनिपतविपाक - अदृष्टजन्मवेदनीय अनियतविपाक, कर्मराशि नष्ट हो कर्माशयको तीन गतियां हो जाती हैं। पहले तो विपाक ! भो सकती है। प्रधान, कर्मविपाक समयमें भावापान, उत्पन्न न हो कर ही कृतकर्माशयका नाश हो सकता है। ( सहायक भारसे अवस्थान). कर भी सकता है अथवा . दूसरे प्रधान कर्मविपाक समयमें आवागमन अर्थात् प्रधान फर्म द्वारा अभिभूत हो फर चिरकाल जयस्थिति : यागादि प्रधान कर्मके स्वर्गादिकप विपाक होने के समय } कर सकता है, जब तक सजातीय कर्मान्तर अभिव्यक्त हो हिंसादिकृत अधर्म भी कुछ दुःख पैदा करा सकता है। उसको फलाभिमुख न करे। तीसरे नियत विपाकप्रधान कर्ग द्वारा अभिभूत हो कर . अदृष्टजन्मवेदनीय अनियत विपाक कराशिकी ही चिरकाल अवस्थित भी कर सकता है। विपाक उत्पादन | देश, काल और निमित्तको स्थिरता नहीं होती, इसोसे । न कर सञ्चित फर्माशयका नाश जैसे शुक्लकर्म अर्थात् कर्मगतिशास्त्र में विचित्र कही गई है और भी कहा गया तपस्याजनित धर्म का उदय होने पर इसी जन्ममें ही कृष्ण | है, कि जन्म, मायु और भाग इनके पुण्य द्वारा सम्पादित अर्थात् फेवल पाप अथवा पापपुण्यमिश्रित फर्मराशिका | होने पर सुखका कारण और पाप द्वारा सम्पादित होने नाश होता है। इस विषय में कहा गया है,-पाणचारी पर दुःखका कारण होता है। मनात्मान पुरुषकी असंख्य कर्मराशि दो प्रकार है, एक " हादपरितारकला:-पुपयापुपयहेतुत्वात् ।" कृष्ण अर्थात् केवल अधर्म दुसरी, शुक्लकृष्ण अर्थात् पुण्य- . . (पातललद० २।१४). पापमिश्रित । इन दो तरह कम्मों को पुण्य द्वारा गठित ___ 'जन्मायुभॊगा पुण्यहेतुकाः सुनफलाः अपुण्यहेतुकाः एक कर्मराशि नष्ट कर सकती है। अतएव सयको सुशत | दुःखफला इति ।' (भाष्य). शुककर्म के अनुष्ठानमें तत्पर रहना उचित है। ' पूर्योक जाति, आयु आर भोग पुण्य द्वारा साधित होने प्रधान फर्म मावापगमन विषपमें कहा गया है, कि पर सुखका जनक तथा पाप द्वारा साधित होने पर दुखका स्वल्पसङ्कर अर्थात् यज्ञादि साध्यकों के खल्पका (योगा. जनक होता है। सर्गजनप्रसिद्ध दुःखका असा प्रतिकूल नुकूल हिंसाजनित पापका) सङ्कर होता है, सांमिश्रण भो स्वभाव है, वैसा ही चैपयिफ सुखके समय, मी पोगियों. होता है। सपरिहार अर्थात् हिसाजनित यह अल्पमान अधर्म प्रायश्चित्तादि द्वारा उच्छेद कर दिया जाता है। हो समझते हैं। को दुःख हो अनुभव होता है, अतः ये विषयसुखको टुख सप्रत्यवमर्ष अर्थात् यदि प्रमावशता प्रायश्चित्त नही जाम और आय संख तथा दाखके कारण हो सकत किया जाय, तो प्रधान कर्मफलके उदयके समय यह मल्प' । हैं, किंतु भोग कैसे कारण हो सकता है १. पर ऐसी ' मात्र अधर्म भी स्वकीय विपाफ अर्थात् अनर्थ उत्पन्न | आशंका की जा सकती है, फि सुखदुःख ही विषयभावमै ' करता है। फिर भी, इस सुखभोगके समय सामान्य | . भोगका ( अनुभवका ) कारण है। इसका समाधान इस , दुःखवाहिकणिका सह्य की जाती है । कुशल अर्थात् पुण्य तरह-जैसे मोदनादिको भी फारक कहते हैं, फलतः यह राशिफे अपकर्ष करने में यह मल्पमात्र अधर्म समय नहीं | क्रियाका परयत्तों है । सुतरां क्रिपाजनक नहीं है। क्रियाके होता, क्योंकि उक्त सामान्य अधर्गको अपेक्षा यागादि- | जनकको हो कारक कहते हैं। फिर भी, जिस उद्देश्यसे । धात धर्मको परिमाण अधिक है जिससे यह शुद्र अधर्म " जो क्रिया होती है, उस उद्देश्यको भी कारण कहा अप्रधानभायसे रह कर स्वर्गभोगके समय अल्प परिमाण- जाता है भाग हो पुरुषार्थ है सुख दुख नहीं । भागके से दुःख उत्पन्न करता है । तृतीय गति यथानियत विपाक- 7 निमित्त हो सुखदायका माविर्भाव होता है. अतएव. में ऐसे प्रधान कसे अभिभूत हो कर चिरकाल अय- मोगको भी सुखदानका कारण कहा जा सकता है। स्थान करता है। क्योंकि गटजन्मवेदनीय नियत विपाक कर्मराशिष्ठी मरण द्वारा अभियको विवेकशालो योगोके लिये विषयमान ही दानकर घेदनीय अनियतषिपाक कर्मराशि सी मरण समय - है, क्योंकि भोगका परिणाम अच्छा नहीं, क्रमशः इससे अभिव्यक्त नहीं होती। ..वष्णाफी वृद्धि होती है। ..भागके समय पिराधीके प्रति