पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५३१

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४५१ । विमतारित-वितिसार विप्रतारित ( स० वि०) पशित। . पादानात्शब्दान्तर प्रयोगे द्रव्यान्तरप्रसङ्गात् ।' विप्रतिकूल (स'. नि.) विरुद्धाचारी। (एकादशीतत्त्व) विप्रतिपत्ति (सं० स्त्री०) वि प्रति पद क्तिन् । १ विरोध। प्रतिनिधि प्रभृति स्थलमें शब्दकी अविप्रतिपत्ति २ संशयजनक घाफ्य | "व्याहतमेकार्थ दर्शनं विप्रति- | ( अविकृति ) होगी। अर्थात् जो ट्रव्य प्रतिनिधि होगा, पत्तिः" 'याघातो विरोधोऽसदभाव इति । अस्त्यात्मेत्येक प्रयोगके समय उसका नाम उचारित न होगा । जिसके दर्शनं नास्त्यात्मेत्यपरम् न च सदुभावासद्भायो सह अभावमें यह द्रव्य प्रयुक्त होगा, उसीके नामकरणमें इस एकत्र सम्भवतः, न च अन्यतरसाधको हेतुरुपलभ्यते | प्रतिनिधि द्रव्यका प्रयोग करना होगा। असे पूजामत तत्रतस्यान धारणं संश्रय इति।' आदिमें देखा जाता है, कि किसी दयका अभाव होने (गौतम स० १२३ वात्सायनभाज्य ) पर उस स्थानमें अरवा चावल दिया जाता है। जिस वाफ्यमें दो पदार्थों का विरोध, असहभाय किन्तु कहने के समय कहा जाता है-"एष धूप" यह (अर्थात् एकत्र अवस्थानका अभाव ) दिखाई दे, यही धूप, "एप दीप: यह दीप, "एपोऽर्य:" यह गलो, "देव- संशयजनक वाक्य या विप्रतिपत्ति है। जैसे कोई कहता। ताये नमः' देवताके उद्देशसे में प्रणाम करता हूं। फलतः है, कि आत्मा (परमात्मा या ईश्वर) है, कोई कहता है, सब जगह ही धूप, दोप, अर्घ्य आदिकं प्रतिनिधिस्वरूप कि नहीं है। ऐसे स्थल में देखा जाता है कि रहना या न फेवल अरवा चायल दिया गया, किन्तु यह प्रतिनिधि द्रष्य रहना इन दो पदार्थों का एक एक अवस्थान किसी तरह । अरवाचायल) प्रयोग करनेसे अतद्रष्य ही (धूप, दीप, सम्भव नहीं। क्योंकि युक्तिक अनुसार निहि है, कि मा आदि) देते हैं, इस बुद्धिसे देना होगा। ऐसा सम आयतनक्षेत्र में एक समय उभय पदार्थको अपस्थिति व्ययहार न कर यदि प्रयोगके समय इस अरवा चायलका हो नहीं सकती अर्थात् वर्तमानमें जहां एक घड़ा रखा | हो नाम लिया जाये, तब शम्दान्तरके प्रयोगहेतु द्रप्यान्तर- है, यहां हो उसी समय दूसरा घड़ा नहीं रह सकता का ही प्रसङ्ग आ जाता है। यदि किसी स्थलमें घृतके या घडे का अभाव ( धड़े का न रहना ) हो नहीं | यदले तेल देना हो तो ऐसा हो समझना होगा अर्थात् सकता। अतपय "आत्मा है और नहीं" ऐसा सुननेसे मन्त्रमें तेलन कह नही कहना होगा। मात्माका रहना या न रहना इन दोनों का एक अव- विप्रतिवद्यमान (स.नि.) पापकारी, पाप करनेवाला। स्थानका अभाव. प्रयुक्त और उनका पक.ल अवस्थान विप्रतिपन्न (सं० त्रि०) विपति-पद-पत। विप्रतिपत्ति. एकत्र हो सता या नहीं, इन मघ विपों में अन्यतर | युक, सन्देहयुक्त । २ अस्वोकृत। ३ असिड, जो युक्ति निर्णय न कर सकने पर यह श्रोताके मनमें विप्र. सावित न हुमा हो। तिपत्ति या संशयजनक घाफ्य कहना प्रतीत होगा। विप्रतिषिद्ध (स.नि.वि.प्रति विध क्त । निपित, जिस. . ३ विपरीत प्रतिपत्ति, अख्याति । ४ निन्दित प्रति- का निषेध किया गया हो। (स्मृति )२विरुद्ध, मिलाप । पत्ति, मन्दमाति, कुनमः। ३निधारित, वर्जित। विप्रतिपचिरपत्तिपत्तिश्च निमइस्थानम् ।" विप्रतिवेध (० पु०) वि-प्रति-विध धम् । विरोध, मेल न (गो० स० १०२६) | बैठना। अन्यार्थ दो प्रसोको अर्थात् दो विधियोंकी 'विपरीता कुत्सिता वा प्रतिपत्तिविप्रविपत्तिः। ( सभाध्य) | एक प्राप्ति होनेसे उसको विप्रतिषेध कहते हैं। एक समय ५ अन्यथाभाय । जैसे छायाविप्रतिपत्ति, स्वभाय- | इस प्रकार समान बलको दो विधियोंकी प्राप्ति होनेसे विप्रतिपत्ति है । "अर्धात पचन्द्रियार्थविप्रतिपत्तिमध्याय / परवत्ती विधिके अनुसार कार्य करना होता है। प्यास्यास्यामः।" (सुश्रुत प० ३० म०) । । . विधि देखा। ६ विकृति । 'शब्देऽविप्रतिपत्तिः । ( कात्याशौ०) प्रति- वितिसार :(स.पु०) वि-प्रति-स्-धन या दीर्घः। निहित द्रव्येश्रतशम्दः योज्यः । तद्रव्यबुध्या प्रतिनियु, अनुताप, पछताया। क्रोध, रोप।