पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५३८

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४५८ विभाकर भाचार्य-विभाग .. . चीतका पेड़। ४ अग्नि १५ राजा । (नि०)६ प्रकाशशोल, गृति होने पर या उनको रजोनिवृत्ति - पूर्व पिताको प्रकाशवाला। रतिशक्ति निवृत्त होने पर यदि पिताको इच्छा हो, तो विभाकर आचार्य - प्रश्नकौमुदो नामक ज्योतिर्मन्थफे रच- वह सम्पत्तिका विभाग कर सकता है। पितृ द्वारा विभक्त पिता।

मनुष्य विभाग वाद उत्पन्न माताको भो.भाग देगे।

विभाकर धर्म-पक प्राचीन कयि । पिताके स्वोपार्जित धनमें वे अपना इन्छाफे अनुसार विमाकर शर्मन्-एक प्राचीन कधि । धनका विभाग कर सकते हैं। स्योपार्जित धनमें पिता विभाग (स० पु०) वि-भज पम् । १ भाग, अश, हिस्सा। संब तरहसे स्वतन्त्र हैं, किन्तु पितामह के उगर्जित धन- २दाय या पैक सम्पत्तिका गाविशेषरूपसे भाग या में ऐसा नहों हो सकता। स्योपार्जित धनसे पिता किस स्वत्वज्ञापनको विभाग काइते हैं। पुत्रको गुणो जान कर सम्मानार्थ अथवा भयोग्य जान कर भूहिरण्यादि अर्थात् भूमे भार सोना आदि स्थावरा कृपासे किंवा भक्त जान कर मतवत्सलताके कारण अधिक स्थावर सम्पत्तिमें उत्पन्न स्यत्वके किसी एक पक्षके हक : दानेच्छु हो कर न्यूनाधिक विभाग करें तो धर्मसङ्गत हो पनि विषयमें विनिगमना प्रमाणाभावसे यांत् एक- होगा। किन्तु इस तरहफे भक्तित्व आदिका पाई कारग - तर पक्षपाति-माणके अभायमें चैशेषिक नियनसे उस न रहने पर यदि पिता धनके घंटयारे में न्यूनाधिक करते सम्पत्ति विभाग अनुपयुक होने गौर इसके सपन्ध हैं, तो यह धर्मसंगत नहीं कहा जा सकता। किन्तु पूर्वोक सिवा इसके (वैशेषिक मतफे सिपा) दूसरे किसी तरह कारणांसे उनका ऐसा करना धर्मसंगत हो है । अत्यन्त की सुव्यवस्था आदि न रहनेसे गुटिकापातादि द्वारा जो . व्याधि और क्रोधादिके लिये भाकुलचिंत्तताके कारण या . खत्य निरूपण होता है, उसीका माम विभाग है। काम भादिक विषयमें अत्यन्त, आसकिके कारण पिता ___ अभिशता साथ विशेष विवेचनापूर्वक स्वत्यादिक : यदि पुत्र को अधिक या कम भाग दें अथवा कुछ भी न शनिकरणमा भयया जिससे विशेषरूपसे स्वत्यादि । तो उनका यह विभाग नहीं होता। परिशात हो सके, उसोको विभाग कहते हैं। ..., : पिता यदि पुत्रको भक्तिके कारण न्यूनाधिक माग देवर्षि नारदका कहना है किसी सम्पत्ति से पूर्ण , दें, तो यह विभाग शास्त्रसिद्ध और धर्म सङ्गन है । पिना • स्वामीका स्थत्य उपरत होने पर अर्थात् किसीकी त्याज्य ! यदि रोगादिसे प्याकुल हो कर न्यूनाधिक विभाग करें सम्पत्तिमें उसके बहुत दूरके उतराधिकारियों में शास्त्र या किसी पुत्रको कुछ न दें, तो वह विभाग असिद्ध है। अथवा प्रमाणानुसार नेकट्य सम्बन्धनिर्णयमे असमर्श ! किन्तु भक्तत्यादिके कारण दिना और वाध्यादिके कारण होने पर देशप्रथानुयायी नियमसे गुडगाटो ( गुटिकापात) ! अस्थिरचित्तता विना केवलं स्वेच्छापूर्वक न्यूनाधिक साल कर इन सब संपत्तियों का स्यत्य-निर्णय किया जाता विभाग करें, तो वह धर्मसंगत नहीं, किन्तु सिद्ध है। है, उसको ही विभाग कहते हैं। यदि पुत्र पक समयमें विभागको प्रार्थना करे, तो पिता धर्मशास्त्रनिवन्ध सम्पत्ति-विभागके सबन्धमें ऐसी भतत्यादिफे कारण असमान भाग न करें। . । व्यवस्था दिखाई देती है- . .. पुत्रों को समान भाग देने पर पुनहोना पनियांको भो पिताकी अपनी कमाई धन सम्पत्तिमें जब उनकी समान भाग देना होगा। भर्ता आदि स्त्रीधन न दन इच्छा हो, तभी विभाग हो सकता है, किन्तु पितामहक } पर (स्त्रियोंको ) समान अश देना उचित है । जिनका ': धनमे माताको रजोनिवृत्ति होने पर पिताको जब इच्छा ! 'स्त्रीधन दिया जा चुका है, उनके समान धन अपुता होगी, तभी उसका विभागकाल है।. ... पत्नियोंको पितादेंगे। ऐसा स्त्रीधन न रहने पर उनका माताकी जगह यहां विमाताको भी समझना होगा । पुन समभाग देना करघा है। परन्तु पुत्रीको कम क्योंकि, विमाताकै गर्भसे भी पिताका दूसरा पुत्र उत्पन्न । कर स्वयं अधिक लेने पर (पुत्रहीना ) पत्नीको अपने हो सकता है। यस्तुतः माता और दिमाताके रजोनि-मासे समभाग देना कर्तव्य है । यदि स्त्रीधन दिया गया