पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५४१

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विभाग और अपशिष्ट घनमें सबका समभाग होगा । (सपर्णा । यहो और माता भो यही हैं। उपेष्ठका भाचरण जो कनिष्ठा स्त्रोके गर्भसे उत्पन्न) ज्येष्ठ पुत्र एक थैल अधिक स्पेष्ठ नहीं करते हैं, यह बन्धु की तरह मान्य है। फिर पायेगा, (सवर्णा) ज्येष्ठा स्त्रोका पुत्र १ यैल और १५ गायें निर्गुण ज्येष्ठ के ज्येष्ठत्यके सम्बन्धमे विशोद्धारादि रूप ले। कनिष्ठाफे गर्भ पुलको जो उद्धार मिलेगा, उतना अधिक भागकी प्राप्ति निषिद्ध है। इसके बाद कुर्मः ही ज्येष्ठाके कनिष्ट पुत्रको मिलना चाहिये। ज्योष्ट | कारी म्रातामान हो विषय धनमें भाग पानेका अधिकारी इच्छानुसार पहले एक चीज ले और पशुओगे दश ले। नही है। इस वापसे गहित कर्म करनेवाले ज्येष्ठ ___ "सबको विशेषरूपसे समान भाग दिया जाये , आदि सभी भाई विषय पानेके अनधिकारी हैं और अधया ज्येष्ठ श्रेष्ठ द्रव्य या दश मागका एक भाग उद्धार; उदार प्राप्ति के लिपे ज्येष्ठत्व और गुणधरय दोनों ही कर ले, दूसरे समान भाग ले।" यह श्रुति वैौधायनके आवश्यक कहे गये हैं। यसनमें ज्यष्ठ । श्रेष्ठ हर और गाय मादि पक जातीय इस समय यधार्थ में उद्धार दामरहित ही हो गया है। पशुनि दशमें एक देनेको कहा गया है। फिर उद्धाराई भ्राताके रहने पर भी माताओं के उद्धार न चौधायनके मतसे-"पिताके अवर्शमान रहने पर देने पर वे अभियोग लगा कर नहीं ले सकते। चार वर्णो के क्रमानुसार गो, गश्य, पकरा, भेडा बड़े विवादमार्णयके रचयिताने कहा है, कि इस समय भाईको मिलेगा।" हमारे देश मे विंशोद्धारादिका व्यवहार प्रायः ही नहीं है। __नारद का कहना है, कि ज्येष्ठ का अधिक भाग दातव्य केवल कुछ द्रम्प, ज्येष्ठको मान-रक्षाकं लिपे दिया जाता है और कनिटको कम। अन्यान्य माई समान अशके है। यद्यपि ज्येष्ठ पुन्नरकनिस्तारादि पिताके महोपकार भागीदार है, और अविवाहिता वहन भी ऐसी ही करने के कारण मन्यान्य भ्राताओंसं कुछ अधिक पानेक अशोदार है।' गधिकारी है, तथापि यह दान कनिष्ठोंकी इच्छा पर ही देवलका कहना है, कि 'समान गुणयुक्त भ्राताओंको निर्भर करता है। क्योंकि किसी ऋपिने ऐसा नहीं कहा मध्यम भागमाप्य है मोर ज्येष्ठ माईक न्यायकारी होने ' है. कि कनिष्ठ न देनेस ज्येष्ठ दावा करके ले सके। पर उसको दशम भाग देना होगा। यहिवर्णके चरित्रानुसार और यमकफे मप्रजन्मानुसार , इस तरह धर्म प्रयकारोंने विविध कासे जो उद्धार ज्येष्ठता निश्चय नहीं-(गौतम) यहिषर्ण आर्थात् गद। विधान किया है, उसका समन्वय भी दुष्कर है। जो हो, वहुववनके कारण शूद्रधर्मग्राहो शंकरचरित्रमें अर्थात् सु. अवस्थाविशेष, इन सयोंका एक तरहसे उद्धार देनेका शालता ज्येप्रता होती है। अतपय ये जन्म द्वारा ज्येष्ठ सारपर्ण मालूम हो सकता है, किन्तु यह स्पष्ट दिखाई दे रहा कह कर उद्धाराई नहीं होते । पाचस्पनिका कहना है, कि है, कि गुणाधित माई हो उसके उद्धाराई है। गृहस्पतिने 'शूदजन्मके लिये ज्येष्ठांशभागां नहीं होते ।' मनु कहते पहाट रूपसे कहा है, कि कक्षित विधानफे अनुमार है-'शूद्रकी सजानीया मार्या वैध है । उसके गर्भ में सौ समी पुन ही पितृधनहारों है । किन्तु उनमें जो विद्यावान् पुत्र जन्म लेने पर भी वे सभी समान भाग पायेंगे। यहां और धर्म कम शोल हैं, यह अधिक पानेके अधिकारी हैं। समान अंश कहने से ज्येष्ठम्य प्रयुक उद्वार प्राप्य नहीं विद्या, विज्ञान, गौर, ज्ञान, दान और सफिया इन सब है यही.दिखाया गया है। यदि कहा जाय, उनमें विद्वान् विषयों में जिसको कीशिं इस लोको प्रतिष्ठित हो, उसो और कर्मशाली जो हैं ये अधिक पा सकेंगे, तो यह पदस्प पुनसे पितृलोक पुत्रवत होता है। और ऐसा मा नहीं, त्युक्त उद्धार. साधारण विषयक होने पर शूद्र भी गुण- • कि निर्गुण दुर्मशाली भाई फेवल विशोद्धार पानेके शाली होनेसे क्यों उद्धारा होता है ? पैसा गुण शनी अयोग्य है। किन्तु दायाधिकारी भी नहीं, यथा-निम्न होना सम्भव नहीं। मतपय-- "शूद्रका कमी भी उद्धार लिखित पतियां विवादभवार्णयले दी जाती है-. प्राप्य नहीं।" . जो ज्येष्ठ माई ज्येष्ठका मानरण करते हैं, पिता मोकलिके सिया अन्य युगौ मातृगम वर्णक ज्येष्ठानु- - Vol xxi. 110 .. ... .. .. .