पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५४२

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४६४ विभाग विभागशस ५ याग । ६ न्यायमतसे २४ गुणान्तर्गत गुणविशेष।, पहले कहा जा चुका है। इन तीन प्रकारों में कपाल और यह एककर्मज, यकज और विभागजफे भेदसे तीन कपालिकाको जो समवायी कारण रह गया है, उसमें । प्रकारका है। विभागज विभाग फिर हेतुमान विभाग 'माधारणतः द्रव्यक अवयवों को हो गवयवोका कारण भीर और इत्यहेतुविभाग भेदसे दो प्रकारका है। कहना समझना होगा। इस समय जहाँ इस हेतु और क्रमश: लक्षण और उदाहरण- . आहेतुइन दोनोंशा वियोग या विभाग दिखाई देगा, एककमंज-केवल एक पदार्थको क्रियाके लिये जो यहां इत्यहेतु विभाग विभाग कहना चाहिये । जैसे विमाग या संपागच्युति होती है, उसका पककर्मज विभाग देहके ('अंगयोके ) कारण हस्त (अययय) है। इस हाय. . कहते हैं । जैसे, श्येनशैलसंयोगका विभाग 1 इस विभाग के साथ पूर्वकृत सयोजित तहमा वियोग या विभागके ' में पर्वतको कोई क्रिया नहीं देखी जाती। केवलमात्र समय तकसे हाथ के साथ साथ अवश्य देदका भी विभाग श्येन पझोकी क्रिया ही दिखाई देती है। अतएव यह एक होता है। इससे स्पष्ट देखा जाता है, कि तरसे जो बहके फर्भज विभाग है। विभागको कल्पना की गई, वह देहका कारण (दस्त) प्रयकर्मज,-दो पदार्थों की क्रिया द्वारा उत्पन्न । मौर अकारण ('तरू ) इन दोनों के वियोग द्वारा हो विभागका नाम द्वयकर्मज विभाग है । जैसे, दो भेडोंके सम्पन्न हो रही है । 'अतएव यहाँ हेतु और अहेतु इन युद्ध ( अर्थात् डेवा लगने )के समय उनके दोनों को क्रिया. दोनों के विभागजन्य विभाग कल्पना करनेको देवतु- मे परस्परके सींगोका संयोग होता है, धैसे ही युद्ध विभागज विभाग कहा जाता है। (डेवाके लगने) गन्त होने पर फिर उन्हीं दोनोंको क्रिया - "द्रयाणि नय" क्षिति, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, के द्वारा उम संयोगका वियोग अर्थात् विभाग होता है। दिक, भात्मा और मन-पेनी प्रकारफे द्रष्य' हैं । 'इन तपय यह विभाग द्वयफर्मज है। मव द्रष्यों में जो प्यत्वरूप धर्म है, यह सामान्य या हेतुमानविभागज-हेतु= कारण है । यह तीन तरह-यापक धर्म है और इनके प्रत्येक में जो क्षितित्य जलस्य का है-सावायो, असमवायी और निमित्त । घटका मादि धर्म है, घे विशेष या व्याप्य धर्म है। ये परस्पर कपाल और कपालिका-अर्थात् तला और गला समयायो। वियधर्म है,पयोंकि क्षितित्व जलमें नहीं तथा जलत्व कारणोंका और उनके (इस तले और गलेका) परस्पर क्षितिमें या तेज आदिमें नहीं है। किन्तु सामान्य धर्म संयोग असमवायो कारणोंके और मृत्तिका, सलिल (द्रवत्व ) इन नयों में ही है । परम्पर विरुद्ध व्याप्यमंफे ( जल ), सूत्र, दण्ड, चक्र और फुलाल (कुम्भकार) 'प्रकार से ही द्रध्यको नौ भागों में विभाग करना होता हैं। आदिके निमित्त कारणका उदाहरण है। इन कारणत्रयः। इनके द्वारा यहां फलतः यह उपलब्धि होगो कि द्रष्यस्व का वियोग या विभाग ही हेतुमात्र विसागंज विभाग हैं। या सामान्य धर्मावछिन्न सित्यादिका परस्पर विरुद्ध हत्य हेतुविभागज-हेतु = कारण = किसी कार्यके प्रति क्षितित्व जलत्यादि या धर्म द्वारा दो प्रतिपादन किया जो वस्तु अव्यवहित-नियत पूर्वंयती अर्थात् किसी कार्य जा रहा है, कि द्रव्यके विभाग नौ प्रकार हैं। अतपत्र के आरम्भके प्राकालमें उस कार्य के प्रति जिस वस्तुको सामान्यधर्मविशिष्ट वस्तुओं के परस्पर विरुद्ध तत्त नितान्त आवश्यकता है या जो वस्तु न होनेसे यह काम व्याप्य धर्म द्वारा उनका (उन पस्तुओं का) जो प्रतिपादन नहीं चल सकता, उसीका नाम कारण है । जैसे घट ! होता है, उसका नाम ही विभाग है। प्रस्तुत करने के आरम्भ में मिट्टो, जल, सूत्र, दण्ड, चक्र, विभाग (सत्रि०) विभागकारी, वांटनेवाला। • कुलाल और कपाल पालिका और उसका (कपाल और विभागभिग्न (संलो०) तक, मट्ठा । कपालिका सयोग) इनमें कोई एक न रहनेले घट तय्यार विभागवत् (स' नि०) १ भागविशिष्ट। २ विभाग तुल्य, . नहीं हो सकता। अत: इसको सामान्याकारमें पे सभी विभागके समान! हेतु या कारण हैं। फिर इसमें तीन प्रकारका भेद है जो ' विभागशस (सं भव्य ) विभागके अनुसार।