पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५४६

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४६८ विमास-विमातक . वह यह है, कि धातुके साथ उपसर्गका योग तथा समास विमिति ( स० स्त्री०) वि-भिद्-क्तिन् । विभेद, विवाद। एकपदस्थलमै नित्य इसके सिवा अन्यत्र विकल्पमें सन्धि (काठक १९३५) होगी। विभिन्दु (स. त्रि०) १ विशेषरूपसे भेदक, सर्वभेदकारी। क्रमशः उदाहरण- १२ विख्यात । (ऋक २१११६२० ायण) २ ऋग्वेदेोक राज. 'प्र-अन्-अच-प्राणः, नि-इ (या अय)-घन-नि| भेद । ये राजा थे। (ऋक मा२।४१) आय-धन = न्यायः। 'ब्रह्मा च मत्युतश्च = ब्रह्माच्युतो' | विभिन्दुक ( स० पु०) असुरभेद। 'ब्रह्मा तथा अच्युत-ब्रह्मा + अच्युता ब्रह्माच्युतः। . ..., (पञ्चविंशमा० १५।१०।११) अनक्क्त म् आन्- (इट ) त= अङ्कित, दनुभ-अच्- | विभिन्न ( स० नि०) १ कटा हुमा, काट कर अलग किया दंभ-म-दम्भः। प्र-अन् , नि+आय (धातु और उप- | हुआ। २ पृथक, जुदा ! ३ अनेक प्रकारका, कई तरहका । सर्गका योग); ब्रह्मा + अच्युत (समास); दन+भ अन् + ४ निराश, हताश । ५.औरका और किया हुगो, उलटा। ८ ( एफपद अर्थात् एक दनम और 'अन्य'धातु ) इन विभिन्नता ( स० स्त्री० ) पार्थक्य, भेद । सय स्थानों में नित्य हो सम्धि होगी। अर्थात् सन्धि न विभिन्नदशी (स. त्रि०) मिन्नदशी, पृथक पृथक हो कर अविकल ऐसे भाषमें कुछ नहीं रह सकता, परन्तु | | देखनेवाला। (मार्क ०४०, २३६३८) . समास स्थलमें वक्ता इच्छा करके यदि समास न करे, | विभी (स० वि०) विगतभय, निभी क। तो 'ब्रह्मा अच्युतके साथ जाते हैं ऐसे भावमें सन्निकर्ण विभीत (सं० पु० ) १ विभीतक, बहेड़ा । (नि.) होनेसे ही सन्धि होगी सो नही । घातूपसर्ग २ डरा हुमा । और प्रकृति प्रत्ययके सम्बन्धमें भी प्रायः एक ही तरह विभीतक (सं० पु०) विशेषेण भीत इव-स्वाथै फन् । जानना होगा अर्थात् कर्ता यदि पद प्रस्तुत करनेके अभि- बहेड़े का वृक्ष । संस्कृत पर्याय-अक्ष, तूप, कयै . प्रायसे उनका योग करे, तो नित्य सन्धि होगी । अन् +फ- फल, भूतवास, कलिगम, कल्पवृक्ष, संवत्त, तेलफल,' अङ्क, नस+ प्रश्च इत्यादि स्थानों में प्रत्ययके साथ भूताबास, संवर्तक, वासन्त, कलिवृक्ष, बहेड़क, हार्यो, योग होने के पहले ही एक पदमें नित्य सन्धि होती है। विपन, अनिलन, कासन। २ संस्कृत नाटक व्ययहत प्राकृत भाषा। शाकरी, | वैज्ञानिक नाम-Ferminalia belerica और अङ्गा चाण्डाली, शावरो, आभीरो, शाफ्को आदि विभाषा हैं। रेजी नाम-Belleric Myrobalan है । यह वृक्ष भारत. ३ वौद्धशास्त्रमन्यभेद। वर्षके प्रायः सर्वत्र समतल .प्रान्तरों में और पहाड़ादिके विमास (सपु०) तैत्तिरीय आरण्यकके अनुसार सप्त-1 पाददेशमें उत्पन्न होता है। पश्चिमको ऊसर भूमिमें यह र्जियो मैसे एक। २ देवयोनिभेद । (मा०पु०८०७)३ वृक्ष अधिक नहीं होता। लङ्का और मलका द्वीपों में भी रागका भेद । यह सवेरे समय गाया जाता है। इसे कुछ इस जातिके वृक्ष पर्याप्त है । सिया इसके मारगुई, लोग भैरव रागका हो भेद मानते हैं। ४ तेज, चमक। सिंहल, यवद्वीप और मलय द्वीपमें इसका दूसरी तरह- का एक वृक्ष दिखाई देता है । इसके फलके तथा भारतके विभासक (स. त्रि०) १ प्रकाशयुक्त, चमकनेवाला। बहेड़े में केवल सामान्य प्रभेद है। २ प्रकाशित करनेवाला, जाहिर करनेवाला। ___ भारतके नाना स्थलों में विभोतक (बहेडा ) विभिन्न विभासिका (स० वि०) चमकनेवाली।'. -नामांसे परिचित है। हिन्दीमें-भैरा, बहेड़ा, बहेरा, भेरा, विभासित (स० लि.) १ प्रकाशित, चमकता हुआ। भैराह, सगोनो, भा, बुल्ला, बहुरा; बगभाषामें-बहेड़ा, २ प्रकट, जाहोर। . पहेग, पहेरि, घहिरा, भैरा, बहुरू, बेहेरा, बहुरा, बहोड़ा, विभास्कर ( स० नि०) दीप्तिहीन,सूर्यालोकरहित । थियड़ा ; कोल-धोलोमे-लिङ्ग, लुपुङ्ग सन्ताल-बोली- विमास्यन् ( स० वि०) अति उज्ज्वल ! .. , : । में-लोपङ्ग । उडिया-भाषा-भारा, यहोडा, वइया;