पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५५९

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विश्लगर्भ-विमलस्वभाव ४७६ विमलगर्भ (स० पु० ) १ राजपुनभेद । (सद्धम्मैपुण्ड०) विमलयोध ( स० पु०) दुर्योधपदभञ्जिनी नाम्नी महा. २ बोधिसत्त्वमेद । भारतके एक टोकाकार। इन्होंने रामायणको एक टीका विमलचन्द्र (स० पु०) राजभेद । (तारनाथ) रची थी। अर्जुन मिश्रने इनका उल्लेख किया है। उक्त विमलता (स० स्त्रो०) विमलस्य भावः तल-दाप । १ पवि. महाभारतको टोकार्म टोकाकारने वैशम्पायनटोका और सता । २ निर्मलता, स्वच्छता, सफाई। ३ रमणीयता।. देवस्तामोका मत उद्धृत किया है। ४ मनोहरता। | विमल ब्रह्मचर्या खात्मानन्दस्तोलके प्रणेता । विमलत्य (सली०) पवित्रता, निर्मलता। विमलभद्र (स' पु०) योद्धभेद । ( तारनाथ ) विमलदत्ता (स० स्त्री०) राजमहिषोभेद । ( स्वधर्म पुगढ०) विमलभास (स० पु०) समाधिभेद । विमलदान (स० क्लो०) विमलं विशुद्ध दान 1 वह दान विमलभूधर-साधनपश्चकटीकाके रचयिता। जो नित्य नैमित्तिक और काम्यके अतिरिक्त हो और विमलमणि ( स० पु. ) विमलः स्वच्छो मणिः । स्फटिक। फेवल ईश्वरको प्रोतिक लिये किया जाय। विमलमणिकर ( स० पु० ) बौद्ध देवनाभेद । ___ गरुडपुराणमें लिखा है, कि नित्य, नैमित्तिक, काम्य (काश्वक्र ११४०) और विमल ये चार प्रकारके दान है। अनुपकारी ब्राह्मण विमलमित्र (स.पु०) यौद्धगतिभेद । ( तारनाथ) को प्रति दिन किसी फलको कामना न करके जो दान | विमलवाहन (स० पु०) राजभेद । (शत्र जयमा० ३५) दिया जाता है तथा पापशान्तिके लिये विद्वानको जो विमलयेगधी ( स० पु० ) राजपुत्रभेद । कुछ दान किया जाता है, उस महदनुष्ठानको नैमित्तिक | शिमलव्यूह (स'. लो०) उद्यानभेद । (नमितवि०) दान कहते हैं । 'पुत्र, जय, ऐश्वर्य और स्वर्गकी कामनासे जो दान किया जाता है, उसोका नाम विमलदान है। | विमलश्रीगर्भ (सं०. पु० ) योधिमत्रभेद । विमलध्वनि (सं० पु०) छ। चरणों का एक छन्द । यह एक विमलशैल (सं० पु. ) पतिभेद, विमलादि । दोहे और समान सवैयेसे मिल कर बनता है। विमलसरस्वनो (. सं० पु.) एक प्रसिद्ध चैयाकरण । विमलनाथपुराण-जैनपुराणभेद । इसमें जैन तीर्थकर इन्होंने रूपमाला मामक एक व्याकरण लिया है। विमलनाधका माहात्म्य वर्णित है। विमल सा-एक धनधान वणिक। इन्होंने १०३२ ६०में । पुराण शब्दमें विशेष विवरण देखो। भायु पर्वतके ऊपर अपने नाम पर एक मन्दिर धनवाय शिमलनिस (सं.कोयाशित समाधि.] वह मन्दिर आज भी विमरठमाका मन्दिर कहलाता है। भेद। मन्दिर शिल्पनैपुण्यसे परिपूर्ण है। इसको यनावट प्रशंमा. विमलनेत्र ( स० पु०) युद्धभेद । के योग्य है। मन्दिर देखनेसे ही जैनस्थापत्यशिल्पका विमलपिण्डक (सं० पु०) नागभेद । ( भारत आदिपर्व) निदर्शन-सा मालूम होता है। मन्दिर में जो सय स्तम्भ विमलपुर ((स' फ्लो० ) नगरभेद । लगे हुए हैं, वे तथा छतको चित्रावली देखने लायक है। ..(कथासरित्सा० ५।६।८६)। यहां पाश्यनाथको मूर्ति विराजमान हैं। इस मन्दिरका विमलप्रदीप (स० ० ) योद्धशास्त्रोक्त समाधिभेद।। प्रनिष्ठाकार्य वर्तमान सूरिने सम्पन्न किया था। पिमलप्रम (स' पु०) १ बुद्धभेद । २ देवपुत्र शुद्धा- पिमक्ष देखो। वासकायिक। ३ समाधिभेद । विमल मूरि- जैनसूरिभेद। इन्होंने प्रश्नोत्तररतमाला विमलप्रभा (स. स्त्री०) राजमहिपोभेद। . नामक एक अन्य दनाया है। वह प्रन्य आर्या छन्दमें लिखा . . (राजतर० ३३३८४ ) | है। कहते हैं, कि इन्होंने पद्मचरित्र नामक एक दूसरा विमलप्रभासश्रोतेजोराजगर्भ (सं० पु० ) बोधिसत्यभेद ।। | अन्य भी बनाया था। विमलयुधि (स० पु.) पौद्धभेद। . . . | पिमलखभाय (सं० पु० ) पिमला स्वभायः । १ निर्गल-