पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५६३

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विमानपोत ४८३ इन हवाई जहाजोंकी कथा कविकल्पना-सी समझते थे। वर्तमान हवाई जहाज या परोप्लेन घंटेमें १०० या किन्तु. धर्तमान पाश्चात्य-विधानको चरम उन्नति । १५० मील तक जा सकता है। किन्तु उस पुष्पफरथकी माफाशयानको देख कर हम लोग उन पौराणिक कथाओं गति इससे कहीं बढ़,फर थी। उत्तरकाण्डके ८३वेंसर्गसे को कविकल्पना कह कर उड़ा नहीं सकते । उसका प्रमाण मिलता है। श्रीरामचन्द्र लङ्कासे लौटते गत महायुद्ध में जेपेलिन और एरोप्लेनने जैसा कमाल | समय अगस्त्यानम अर्थात् दाक्षिणात्यसे आध दिनमें किया, वह पाठकोंसे छिपा नहीं है। अभी जनसाधारण- | पुष्पकरथसे अयोध्या माये थे। को विश्वास हो गया है, कि विमानपोतकी सहायतामे ! बहुत दूरसे जिस प्रकार एरोप्लेनके आने जानेका ' एक महादेशसे दूसरे महादेशमें जाना कोई बड़ी बात नहीं, शब्द लोगोंको सुनाई देता है , पुष्पफरथ भी उसी प्रकार है। हमारे इस भारतवर्ष में कई हजार वर्ष पहले मार्य- घोर शब्द करता हुआ बड़ी तेजीसे शून्यमार्ग में उड़ता समाजमें विमानपोत प्रचलित था। उसकी सहायतासे | श . . पक देशसे दूसरे देश में आसानीसे भोर इच्छानुसार जहां विमान। । तहां जा सकते थे। मभो जिस प्रकार विमानपोत जन- पुष्पकरथके अतिरिक्त विमानको वात पहले ही लिखी साधारणका निजल नहीं है, गवर्नमेण्टके खास विभागके | जा चुकी है। संस्कृतकोपोम विमानका हा 'देवयान' अधीन है, पहले भारतवर्ष भी उसी प्रकार यह जन- | लिखा है। किन्तु पुराणसे हमे मालूम होता है, कि साधारणको सम्पत्ति नहीं, व्यक्तिविशेषका निजस्व वा यक्ष और गन्धर्व भी पिमान पर चढ़ पुरभ्रमण किया देवस्व समझा जाता था 1. करते थे। श्रीमद्भागवत में लिखा है, कि गन्धर्वरमणियां . :. । पुष्पकरय । विभिन्न अलङ्कारों और वस्त्रभूपोंसे विभूषित हो विमान रामायण, महाभारत और पुराणोसे हमें मालूम होता पर चढ दक्षयश देखने गई थी । (श्रीमद्भागवत ४।३६) है..कि देवगण विमान पर चढ़ कर भ्रमण किया करते थे। भारतीय आर्यसमाजमें चेदिराज्य के प्रतिष्ठाता महा. . रामायणमें लिया है, कि चतुर्मुख ग्रहाने यज्ञराज कुवेर | राज वसुने ही सबसे पहले आकाशगामी स्फाटिकविमान- पर प्रसन्न हो उन्हें पुष्पकर दे दिया.शा। अमरों की तरह का व्यवहार किया था। महाभारतके गादिपर्वमें लिखा यशराज उस पुष्पकरथ पर चढ़ कर जहाँ इच्छा होती हो । है, कि पुरुवंशीय वसुराजने इन्द्र के उपदेशसे चेदिराज्य जाते थे। (रामायण उत्तरकायम ३ सर्ग) फुधेरको परास्त ग्रहण किया था। पहले उनको कठोर तपस्या देख कर कर लङ्काधिपति रावणने वह पुष्पशरथ ले लिया था। देवगण भी भयभीत हो गये थे। इन्द्रने उन्हें सन्तुष्ट उम पुष्पक रथके सम्बन्धमे, इस प्रकार लिखा है .. करने के लिये स्फटिकविमान और धैजयन्ती माला दी "निजित्य राक्षसेन्द्रस्तं धनद हटमानसः। , थी। चेदिपति वसु स्फटिकविमान पर चढ़ कर • पुष्पक तस्य नेपाद विमानं जयलक्षणम् ॥ . . आकाश घूमा करते थे, इस कारण वे 'उपरिचर वसु' । काञ्चनस्तम्भसनीतं वैदुर्व्यमपितोरणम् ।.. मासे प्रसिद्ध हुप है। • मुक्ताबामप्रतिच्छन्न सर्व कामफलप्रदम् ॥ . __यमराजके बाद भी महाभारतमें शावराजाके चैहा. , मनोज कामगर्म कामरूपं विहङ्गम् । । यसयानका उल्लेख है। विश्वकीय शिल्पसंहिता ": मयिकाशनसोपानं तप्तकाञ्चनवेदिकम् ॥ लिखा है, कि शास्वराज मय॑धाममे दुर्लभ कामगामी देवापाट्यमय्यं सदा दृष्टिमनःमुखम् ॥ . . यान प्राप्त कर वृष्णिवंशके माथ वर साधने के लिये - वहारचा भक्तिचित्र अझया परिनिम्मितम् ॥ द्वारका गये थे। यह यान. इच्छानुमार भूमि, आकाश, निर्मित सर्यकामेस्तु मनोहरमनुत्तमम् । गिरिश्टङ्ग वा जलके बीच हो कर गया था। - ; न द शीतं न चोय सर्लन मुखमुत्तमम् ॥ . . विश्यक-रचित उक्त शिल्पशास्त्र में पुष्पक बनानेका रामायण ।१५।२५-३२) | भी प्रसङ्ग है। विश्वकर्माने दीप्तिशाली यह पुष्पक ग्रान