पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५६९

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विरशिन-विरह ४६५ सुन्ना गिरफ्लो गोमती,मही" (ऋक् १८८) 'विरप्मी घिरवा-पम्बई प्रदेशके अन्तर्गत हल्लार प्रान्त या काठिया. बहुविधोपचारयादिनो' ( सायण ) २ स्तुनिकारक। वाई विभागके अधीन एक छोटा सामन्त राज्य । , (भूक ११६४१०)। भूगरिमाण ७६ घगमील है। विरया प्राममें यहाँके विश्पगिन् (सं० वि०) विवधशब्दकारो, "शियाभिविरप• मयाधिकारीका घास है। एक सरदारके ऊपर राजस्य शिनः" (ऋक ११६४।१०) 'विरप शिनः विविधं शब्द रग | घसूल करनेका भार है। राजस्वको भाय प्रायः १०००) तीति विरणमाः स्तोनारस पत्र सन्तोति विरपशिनः | २० है । जिसमें मंगरेजराजको वार्षिक १५०) २० यद्वा विविधं रपणं विरपशं तदेपामस्तीति मक्तो हि| और जूनागढ़ के नयावको ४४) रु० कर देना पड़ता है। विविधं शब्द। कुते' (सायण ) विरश्मि (सं० लि०) विगतो रश्मियम्य । रश्मिरहित, विरम (सं० पु० ) वि.रम अप। नाश, अपगम। विना किरणका। बिग्मण (सं० क्लो० ) १ विराम, ठहरना । २ सम्भोग, विरस (सं. नि.) विगतः रसो यस्य। १ रसहीन, विलास । ३ गम जाना. मन लगाना। ४ अवमर फोका । २ विरक्तिजनक, जो अच्छा न लगे। ३ अतृप्ति प्रहण, छुट्टी लेना। ५नित होना, विरत होना। कर, मप्रिय । ४जो रसहीन हो गया है, जिसमें रसका विरल (सं० वि०) १ अवकाश, जो घना न हो, जिसके । निर्वाह न हो सका हो। (पु.) ५ कायमें रसमग ! पीच चोचो पाली जगह हो। पर्याय-पेलव, तनु । फेशवने इसे 'अनरस' के पांच भेशमें एक माना है। २ दुर्लभ, जो केवल कहीं कहीं पाया जाय। ३ निर्जन, विरमता (सं०बी०) विरसस्य भावः तल-टाप चा त्य । शून्य । ४ महर, थोड़ा। ५ जो गाढ़ा न हो, पतला। १ यिरमका भाव या धर्म, फोकापन । २रसमग, • (फ्लो०) ६ दधि, पतला दही।। मज़ा फिरफिरा होना। घिलजानुक (सं० वि०) पिरलो जानुर्यस्य, समासे विरसत्व ( सं० लो०) विरसता देखा। कप्। यकतानुविशिष्ट, जिसका घुटना मुला हुआ हो। विरसाननत्व (सं० क्लो०) मुखका वैररूप, ज्वरादि रोगके विश्लदेश-Fथानभेद। (दिग्विजयप्रकाश YERS ] समय मुखमै विकृत रसका अनुमाघ । पिरलया ('सं. स्रो०) विरली निर्मलो द्यो यस्या। विरसाव्यत्य (सं० फ्लो०) मुखका घेररूप, मुहका फोका. पन । (शापास. १७१७०) लक्ष्न यवागू, विरल द्रय यशगू। विरह (सं० पु ) विरह त्यागे गम् । १ विच्छेद, जुदाई । चिरलिका (मत्रो०) वस्त्र विशेष प्राचीनकालका एक पर्याय-विप्रलम्म, वियोग, वियोग। (हेम) २ अमाव । प्रकारका झोना या महोन वस्त्र । ३ शाङ्गाररसको विप्रलम्माल्य अवस्था । विलित (नि) विरलोऽहा जात: विरल-तारकादि- मनशास्त्र में लिखा है कि नियोंको पनि रहिन या बाहितन्त्र । विरलयुक्त, अवकाशविशिष्ट ! बिना पतिमा रहना एक दोप है। विएलो करण (i० पु० ) सघनको विरल करना। प्रिय और प्रिया के बीच परस्पर गदर्शनसे एक दूसरे. चिरलोकृत (सं०नि०) अविरला घिरला कृतः अभूत-। के मनमें जो चिन्ता और ताप आदि उपस्थित होता है तद्भावे त्रि। जो स्थान यिरल न गा उस स्थानको । साधारणतः उसोको विरह कहते हैं। प्राचीन काय विरल कंग्ना, जहां अवकाश- नहीं था उस स्थानको और नाटक आदि प्रों विरहके पहुतेरे निदर्शन 'अरकाश करना। पाये जाते है। उत्तरचरितमें सोताके यिरहमें राम- -विरलेटर (सं० वि०) विरलादितः। अविरल, विरलसे चन्द्र कातर हुए थे। फिर अभिमान-शकुन्तलामें दुष्यन्त के भिन्न। चिरहसे शकुन्तलाने भो क्लिममना हो महाणि दुर्वासाको विश्व (सं०.पु.) १ विविध शब्द..अनेक प्रकारके शम्द। अवज्ञा की थी। नायक नायिकाके ऐसे विरहका शेिर (नि0 ) २ शम्बरहित, • मोरय।. .. । माधुय्यं नहीं । यह विरह जब पवित्र प्रेमके अवस्याभेद