पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५७५

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विराट 85 पुलिश स्टेशनसे ५ मील दूर करताया नदीके पश्चिम , एक मेला लगता है। पहले जिस समय यह स्थान तट पर अवस्थित है। निचिढ़ जगलोंसे ढहा था, उस समय यहा ति रवि विराट के पश्चिम-दक्षिणसे होती हुई बगुड़ा जिले के चारको बहुतसे यात्री मी इकट्ठे होते थे। इस समय क्षेतलाल या क्षेत्रनालाका सोमा आरम्भ होता है। उक भो रविवारको हो अधिक यात्रियोका समागम होता है। विराट सरकार घोड़ाघाट और अलीमाम परगने के | पैशाख मास रविवारको विराटको पुण्य भूमिमें हवि. अन्तर्गत है। विराटसे कुछ दूर सरकार घोडाघाटक ध्यान ग्रहण करनेसे बड़ा पुण्य होता है, ऐसा हो लोगों प्राचीन जनादका भानावशपबिह शुरू हो कर कमरा नावशवाय शुरू हो कर कमरा का विश्वास है। पश्चिम दक्षिण एक बहुत यिस्तन स्थानमें वर्शनान है! वाडा जिलेके शिवगंज पुलिश स्टेशन मन्तर्गत मुगल बादशाहको अमलदाराम घाडाघाटमें फोजदारा तथा विराटफे दक्षिण कीचक नामसे जा स्थान वर्तमान कचहरो थी। उस समय करतोया नदी विस्तीर्ण प्रवाह है, उसमें प्राचीन कोई वस्तु उल्लेखताय नहीं है। एक शालिनी थी, इसालये उसफे तोर पर मनक नगर स! खाई कोचक नामसे प्रसिद्ध है। दिनाजपुर जिले के अन्त गये थे। मुगल के समय यनकोठोके जमोदार इस गंत रानोकल पुलिस स्टेशन उत्तरगोगृह ए पायना अञ्चल प्रधान जमींदार थे। मुशेदकुलोके शासनकाल } जिले के पुलिस स्टेशन रायगंज के अन्तर्गत नोमगाछी' में भो पद्धनकोठोके जमीदारोंका प्रभाय फैल रहा था। नामक जनपद दक्षिण गोगृहके नामसे जनसाधारणमें मुगल राजत्वकालमें भी करतोया नदोके निकटवत्तों प्रसिद्ध है। दिनाजपुर जिले भने बोद्ध क्रीत्तियां हैं। सभी जनपद समृद्धिशाली थे, ऐसा हो विश्वास होता जो उत्तर-गोगरफे नामसे कथित है, यह सम्भवतः परवत्ती है। खाय १०वीं शताब्दी में ढाका नगरोमें सूशको बौद्धराजाओं को दूसरी कोर्ति है। उक्त नीमगाछो नामक राजधानी स्थापित होने के बाद घोड़ाघाटको अवनतिका स्थानमें एक बहुत बड़ा जलाशय है। उसका नाम है सूत्रपात हुआ। इसके बाद करतोया नदीको धारा जयसागर । इस स्थानको मिट्टोके नाचे कभी कभी संकीर्ण हो जाने के कारण ये सब समृद्धशाली जनपद धीरे भट्टालिकादिका वसायशेर दृष्टिगोचर होता है। एक धोरे अंगलमें परिणत हो गये। इस समय विराट नामक मान मन्दिर के द्वार पर कई एक बड़े बड़े पत्थर पड़े स्थानमे एक क्षमताशाली राजा या जमोदारका प्रासाद है। यह स्थान प्राचीन करतोया नदाफे किनारे था। था । यहाँके सभी इष्टकस्तूपोंको देखनेसे अनायास ही इए इण्डिया कम्पनी प्रथम समयमे मोमगाछोका जंगल इसका अनुमान होता है । नगरमें कई छोटे बड़े जलाशय, अत्यन्त प्रसिद्ध था । इस स्थान के पास हो कर ही हैं। यगुड़ाके इतिहास लेपने इस स्थानको निविड़ राजमाही रिलेका विख्यात चलन-विल आरम्भ होता भरण्यानी कह कर वर्णन किया है। किन्तु माश्चर्यका है। यहां गो घरानेको सुविधा रहने पर भी महाभारत . विषय है, कि १९०७ ई० में इस विस्तीर्ण भूमाग अन्दर | चर्णित विराट का समसामयिक स्थान मालूम नहीं शंगलको चिह भी नहीं रहा। इस समय वहां जलायनका पड़ता । परन्तु आदि मत्स्य या विराटके किसी राजवंश. भी अभाव हो गया है, पेसा कहने में भी कोई मत्युक्ति न धरने बहुत समय पहले यहां मा कर आधिपटर स्थापन होगी। १२८१ साल के प्रसिद्ध दुर्भिक्षके बाद क्रमशः तथा उसके साथ साथ महामारतीय आण्णायिका इम प्रदेशमें घुना, संथाल तथा गारी प्रकृति मसम्य सन्निबद्ध करके इस स्थान के मादात्म्यको बढ़ाने की चेटर आतियों ने निवास करके अंगलको निमूल कर दिया है। को होगो । यहां मिट्टी खोदनेसे एक व्यक्तिको पक ३० वर्षे पहले जिस स्थानमें बाघका शिकार किया जाता | पापाणमयी कालोमूर्ति और एक व्यक्तिको पीतलको दश था, इस समय उस स्थानमें मनुष्योंको घनो भावादी भुजामूर्ति प्रात हुई थी। इस स्थानके निकटवत्ती मघाई दहिगोचर होती है। नगर गामक स्थानमें लक्ष्मणसेनका ताम्रशासन पाया 'यहा जंगलादि निमूल हो जाने के कारण कई वर्षों से गया है। Fol, xxl 125