पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५७६

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४६६ ‘विराट लिया और यहां के अधिवासियोको धनसम्पत्ति लूट ली। जय भारतवर्ष में इस स्थानके अतिरिक्त दूसरा कोई स्थान . उन्हें नारायणमें एक खादी हुई लिपि मिली। उसमें लिखा ' मत्स्यदेश नहीं कहलाता है, तब यहां अवश्य ही विराट . था, कि नारायण मन्दिर चालीस हजार वर्ष पहले बनाया की राजधानो थी, इसमें प्रमाणको , आवश्यकता नहीं।" . गया था। इस समयके इतिहास लेखकोंने उक्त लिपि उक्त इतिहास लेखक पाण्डवोंके छद्मवेरामें विराट . का उल्लेख किया है। वह प्राचीन खेोदित लिपि सम्राट् नगरमें बागमन, फोचक-यध, भीमकृत भामकी दोघी प्रिपदोंको अनुशासन कह कर प्रमाणित हुई है। इस : प्रभृति कीर्शि फलाप स्थापनका वर्णन पारते हुए कहते .. समय वह प्राचीन अनुशासनफलक कलकत्तेको पशिया ," यहां प्रति वर्ष वैशामके महीने में मेला लगता.था।' टिक सोसाइटोमें सुरक्षित है। उक्त लिपिसे जाना जाता जिस स्थान पर मेला लगता था, यह स्थान जगलोंसे : , है, कि सम्राट प्रियदोंके समय भी वैराटनगर समृद्धि ढका था। प्रति वर्ष मेले में ३।४ सहन यानी इकडे शाली था। जो हो, राजपूताने के पैराटको हो हम लोग होते थे। प्रातःकालसे ले कर तृतीय प्रदर पर्याप्त आदिमत्स्य या विराट देश स्वीकार कर सकते हैं। मेला लगा रहता था। इस मेले में खाद्य सामप्रियां वरावर पू विराट । . . मिलती थी, फेवल मत्स्य, घृत, हरिद्रा और काष्ठ का क्रय महाभारतमें कारपके बाद एक मत्स्यदेशका उल्लेख विक्रय नहीं होता था। यहां लोगों को भीड़ लगी रहती है। विहार और उड़ीसाके अन्तर्गत, शाहाबाद थो इसलिये धन्य ज'तुओं का भय विल्कुल हो नहीं रहता जिला हो पहले कारुपदेशके नामसे प्रसिद्ध था। अतएव । था। इस मेले में एक माश्वर्याजनक घटना घटती थी। दूसरा मत्स्यदेश भी उक्त प्रेसिडेन्सीके अन्तर्गत है। यहांके यात्रो भोजन करनेके बाद जो उच्छिष्ट पन या १२५८ सालमें प्रकाशित कालोशम्र्मा-विरचित "गुड़ा- पान फेक देते थे, दूसरे दिन उनका कोई चिह भी नहीं का इतिहास वृत्तान्त” नामक छ।टो पुस्तकके चतुर्ण : रहता ; न जाने कौन समूचे मेले को साफ सुथरा कर अध्याय २५ मत्स्यदेशका वृत्तान्त इस तरह लिखा है- देता था। . . . "मत्स्यदेशको नाम परिवर्तन हो कर इस समय यहां लोग कहा करते हैं, कि देयता आ कर यह स्थान जिला संस्थापित हुमा है। इसको उत्तरी सीमा पर रंगपुर परिष्कार करते हैं। इस महारण्यके बीच, रंगपुर, जिला, दक्षिण पूर्व सीमा पर पगुड़ा जिला, दक्षिण-पश्चिम दिनाजपुर और बगुड़ा जिले के साथ लोग शिकार करने. सीमा पर दिनाजपुर जिला है। यगुड़ासे १८ फासको | आते हैं। यदां जिस प्रकारका वाघ है, यसा बंगालमें दुरी पर घोड़ाघाट थानासे ३ कास दक्षिण ४५ कोस और कहीं देखा नहीं जाता । जलानेको लकड़ी(धन) - विस्तीर्ण अत्यन्त प्राचीन अरण्यानीफे वोच विराट राजा- | प्रति वर्ष रङ्गपुर, दिनाजपुर और गुड़ा जिले में बिकने की राजधानी थी। यहाँ विराटराजाके बेटे तथा पेतिके : आती है। इस समय यहां कई स्थानों में बहुतायतसे धान राज्य करने के बाद कलिके ११५३ अब्द व्यतीत होने पर पैदा होता है।" .. . जो महा जलप्लायन हुआ था, उससे विराटके घश और उक्त इतिहास लेनकने जनश्रुतिके प्रति विश्वास कीति एकदम ही ध्वस हो गई। पीछे धीरे धीरे यह | करते हुए जो सव अभिमत परिथ्यक्त किया है, स्थान सघन जंगलमें परिणत हो गया। केवल अति | · उसके साथ ऐतिहासिक लोग एकता नहीं कर सकते। . उच्च मृन्मय, दुर्गका जीर्ण कलेयर इस समय भी छिन्न | घरेन्द्रखडके अन्ततो सभी जनपदोंकी हमने देखा है। भिन्न हो कर घर्शमान है। ..फुछ लोगाने मिट्टी खोदनेके इस विराट नामक स्थान में महाभारतके विराट राजको समय गृह-सामग्रियां एवं सोना, चांदो प्रभृति मूल्यवान् राजधानी न होने पर भी यह अति प्राचीन जनपदका. द्रव्य पाया है। जब इस देशके सभी लोग इस स्थानको | भग्नावशेष चिरयुक्त स्थान है, इसमें सन्देह नहीं। विराटको राजधानी कहते आ रहे हैं, जय कीचक और वरेन्द्रखंडके मध्यस्थ उक्त विराट नामक प्राचीन जन.' मीमको कीर्ति इस स्थानके पास पास वर्तमान है और' पंद वर्तमान रंगपुर जिले के अन्तर्गत गोविन्द गज नामक '