पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५७८

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ste. विराट बारेन्द्रणंड में योद्ध के प्रभाव काल को कीर्तियां वर्त। समय पञ्चगंडव अज्ञातवासके समय :विराटके राज. . मान हैं। उसके बाद हिन्दूराजन-काल में भी अनेक भवनमें वास करते थे, उसी समय महायलो अर्जुनने कीर्तियां स्थापित हुई। उन सब कोर्शियों का क्षीण | इस फाको प्रतिष्ठा की थी। राजपूताने के विरारके स्मृतिके निकट महाभारतीय आख्यान जड़ित होना निकट भो वाणगंगा प्रवाहित है, सम्भवतः उसीकी कोई विचित्रता नहीं । फोकि माधुनिक बौद्ध तथा| स्मृति स्थिर रखने को लिये भोगवती गंगाको सृष्टि हुई । हिन्दूराजाओं के इतिहास संकलनको जैसी स्पृहा देवी | होगो । फलता जोव और अमृत नामक कुरा बरेन्द्ररांडके . जाती है, पहले पैनी नहीं थी, मुसलमानो शासनमें । अनेक प्राचीन स्थानाम पर्समान थे। दक्षिण गोग्रह, सभी अपना अपनी चिन्ता व्यस्त थे। वोद्ध तथा हिन्दू प्रभृति स्थानों में अर्जुनके अस्त्र शस्त्र रखनेका स्थान राजाओंके किसो कोर्तिकलापमा उल्लेन इस देशके शमोक्ष भी प्रदर्शित होता है। राजशाही विभागकै जो शास्त्रों में नहीं किया गया था। सुतरां महाभारतादिका मघ स्थान वारेन्द्र के नामसे विख्यात हैं एवं जिन सब पाठ सुन कर परवत्तो समयमें जो कुछ ऐश्वमूलक थे,। स्थानों में है। मन्तिक धानके सिवाय और किसी घे ही पौराणिक आख्यायिका जोड़ दिये जायेंगे. यह प्रकारका अनाज पैदा नहीं होता, उन सब स्थानों के विचित्र नहीं। जो प्रशस्त ऊ'चा राजपथ भीमका बांध अधिवासो मकरसंक्रान्ति के बाद गे। जातिके गलेका । कह कर उल्लिखित है यह कैपर्शराज भोम द्वारा ही बनाया बन्धन खोल देते हैं। विराट राज्यमें गो यांधी नहीं जातो, : गया है, ऐसा अनुमान होता। इस प्रदेश में रानी सत्यवती ऐसी कहावत है। .. . और रानो भवानीफे दो बांध हैं। कोई कोई निम्नभूमि मेदिनीपुर जिले के गहवेता नामक स्थानमें भी यहां ; भरी जा कर तीन ऊ'चे टोलों में परिणत हो गई है। के अधिशासी विराटको कीर्तियां दिखाते हैं। यहां एक घाणदोग्यो नामक स्थान पगुड़ा शहरसे तीन कोस किम्बदन्ती है, कि "गड़वेताके पास ही : दक्षिण गेाग्रह उत्तर है। यहाँ घाण राजाका राजमहल था एवं श्रीकृष्ण था। जिस स्थान पर कोचक मारा गया था, लोग वह यदा हा उपाका हरण किया था, ऐसो किम्वदन्ती चली स्थान भी.दिखाते हैं। . आती है। किन्तु यह स्थान वास्तव में वाण राजाकी दक्षिण विराट। . . । । । राजधानी नहीं है । प्राममें धावन छोघो धी एवं स्थानीय इनके अतिरिक्त उडोसाके अन्तर्गत मयूरभंज राज्यके भापामें धाधनको वाण उच्चारण करने के कारण वाण-कई स्थानों में विराट राजाओं को विराट कोर्शयों के निद. दिग्धो नामकी उत्पत्ति हुई है। र्शन वर्तमान हैं। पूर्वमें कोईसारी गढ़, पश्चिममें ..यरेन्द्रपाडमें विराटकी राजधानो थी तथा पांचों पुड़ाहिहा, उत्तरमें तालडिहा पचं दक्षिण कपोतीपादा, पाण्डधोंने इस देशमें आ कर इसे पवित्र किया था, ऐसा इनके योच प्रायः १२० घर्गमील विस्तृत भूमिखंडमें वैराट कह कर वारेन्द्रनासी अपने को धन्य मानते हैं। लघुभारत-] राजाओं की कोर्शियां टूष्टिगोचर हातो हैं तथा नाना प्रकार कारने संस्कृत भाषामे स्थानीय किम्बदन्तोका अवलम्बन । की किम्यदन्ती सुनो जाती है। यहां संक्षेपमें उसका करके इस स्थानको विराटको राजधानी रूपमें वर्णन | 'वर्णन किया जाता है- किया है। किन्तु यह स्थान आदि विराट या पञ्च पांडय. . मयूरमजकी राजधानी वारिपदासे प्रायः २८ मील ..का अशातयासस्थान नहीं है, यह पहले ही लिखा जा दक्षिण-पश्चिम कोईसारी ग्राम है। यह प्राम एक ममय विराटपुर कहलाता था। यहां एक, समय धैराट । गुडासे, १२. कोस उत्तर-पश्चिम तथा विराट राजाओंकी राजधानों थी। उक्त राजधानीका ध्वंसाघ नगरसे-४ कोस पूर्ण:दक्षिण ,पानोतल्ला बाजारसे एक | शेष इस समय 'कोईसारीगढ़' नाम से प्रसिस है। इस विराट भीमको कीतिरस मक प्राचीन फूगाकार बन्दक है, लोग उसे | गढ़के उत्तर तथा पूर्वमें देव नदी, दक्षिण-पूर्व में शोण नदी, । कहा जाता है, कि जिस ! सामने में इन दोनों नदियों का सङ्गन पर्व पश्चिममें गढ़