पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५८०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विराध-विराम'. ५०४" राक्षस उनको आँखों के सामने भाया। यह राक्षस इन कर गिर पड़ा। रामलक्ष्मण उसको मार डालने की चेष्टा लोगोको देख भापण शम्द करने लगा और सीता देवी करने लगे, किन्तु वह किसी तरह न मरा। ... को उठा कर ले चला। कुछ दूर जा कर उसने कहा, कि त रामने राक्षप्तका व समझ लक्ष्मणसे कहा- तुम लोग कौन हो १ देखता हूँ. तुम्हारे कन्धे धनुष लटक इस रांझसने पेसा तपस्या को है जिससे यह युद्ध में न रहा है। कमरमे तलवार चमक रही है, फिर भी तुम्हारे ] मारा जायगा । अंतपय दम लोगइसे जमोगमे गाड़ दें। मैं शिरपर जटा और शरीर पर वहाल है। जब तुम लोग इसकी गरदन ददाता तुम गड्ढा ते गर करे। यह कह दण्डकारण्य मा गये हो, तव तुम्हारी मा रक्षा कहां?/ कर राम उसको गादन पाले दावे खई हुए और लक्ष्मण जीवनकी आशा कहां दो तापसके एक नाके साथ गड्ढा खोदने लगे।. . . .. घास करना किस तरह हो सकता है। तुम लोग नितांत । विराध उस समय राम वन्द्रसे कहने लगा--पहले में पापी और अधर्मचारी हो तुम लोगोका यह मनिका और मापको ज्ञानवश पचान न सका। अब मैं समझ गया, शाचरण वाघाडम्यर है। मैं विराध नामका राक्षस रिमाप दशरथके पुत्र रामचन्द्र हैं। यह सीमाग्ययतो इस अरण्य मुनियोंका मांस भक्षण कर मानन्दसे कामिना सोता और यह लक्ष्मण हैं । मनिशापयश मैंने यह विचरण करता रहता है। यह परमा सुन्दरी नारो मेरो भयङ्कर राक्षसह पाई है। पहले मैं गन्धर्वा था। मेर। भार्या बनेगी और तुम लोगोंका रक्त मैं पान करूगा।। 'नाम तुम्बुरु है । कुवेरने मुझे शाप दिया था, किन्तु मैंने विराधने और भी कहा, 'मैं जवनामक राक्षसका पुत्र है। उनसे शापमोचनको प्रार्थना फो। इस पर उन्होंने कहा, मेरो माताका नाम शतहदा है । मैं तप द्वारा ब्रह्मासे | कि दशरथपुत्र रामचन्द्र के युद्धगे मारने पर तुम पुनt अच्छेच अभेद्य मश्यय रहनेका नर पा चुका है। . मत गन्धर्वका शरीर पामोंगे और इस धाममे गावोगे। पृषा युद्धको चेपासे रहित हो। इस कानिनोको परित्याग रम्भा प्रति आसक्त रह कर बहुत दिनों तक उनकी सेवा. कर शीघ्र शीघ यहांसे तुम लोग भाग जाओ। में न पहुचना मेरा अपराध था। 'आय आपकी कृपासे ___रामचन्द्र विराधकी यह बात सुन कर फोधसे उन्मत्त इस अभिशापसे मुक हो कर मैं सदेश गमन करूंगा। हो कर उसके प्रति भीषण शष्टि करने लगे। किन्तु माप मुझको गड्ढे ने फेंक कर मार डालिये । शस्त्र द्वारा यह भीपणाकार विराध कमी हसता कभी जमाई करता मेरी मृत्यु न होगो। आपका' मङ्गल हो। ' यहा' खड़ा रहा। रामनन्द्रके वाण उसके शरोरसे. । इसके बाद रामलक्ष्मणने बड़े आनन्द के साथ उसको पाहर निकल कर जमीन पर गिरने लगे। इस तरह ] उठा कर गड्ढे में पटा दिया । गिरते हो भीषण घोरतर युद्ध होने लगा, किन्तु ब्रह्माके वरसे घिराधको | ध्वनि कर विराधके प्राण निकल गये। मृत्यु के बाद कुछ भी कर न पहुंपा। यह पलपूर्णक लड़कों की तरह जमीनमें गाड़ा जाना राक्षसोका धर्म है। मृत्युके बाद रामलक्ष्मण दोनोको उठा कर अपने कन्धे पर रख कर यन | जो राक्षस जमीन में गाड़े जाते हैं, वे सनातनलोक पाते। जाने लगा और सीतादेयोको छोड़ दिया। ।। .. है। (रामायण, अरययकापड, १.५०) . .' जब विराध इन दोनों को हरण कर वनको ले चला] २ अपकार, पीड़ा, ध्या, पोड़न) . तय सीतादयो विलाप कर कहने लगो-हे विराध! विराधन (स० को) विराधे ल्युट । १ अपकार तुम इन लागेको छोड़ दो। इनके बदले में मुझको दो करना, हानि करना। २ पोड़ित करना, सताना। हरण करो। मैं तुमको नमस्कार करती है। सीताका विराधान (स' क्लो) पोड़ा। यह विलाप सुन रामलक्ष्मणको बड़ा फ्रोध हुआ और ये घिराम (सं० पु. ) विरम धा । १ शेष, निवृत्ति । शिराधको मारने में सवेट हुए । उस समय रामने जोरोंसे पर्याय-भवसान, साति, मध्य ! २ किसी फिराका उस राक्षसकी दक्षिणः भुना और लक्ष्मणने वाम भुजा ) व्यापारका कुछ देर के लिये वेद होना, 'कमना या धाना) तोड़ डाली। उस समय राक्षस अवसन हो भूच्छित हो/ ३ चलने को पकापट दूर करने के लिये रास्तेमें ठहरना, .