पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५८३

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विश्व ५०७ • यदि इस प्राङ्गलदेशमें पायुनाशक स्निग्ध (घृत | त्मक तर्पण पानकादि द्रव्य और दियानिद्रादि क्रियाये तैलादि स्नेहाक या रसाल) द्रष्यके और दिनको निन्दादि तथा विसर्गकालके विरुद्ध कटु, तिक्त और पाप रसा. कियाका व्यवहार किया जाये, तो तहे शपियद्ध होगा। त्मक द्रव्य तथा व्यायाम, लंघनादि क्रियाय व्यवहत होती इस तरह अनूपप्रदेशों में यदि कटु, (कड़या, रुक्ष, स्नेह- हैं। मूल बात यह है कि शीतकालमें तात्कालिक उष्ण होन) और लघुष्य तथा व्यायाम, लघन मादि क्रियाए । मोर उग्णयाा द्रव्य तथा उष्णक्रिया ( अग्नितापादि) देश वियर हैं और साधारण देशमें उनको संमिश्रण- तथा गमोंके समयमै जो शीतलद्रण्य ध्यबहार और शैत्य- क्रिया व्ययहत होनेसे उसको भी यथायधभावसे तहेश क्रियायें की जाती है, घे कालविरुद्ध हैं। विरुद्ध कहा जाता है। उसके द्वारा साधारणतः गच्छो प्रकृति विरुद,-यात, पित्त और कफमेदसे लोगो की तरह समझा जा सकता है, कि उष्णप्रधान देश शैत्य । प्रकृति तीन तरहको होती है अर्थात् यातप्रधान = यात. किया और शीतल द्रष्यादि तथा शीतप्रधान देशमें उष्ण | प्रकृति, पित्तप्रधान - पित्तप्रकृति, श्लेष्मप्रधान - श्लेष्म- · द्रष्य मौर तमियादि तहेशविरुद्ध है। मतपय इससे प्रकृति । पात, पित्त और कफ ये परस्परविरुद्ध पदार्धा साधारणतः स्पट मालूम हो रहा है, कि संव द्रव्य या | हैं, क्योंकि इनमें दिखाई देता है, कि जो सब द्रव्य या फियाओंके विपरीत है अर्थात् इन्ता या दोपनाशक | क्रियाये ( तुल्य-गुण-हेतुक ) एकका (पायु या पित्तका । है (जैसे अग्नि जलका, शीत उष्णका, निद्रा जागरणका यद्धक है, ये (विपरीत गुणहेतुक) दूसरेका (श्लेप्माका) विपरीत है ) घे हो उनके विरुद्ध है। यह विरुद्ध द्रव्य हासक होती है। जैसे वातवद्धक, कटु, तिक्त और और शिया धारा ही चिकित्सा-कार्याको बहुत सहायता कपायरसात्मक दृष्य गौर लंघनादि क्रियायें कफको मिलती है। पयोंकि जहां पातपित्तादिदोप गौर द्रव्य. विरुद्ध हैं। कफयद्धक मधुराम्ललवणरसात्मक द्रव्य की अधिकता प्रयुक्त रोगको उत्पत्ति होती है, तत्तत्. और दियानिद्रादि क्रियायें घायुको विरुद्ध हैं तथा पिरा रूपलमें उनके विरून द्रव्य और क्रियामों द्वारत चिकित्सा पद्धक अम्ल, लवपरसात्मक द्रष्य घायुफे और कटुरसा. परनी चाहिये। स्मक द्रथ्य तथा लंघनादि फिशये कफको विरुद्ध हैं। ___ काल विरुद्ध,-काल शम्दसे यहां संवत्सररूप और श्लेष्मपद्धक मधुर और यातयक तिक्तरसात्मक व्याधिको क्रिया (चिकित्सा) कालादि समझने होंगे। इध्यापितके विरुद्ध हैं। अतएव तत्तत्प्रकृतिक लोगों के आयुर्वेद विशारदने संवत्सरको आदान ( उत्तरायण), सम्बन्धमे भो जो घे द्रव्य और क्रिया परस्परविरुद्ध और पिसर्ग ( दक्षिणायन) इन दो कालोमें विभक्त किया | हैं, पद्द फिरसे प्रमाणित करना मनावश्यक है। क्योंकि है। उन्होंने माघ माससे मारम्भ कर प्रत्येक दो मास ऋतु यातप्रकृतिक या वातप्रधान लोगों की यायुके विरुद्ध मान कर यथाक्रम शिशिर । शीत ), बसन्त और प्रोम मधुराम्लरसात्मक द्रव्य भीर दिवानिद्रादि क्रियाको इन तीन प्रमों में अर्थात् माघसे आपाढ़ तक उत्तरायण व्यवस्था करनेसे ही उनकी प्रकृतिको हासता या समता ___ या मादानकाल और इसी तरह धाषणसे पाप तक वर्षा, | होती है। सुनरां पित्त और श्लेष्मप्रतिके लिये भी इसी शरत् और हेमन्त इन तीन ऋतुओंमें दक्षिणायन या | तरह समझना चाहिये। ' विसर्गकाल निदिए किया है। नैसर्गिक नियमानुसार | ___ संयोगविरुद्ध-उदय, मधु, दुग्ध या धान्यादिके मादानके समय शरीरफ रसमय होनेसे जोय कुछ निस्तेज कुरके साथ अनुपमांस भोजन करनेसे संयोगविरुद्ध और विसर्गफे समय इस रसके परिपूर्ण होनेसे उसकी | अपेक्षा जरा-सा तेज और गवशायिशेप इसको अत्य ___ * "वृद्धिः समानः सर्वेषां विपरीते विपर्यया ।" धिक वृद्धि होनेसे ये ज्यर भीर आमवात आदि रोगोंसे । 'सपा दोषघातुमलानां समानस्तुल्यगुप्पद्रव्यादिभि दि: आफ्रान्त होते हैं । इसलिये इन दो कालों में यथाक्रम ! विपरीत व्यादिभियि पर्यायो वृद्धिदेपरीत्यं भवति । उनके विरुद्ध अर्थात् मादानकालके विरुद्ध मधुराम्लरसः । (पाग्मट सत्रस्या० ११ म०)