पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५९४

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५१२. घिरेचक देना होता है। पोंछे कोई सुगन्धित द्रध्य सूचना तथा | विदिर पक्षीके मांसरसके साथ शालिधानका मात वायुरहित स्थानमें रह कर पान खाना उचित है। इसमें खिलावे। (भावम० विरेचनविधि ) वेगधारण, शयन और शीतल जल स्पर्श न करे तथा | सुश्रुतमें विरेचनका विषय इस प्रकार लिखा है,- लगातार उष्ण जल पोधे । | मूल, छाल, फल, तेल, स्वरस'गरि क्षोर इन छ: प्रकोरफ .. वायु जिस प्रकार वमनके पाद पित्त, कफ और औषध विरेचनका व्यवहार करना होता है। इनमें से मूल . के साथ मिलनो है उसी प्रकार विरेचनके बाद भो मल, विरेचनमें लाल निसोथका मूल, त्वक्-विरेचनमें लोध. पित्त और औपधके साथ कफ मिल जाता है। जिनके ) को छाल, फल-विरेचनमें हरीत की फल, तैल-विरेचनमें अच्छी तरह विरेचन न हो, उनकी नाभिकी स्तब्धता, कोष्ठ- रेडीका तेले, स्वरस-विरेचनमें करवल्लिका (करेले का देशमै वेदना, मल और वायुका अप्रवर्तन, शरीरमें कण्टु रन और क्षोर-विरेचन में मनसा मोजका क्षीर श्रेष्ठतम है। और मण्डलाकृति चिह्नोत्पत्ति, देहको गुरुता, विदाह, विशुद्ध निसोथमूलचूर्ण विरेचन द्रष्यके ' रसमें अरुचि, भामान, भ्रम और वमि होती है । ऐसे अवस्था- भावना दे कर चूर्ण करें तथा सैन्धव लवण गौर सोंठका पान वाक्तिको पुना स्निग्ध अथच पाचक औषध सेवन चूर्ण मिला कर प्रचुर अम्ल रसके साथ मध डाले। द्वारा दोषका परिपाक करके फिरसे विरेचन कराधे।। पोछे यह वातरोगोको घिरेचन के लिये पान करानेसे उत्तम ऐसा करनेसे उक्त सभी उपद्रय दूर होते, अग्निको तेजो, विरेचन होता है। पढ्तो गौर शरीर लघु होता है। गुलञ्च, नीमको छाल और त्रिफलाके काढ़े में अथवा ___ अतिरिक्त विरेचन होनेसे मूर्छा, गुददंश और त्रिकटुके चूर्ण डाले हुए गोमूतमें निसोथका चूर्ण मिला अत्यन्त कफस्राप होता है तथा मांसधौत जल अथवा कर कफज रोगमें पिलानेसे विरेचन होता है। निसोध. रक्तकी तरह पनि होती है। ऐसी अवस्थामे रोगी के मूल की बुकनी, इलायचीको चुकानी, तेजपतको धुकनी, के शरीर में शीतल जल सेक करके शीतल तण्डुलके दारचोनोको धुकनी, सोंठका चूर्ण, पीपलको बुकनी और जलमें मधु मिला कर अल्प परिमाणमें वमन करावे। मरिचको बुकनी इन्हें पुराने गुड़के साथ श्लेष्मरोगमें अथवा दधि वा सौवीरके साथ आमका छिलका पीस | चाटनेसे उत्तम विरेचन वनता है। दो सेर निसोध मूलका कर नाभिदेशमें प्रलेप दे। इससे प्रदीप्त अतीसार भी रस; आंध'सेर निसोथ तथा सैन्धवलवण और २ तोला प्रशमित होता है। भोजन के लिये छागदुग्ध और विष्किर सोंठकी चुकनी इन्हें एक सा'पाक करें । जव यह पाक पक्षी अथवा हरिण मांसके जसको, शालिधोन, साटी) खूब घना हो जाये, तव 'उपयुर मात्रामे यातश्लेस्मरोगो- और मसूर के साथ नियमपूर्वक पाक करके प्रयोग करे। · को विरेचनार्थ पिलाना होगा। अथवा निसोथका मूल इस प्रकार शीतल और संप्राही द्रष्य द्वारा भेदको दूर तथा समान भाग सोंठ और धवलवण पीस कर यदि करना होता है। गोमूत्रफे साथ घातश्लेष्मरोगी को पिलाया जाये, तो उत्तम शरीरको लघुता, मनस्तुष्टि और वायुका अनुलोम विरेचन होता है। . होनेसे जब अच्छी तरह विरेचन हुमा मालूम हो जाये, निसोशका मूल, सौंठ और । रीतकी, प्रत्येकको धुकंनो तब रातको पाचक औषधका सेवन करावे। विरेचक, २ भाग, पक सुपारीका फल, विडङ्गसार, मरिच, देव. औपचके सेघनेसे बल और बुद्धिको प्रसन्नता, अग्निदीप्ति. दार और सैन्धय प्रत्येककी युकनी आध भाग ले कर धातुमें भी. पयःक्रमको स्थिरता होती है । विरेचनका | मिलावे और गोमूत्र के साथ सेवन करे, तो विरेचन सेवन करके सत्यन्त वायुसेवन, शीतल जल, स्नेहाभ्या होता है। .... : '. अजीर्णकारक द्रव्य, ध्यायाम और स्त्रीप्रसङ्गका परित्याग गुड़िका-निसाध आदि विरेचन द्रव्यको पूर्ण कर करना अवश्य कर्तव्य है । विरेचनके याद शालिधान, ] विरेचक द्रश्यफे 'रसमें घोटे। पोछे विरेचन द्रव्यों के और मूंगसे यथागू तैयार कर अथवा हरिणादि पशु या मूलके साथ उसका पाक करे या घृतके साथ मईन ।