पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६२३

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विवाह ५३७ प्रवाहित हो जाता है । अन्तमें जो जीतता है, उसोको वह है। यह प्रथा हमारे वैवाहिक यज्ञको अस्पष्ट क्षीण स्मृति स्त्री घरमाल्य पहनाती और उसीका अनुगमन करती है। मालूम होतो है। टोडा जव स्त्रो प्रहण करते हैं, तव - असभ्य समाजके आदिम अवस्थामें सर्वव हो इसी कन्या घर आते हो किञ्चिन्मान गाईस्थ्य कर्मका सम्पादन तरह स्त्री-पुरुषों में . संयोग होता था, इसमें जरा भी करतो है, बस यही उनके विवाहको एकमान क्रिया है। सन्देह नहीं। इस समय भी इस समाजमें यह प्रथा न्यूगिनीदेशक अधिवासियों में स्त्री-ग्रहणकी पद्धति विद्यमान है। किन्तु इस अवस्था नरनारियों का समाज- अतीव सहज है । कन्या स्वयं परको अपने हायसे पान वन्धन असम्भव है। ये मुण्ड के झुण्ड पक्षियों की तरह तम्बाकू देतो है और घर इसके हाथसे उपहारकी इन चीजों समाजमें दल बांध कर रहते हैं, फिर भी इन सय दलोंमें को ले लेता है। यहां उनके विवाहका नियम है, दूसरा माज भी सामाजिक नियम और डुला गादि दिखाई। कुछ नहीं। नायागा ( Narago ) जातिक लोगोंकी नहीं देती। मनुष्य मनुष्यों कोई भी सम्बन्ध-यन्धन नहीं! विवादपद्धति बहुत साधी है। इनको रोति यह है, कि फल. होता, नरनारियों में भी किसी तरहका सम्बन्ध नहों से भरा हुआ एक 'दौरा' या पान रख वर और कन्याको होता। सामयिक उत्तेजना या सामयिक भीति द्वारा आमने सामने येठाते हैं और उस पालमे रखे फलको एक हो इस श्रेणोके असभ्य मानवदलके स्रो-पुरुषोंके संसर्ग-| साथ खाते हैं। इसी घटनासे वे विवाह-सूत्र में आवद्ध से सन्तानोत्पत्ति हुआ करती है। फलतः इस तरहको | हो जाते है। प्राचीन राममें भी वर-कन्या एक साथ पीठा प्रया हमारे शास्त्रों द्वारा प्रवर्तित किसी तरह के विवाहके खा कर विवाद-वधन यंध जाती थी। अन्तभुक नहीं है। ये सव पद्धतियां ही विवाह-पद्धतिको आदिम प्रथा बुसमेन लोग जब कोई स्त्रो प्रहण करने लगते हैं, तब हैं। स्त्री-पुरुपको एकत रह कर घरका काम आदि करना . वे केवल रमणीको अनुमति हो लेते हैं । सिया इसके हो तो दोनोंको एकत्र हो मेजिनादि कर घरका काम करना इनमें विधाहकी दूसरी कोई प्रथा नहीं है। चिपिवायनों- होता है। इन सब पद्धतियों के मूलमें अतर्फित और प्रच्छन्न में अब तक विवाह प्रचलित हो नहीं हुआ। एस्कुइमो रूपसे यह मङ्गलमय समाजहितकर उद्देश्य छिपा था जातिके लोगों में समाजवन्धन भी नहीं और न विवाह प्रथा ही है। तथा अविचलित भावसे मसभ्य समाज, आज भी ये अलेउट आतिके लोग पशुपक्षियोंको तरह स्रो- सब प्रथायें चली मोती है। जातिमें उपगत हो कर बंशका विस्तार करते हैं, इनमें __इस श्रेणीके असम्योम जैसा विवाह बन्धन दोला भी विवाह-धन्धन नहीं 1. प्रेरके भ्रमणवृत्तान्तमें लिग्ना है, परित्याग भो पैसा हो सहज है। चिपिवायन यात- है, कि गारावाक ( Aravak) जातिमें स्त्री-पुरुषका की वातमें स्त्रोको मार कर घरसे निकाल देते हैं। निन्न मिलन सामयिक मात्र है। इनमें विवादवन्धन दिखाई कालिकोर्नियाफे परकुइ ( Percue ) कई स्त्रियां रखते हैं, नहीं देता। येहा और नित कालिफोर्नियावासियों में घे इनसे लौंडो वांदियोंको तरह काम लेते हैं और जब वियाहबन्धन तो दूरको बात है, इनको भाषामें विवाहका कभी इनमें किसीसे खटपट हुई तो झोटा पकड़ कर अर्थवांचक कोई शब्द हो नहीं मिलता। वनवासी पशु- निकाल बाहर कर देते है। . पक्षियों की तरह पे स्त्रियोंके संसर्गसे सन्तानोत्पादन टुपिस ( Tupis) जातिके लोगों में स्त्रीत्यागको किया करते हैं। . पद्धति भी ऐसी ही दिखाई देती है। पेमो बहुतेरो • किमी किसी असभ्य जातिमें स्त्री ग्रहण करनेको जो स्त्रियां रखते हैं और सामान्य कारणों पर हो पकको प्रथा दिखाई देती है, यह भी यिवाह-उद्देश्यकी पूरी करने- | निकाल दूसरी स्त्रीको रख लेते हैं। तासमेनियावासियों पाली नहीं, केवल सामयिक क्षणस्थायी नियम मान है। में भी ऐसो रोति प्रचलित है । कोसियोंमें आज भी किसी स्थानके असभ्यो में भाग जला उसको यगलमै । विवाह पद्धति दिखाई नहीं देतो । मलय-पलिनेसिया पैठ नागके सामने स्त्रो विवाहको सम्मति प्रकाश करती (Malayo Polynesian) द्वोपके रहनेयाले असभ्य Vol. XXI. 135