पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६३०

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५४४ विवाह उपभोग करना। हमलोग भी माताके निकट ऐसी ही | नेपाणिग्रहण किया था। ये भ्रष्टा न थीं । धार्मिक व्यक्ति प्रतिज्ञा आघद्ध हुए हैं। इस प्रतिशाके अनुसार द्रौपदी उनको श्रद्धा करते थे। ब्राह्मी नाम्नी मुनिकन्याने प्रचंता हम लोगोंकी रानी धनेगी।" इनको आनुपूर्विक नियमा- आदि दश भाइयो का पाणिग्रहण किया था। अतः ऐसा नुसार पांच भाइयोंका पाणिग्रहण करना होगा। युधि- वियाह वेद या लोकविरुद्ध नहीं कहा जा सकता। प्ठिरकी यह बात सुन कर 'दू पदने विस्मित् हो कर कहा सदासे बहुपतित्यका निषेध शास्त्र में विहित है। समय था- .. भेदसे निपिद्ध नहीं है। विशेषतः माताको मात्रा अत्यन्त __"हे कुरुनन्दन ! शास्त्रमें एक पुरुषको अनेक स्त्रियोंके वलयती है और यह हमारे लिये एकान्त पालनीय है।" विवाह करनेका विधान दिखाई देता है, किन्तु एक इसके बाद व्यासदेव युधिष्ठिरकी वातका समर्थन स्त्रोके कई भरिकी बात फहो सुनाई नहीं देती। कर द्रौपदीके पूर्वजन्मकी बात कहने लगे। दोपदीने युधिष्ठिर, तुम पवित्र गौर धार्मिक छो, तुमको यह देव देव महादेवसे पांच घार गुणवान् पति पानेको प्रार्थना लोक-विरुद्ध वेद विरुद्ध कार्या शेमा नहीं देगा । तुम्हारी की थी। दयामय आशुतोप शटरने द्रौपदीके प्रत्येक ऐसी बुद्धि क्यों हुई ?" इसके उत्तरमें युधिधिरने कहा, चारको प्रार्थनाको पूर्ण कर उनका पांच पति पानेका वर "क्या करू? माताको आज्ञाकी अवहेलना हमसे , प्रदान किया। पांच पतिकी प्राप्ति घरको 'बात सुन न को जायगो। विशेष ता मैं पहले ही कह चुका है, कि · कर द्रौपदीने कहा, "प्रभो! मैंने पांच पतिको कामन एक समय एक स्त्रीका एक साथ पांच स्वामियों को सेधा कभी नहीं की। मैंने गुणवान् पक हो पतिकी प्रार्थना करना शास्त्रविरुद्ध पात हो सकती है, किन्तु आनु. को थी।" महादेवने कहा, कि तुमने पांच बार वरक': पूर्विक नियम तथा समयके भेदसे द्रौपदी हमारे समो | प्रार्थना की है, अतः मैं एक बार भी तुम्हारों प्रार्थनाको भाइयोंकी मदिपो बन सकती है। ऐसा करने में शास्त्रकी निष्फल न करगा। तुम गुणयान् पांच पति प्राप्त कोई निषेधाज्ञा नहीं दिखाई देती। धर्मको गति बहुत करोगी। . . . . . . . सूक्ष्म है। हम इसका मर्म मच्छी तरह नहीं समझते। | ___ • सर्वाश व्यासदेवने इस तरह 'द्र पदके सन्देहा. किन्तु माताको आशाका उलंघन भी नहीं कर सकते।। त्मक प्रश्नको मीमांसा कर दो। इससे साफ प्रकट द्रौपदी हमारे पांचो भाइपोंको सम्भाग्या होगी।" होता है, कि किसी समय भारतके भायों में भी यहु- (भारत १।१९।२।२८)/ भत्तु कताकी प्रथा प्रचलित थी। : किन्तु महाभारतके द्रुपद राजा सुधिष्ठिरको तर्फयुक्तिसे विस्मित हुए। यहुत पहले ही इस प्रथाका अन्त हो गया था। इसका सहो, किन्तु उनके चित्तको सन्तोपन हुभा। उन्होंने भी स्पष्ट प्रमाण द्र पदके इस प्रश्नसे ही मिल जाता है। व्यासदेवसे इस प्रश्नको पछा-एक पत्नीका बहुत किन्तु दक्षिणमें कहीं कहीं अब भी यह प्रथा प्रचलित पति रहना वेद-विरुद्ध तथा लोकाचार विरुद्ध है। ऐसा है। ... .. कार्या पहले कभी नहीं हुया है और न किसी महा- निवाकोडके दक्षिण अञ्चलके घेद्य और हजाम भाव- स्माने ऐसे कार्यका अनुष्ठान कराया है। मुझे इस धम् या अम्पट्टन नामसे प्रसिद्ध है। इन्हीं अम्वष्ठ जातिके विषयमे नितान्त सन्देह हुआ है, कि ऐसा कार्या धर्म.. लोगों में आज भी यहुभत्त कता प्रचलित है। इनमें एक भाई- संगत है या नहीं। . . . . . . . की स्त्री अन्यान्य भाइयों की भी स्त्री कहलाती है । इस प्रदेश- , धृष्टद्य म्नने द्रुपदके अभिप्रायका समर्थन किया। युधिः के बढ़ई गादि कारीगरों में भी एक भाईकी स्तो भन्यान्य प्टिरने उसका प्रतिवाद कर कहा, "मैंने जो कुछ कहा है, भाइयों की स्त्री कहो जाती है । जेठाई छोटाईके हिसाय- वह झूठ नहीं, अधर्मजनक भी नहीं । विशेषतः अधार्मिक | से सन्तानका बंटवारा हो जाता है अर्थात् जेठा कार्यों में मेरो प्रवृत्ति नहीं होतो। पुराणेसि जाना जाता सन्तान जेठे भाईका, इसके बादका यानी इससे छोटा. है, कि गौतमवंशीया जटिलानाम्नी कन्याका सात ऋषियों सन्तान उस जेठे भाईसे छोटे भाईका कहलायेगा । इसा