पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६३४

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५४८ विवाह ब्राह्मणादि उय वर्षों में नहीं चलता। संहिताकार अमः। और भी एक उदाहरणका उल्लेख किया जाता है गोल विवाहके अविसंवादित पक्षपाती हैं। मातृसपि एक कन्या बहुत दिनों से कुष्ठ रोगसे पीड़िता थी । अश्वि एडन्यके सम्बन्धों कुछ भी मतमेद नहीं। किंतु संख्याके | कुमारद्वयने जब इसकी चिकित्सा की, तब पे यौवनकाल गिनने अवश्य मतभेद है। इसके बाद उसकी आलो-1 पार कर चुकी थी। इसके बाद उसका विवाह हुम चना की जायेगी। सगोला कन्याका विवाह दैहिक था। यह भी ऋग्वेदकी हो कहानी है। इससे या और मानसिक उन्नतिके लिये शुभजनक नहीं। आधु. स्पर विदित होता है, कि युवती-कन्याका विघाद वैदिक निक विज्ञाग द्वारा भी यह सिद्धान्त संस्थापित हुआ है। युगसे ही प्रचलित था। मनुने यद्यपि कन्याओं के विवाह ___ युवती कन्याका विवाह । का समय १२ वर्ष निर्धारित किया है, किन्तु उपयुच वैदिक मसादिके पढ़नेसे मालूम होता है, पति न मिलने तक कन्या ऋतुमतो और वृद्धा हो कर मा कि चैदिक कालमें कभी भी वाल्यविवाह प्रचलित नहीं भी जाये, पर उम्र बढ़ जानेसे कैमा ह वरके साथ उसक था। सूक्त मंत्रादिमें वधूफे लिपे जितने शब्द व्यवहत विवाह कर दिया जाये, इस प्रथाके मूलमें उन्होंने कुठारा हुए हैं, उनमें युवतीके सिवा और कोई युक्ति वालिकाके | घात भी किया है। समूचा महाभारत युपती कन्या लिये नहीं कही गई है। फिर विवाहलक्षणयुक्ता न | विवाहका ही प्रमाण प्रन्थ हैं। अङ्गिराका वचन माज होनेसे कन्याओं का वियाह नहीं होता था। ऋग्वेद- कल हो प्रचलित है। किन्तु इस समय "दर्श कन्याक संहितामें ऐसो भो ऋक् दिखाई देती है, कि कन्या प्रोक्ता : उर्ध्व रजस्वला" अङ्गिराइस वचन पर म "नितम्बघतो" होनेसे विवाहलक्षणयुक्ता समझी जाती । हिन्दू समाजके अधिकांश लोग थ्रद्धा नहीं रखते। किन्तु थी। जैसे- भारतवर्ष के कई स्थानोंम तो कुछ लोग "मठ वर्षा भवेत "उदीष्वातः पतिवती धपा विश्वावसु नमसा गोभिरीच्छे।। गौरी" आदि मनुयायका प्रमाण दे कर महा अनर्थ कर कन्यामिच्छ पितृपदं व्यक्ता सते भाग जनुया तस्य सिद्धि ॥" देते हैं। दो चार वर्षको वालिकाओंका विवाह में (ऋक १०१८५२२११) हो जाता है। कहीं कहीं तो छः छः महीनेके शिशु सन्तान गर्थात् हे विश्वावसु! यहाँसे उठो। क्योंकि इस को शादी हो जाती है। कुछ निम्नश्रेणोके हिन्दुगों में कन्यामा विमाह हो गया है। (विश्वावसु वियाहके तो गर्भस्थ घालको विवाहका हो पैगाम हो जाता है। अधिष्ठात्री देयता है विवाह हो जाने पर उनका अघि. इधर कई वर्षों से देशकै शुभचिन्तक इसके रोकनेको चेष्टा मातृत्य नहीं रह जाता ) नमस्कार और स्तबसे विश्वा- कर रहे थे, किंतु उन्हें इस काममें मफलता नहीं मिली वसुकी स्तुति की जाती है, और कहा जाता है-पितृ अन्तमें श्रीयुक्त रायसाहव हरविलास सारदा महोदय गृहमें जो कन्या विवाहलक्षणयुक्ता हुई है, उसके यहां वालविवाह के रोकने के लिये कौंसिल में एक विल पेश जाओ, इत्यादि। किया। इस यिलका मर्म इस तरह है-१४ वर्षसे कम्म इसके बादको ऋक में भी इस विषयका प्रमाण मिलता उम्रकी बालिकाओं का और १८ वर्षसे कम उम्र के है। जैसे- बाल फांका विवाह करनेवाला पिता माता या अभिमायक "उदो बातो विश्वासो नमस्येच्छा महे त्वा। दोपो समझा जायेगा। यदि यह साबित हो जाये. अन्मामिच्छ प्रफर्य सं जायां पत्या सूज ॥" कि अमुकने १३,हो घर्ष में किसी कन्याका और १७ हो (भूक २०१८॥२२) ] वर्णमें किसी बालकका विवाह कर दिया है, तो उसकी अर्थात् हे विश्यायसु ! यहांसे उठो । नमस्कार द्वारा १ महीनेकी सादी जेलको सजा और १०००) रुपये तक तुम्हारी पूजा करू।' नितम्पवतो किसी दूसरी स्रोफे 'धुर्माना किया जा सकता है। यदि साबित न होगा, तो घर जामो और उसको पत्नी बना उसके स्वामोकी संगिनी| उन्हें (जिसने दरखास्त दे मामला चलाया था) १००) एक सौ रुपये तक जुर्माना होगा। सारदा महोदयके इस बिल बना दो।