पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६३५

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विवाह पर दो वर्ष तक यड़ा वादानुवाद हुआ। अन्तमें इस अर्थात् हे प्रतकारी शीघ्र गमनशील सबके प्रार्थनीय विलको उपयोगिता देख कर लोगोंने इसका साधभौमिक । आदित्यगण 'रहसू' अर्थात् गुप्तगर्भ की तरह मुझे दूसरे रूप किया। गव यह कानून केवल हिन्दुओ के ही लिये। दूर देशमै फेक दो। हे मिन और यरुण तुम लोगोंका नहीं , बरं. भारतमें पसनेवाली सभी जातियों के , मङ्गल कार्या समझ कर मैं रक्षा करनेके लिये तुम लोगों- लिये लागू होगा । महुत यादानुयाद होने के बाद को घुलाता है। तुम लोग हमारी स्तुति सुनो। यह कानून सन् १९२६ ई०को मलपे काममें लाया ___रहसूरिय" पद मूल में है। सायणने इसको व्यय 'जायेगा। इस तरह भारतमें पालयियाइका अन्त स्थामें लिखा है-"रहसि जनरज्ञातप्रदेशे सूयते इति हो गया। अधिकांश हिन्दुओं में पहले होसे १२२१३ वर्ष रहसूः व्यभिचारिणी, सा यथा गर्भ पातयित्वा दूरदेशे को कन्यामों का विवाह होता था। यहांकी आदिम परित्यजति तद्वत् । जातियों में तो पूर्ण यौवन प्राप्त न होने पर कन्याका विवाह होता ही न था। इससे मालूम होता है, कि जय यह भूफ बनी थी, चिर कुमारी। तब इस देशमें कुमारी अवस्था ही सम्भवतः किसी 'ऋग्वेदमें ऐसा भो प्रमाण मिलता है, कि प्राचीन किसी कन्याओंका गर्भ रह जाता था अथवा उस समय काल में इस देश में कुछ कन्या चिरकुमारोभायसे पिता- समाजमें विधवा-वियाह चारों तरफ फैला न था। 'लयमें रह जाती थी और पिता धनको अधिकारिणो व्यभिचारिणो स्त्रियांका गुप्त गर्म उस पुराने युगमै धोती थी। अग्येदमें इसके प्रमाण भी मिलने हैं, जैसे निन्दित समझा जाता था। एक श्रेणीको गादिम "अमाजुरिय पित्रोः सचा सती समानादासदसलामिये भग। अमभ्य जातिके लोगोंमें यह कार्य अपराधर्म नहीं गिना कृषि प्रतिमुपे मास्या भर ददि भाग तन्योऽयेन माम" | 'जाता। किन्तु सुसभ्य दिन्दूसमाजमें ऋग्वेदके उस पुराने ' (२ मपक्ष १७ सूक्तः७ ऋक ) | समपसे हो ऐसा व्यभिचार घृणाकी दृष्टि से देखा जाता सायणभाष्य के अनुयायो इसका अनुवाद इस तरह है। आज भी यह जघन्य कार्या ठीक उस पुराने युगकी तरह होता है सही, किन्तु आज भो यह जनसमाजमें हे चन्द्र ! पतिमभिमानी हो जायजीवन पिता-माताके निन्दित समझा जाता है। साथ उनकी शुश्रू पामें रत रहती हुई दुहिता जैसे पिता. विधाहमेद। गृहके धनको प्रार्शना करती है, धैसे ही मैं भो तुमसे ऋग्वेदसंहितामें कई तरहके पियाहको प्रथा दिसाई धनकी प्रार्थना करता। उस धनको तुम सबके देती है। पिछले मन्यादि स्मारी लोगों ने ग्राह, दैव, सामने प्रकट करो, उसका परिमाण बताओ और उसका आर्ग, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच - सम्पादन करो। इस धनसे तुम स्तोताओं को सम्मानित करो। इन आठ तरहफे विवाहों का उल्लेख किया है। मुद्रित ऋग्वेदसंहितामें राक्षस और पैशाच विवादका उदाहरण व्यभिचारिणी। ऋग्वेदके समयमै स्त्रियों का स्वच्छन्द विहार बन्द नहीं मिलता। ब्राह्म, देव, आर्ण, प्राजापत्य और गान्धर्य . दुया था। कुमारी और विधवा अवस्था गुप्तरूपसे विवाहो का मामास बहुत दिखाई देता है। गर्भ सञ्चार होने पर व्यभिचारिणी त्रियां गुप्तरूपसे गर्म ___ ब्राह्मविधाहमें घरको घरमें घुला घरकन्याको सजा कर गिरा देती थी। मृग्वेदमें इसका भी प्रमाण मिलता है। T ranपूजाफे साथ घियाद कर दिया जाता है। अग्धेदके समय भो घरको कन्याफे घर बुलानेकी रीति थो । वियाफे - "धृतम्रता आदित्या इषिरा थारे मत्कर्त रहसूरिवागः। समय वर भौर कन्याको अलंकृत करनेका ममाण ऋग्वेदमे श्रूयवतो वो वयण मित्र देवा भद्रस्य विद्वान् अवसे हुवे च: " बहुत मिलता है। यहां एक प्रमाण उल्लेख कर दिया . (२म २६ सू० १ भृक )| जाता है। जैसे- vol, XXI, 138