पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६५४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विवाद ५६८ . ___यह भी मालूम नहीं होता, कि ऋग्वेदके समयमें जैसी हैं, इससे वस्त्र कम कीमत का ही पहनाया जाता है । वैदिक तैसी कन्याकै पाणिग्रहणको प्रथा प्रचलित थी। पयोंकि | युगमे मैला, फटा और विपयुक्त पत्र देना पड़ता था , कन्याके खोजनेके समय घरके मित्र उपयुक्ता पातीको ब्रहा नामक ऋत्विक यह ले जाते थे। । खोज में याहर निकलते थे और तो पया-देवताओंसे थे | यह पस्न दूपित, अग्राह्य मालिन्य युक्त और विषयुक्त । 'यह मार्थना करते थे:-"जाम्पत्यं सुखमस्तु देवाः।" है। इसका व्यवहार ठोक नहो', जो ब्रह्मा नामक ऋत्विम् । हे देवगण! जायापति सुमिथुन हो। ऋग्वेदके विद्वान हैं, वही वधूक यस्रर्फ पाने अधिकारी हैं। इसके समयमें कन्या निर्वाचनका कार्य सरल नहीं था। इसका पादकी शकसे मालूम होता है कि यह छोडा घस . प्रमाण इसी ऋक्से ही मिलता है । वरके अनुरूप कन्या- तीन टुकड़ा कर विवादार्थ प्रस्तुता कन्याको पहनने के लिये का निर्वाचन करने के लिये किस किस विषय पर दृष्टि दिया जाता था। एक टुकड़ा रंग दिया जाता था, एक . रखनी पडतो थी, इसका आभास हमें ऋग्वेदमें दिखाई ट्रकडा शिर पर डालनेके लिये तथा एक पहननेके लिये नहीं देता। मामवेदके मन्तवाह्मण में भी यह दिखाई नहीं दिया जाता था। इससे मालूम होता है, कि समाजको दिया । किन्तु पिछले समयमें सुपात्रीलक्षपाध्यञ्जक | 'बहुत प्राचीन दरिद्र अवस्था जब कन्याहरण कर अनेक तरह के उपदेशवाक्य और चिद धर्मशास्त्रमें, | विवाह करनेकी प्रथा थी, उस समय यियाह के समय ज्योतिष और सामुद्रिक शास्त्र में अङ्कित हुए हैं। इसके | कन्याके पहने हुए मलिन पत्रको खोलवा कर दूसरा नया बाद उन्ही विषयोंका उल्लेख किया जायेगा। । घस्त्र पहननेको दिया जाता था। आगे चल कर यह परके घर कन्याका विवाद । प्रथा लुप्त हो गई। किंतु मैला वस्त्र उतरवाने और नपा कहो कही' वरके घर कन्याका विवाह होता दिखाई। यन पहनानेकी एफ रिवाज चल निकली। इस तरह देता है। किन्तु ऋग्वेदसंहिताम हमने कोई भी निदर्शन जिस कन्याका' वियाह होगा, उसका पहलेका मेला घर . नहीं देखा। मनुके कहे हुए शिस और पैशाचा विवाह उतरवा और नया वस्त्र पहना दिया जाने लगा। प्राचीन परफे घरमें ही होता था। किन्तु ग्रास, देव आदि विवाह वैदिक सामाज सुसंस्कृत था सही ; कितुं विवाहको रस, कन्याफे घर हुमा करता था। ऋग्वेदसंहितामें भी इसी कुप्राचीन पद्धतिको वह छोड़ नहीं सका था। और तो तरहके कन्याके घरमें विवाह काय्र्य सम्पन्न होनेको प्रथा दिखाई देती है। प्या, हजारों घर्ष यीतने पर विविध प्रकारसे यह प्रथा ___ कन्याका छोड़ा हुभा पुराना कपड़ा। : आज भी कही कही विद्यमान है। (ज.तिकर्म) इस समय देशमें घर कन्याके छोड़े हुए वस्त्र नाई ही 'वैदिककालमें विवाहके पहले और भी एफ मदत पाते हैं। विवाह के समय नाईको उपस्थिति प्रयोजनीय प्रथा थी। सामवेदीय मनब्राह्मण में इस प्रथा मन्त्र । है। ऋग्वेदके समय नाई थे किन्तु उस समय इनको देखे जाते हैं। वादके समय में यह 'जातिकर्म' के नाम उपस्थितिको कोई जरूरत नहीं होती थी। कन्याका | से अभिहित हुआ। सामवेदको धर्शमान विवाहपद्धति... छोड़ा हुआ धन नाई पाता था, परं ब्रह्मा नामक विद्वान् | में इसका विधान इस तरह लिखा है-विवाह-दिन स्विक् हो यह वस्त्र पाते थे। कन्या पिताकी शाति या सुहृद रमणियां मूग, यध, उड़द ' पाठकों को यह ख्याल न करना चाहिये, कि यह वल और मसूरका चूर्ण एकत्र कर निम्नलिखित मन्त्रका पाठ प्राप्ति ब्रह्माके प्रति लाभजनक होतो थी। पधू जो करते हुए कन्याके शरीरमें लगा देती थी। मन्त्र इस . 'वन छोड़ती थो, वह वस्त्र दूषित, मलिन, विषयुक्त और | तरह है- ' . . अमाह्य होता था। सम्भवतः विवाह के पहले इस तरह ____ "प्रजापतिपिः प्रस्तावपक्तिच्छन्दः कामा देवता । का वस्त्र पहनना नो-आचारके अन्तर्भुत था.। अध्यय. ज्ञातिकर्मणि कन्यायाः शरीराधने यिनियोगः। ओम हार्य वस्त्र पहननेकी प्रथा अब भी दिखाई देती है, किंतु कामदेवते नाममदनामासि समानयामुसुरा तेऽभवत् इस समय जो वस्त्र पहनाया जाता है, यह नाई ले जाते | 'परमत्रजन्मान तपसा निर्मितोऽसि स्वाहा ।". ..