पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६५७

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विवाह .' चुके हैं। यह प्रथा इस समय तोड़ दी गई है। कितु। कनादानके पूर्व घरको पूजा करनेका विधान है। मधु- सुवैदिक समाज उम यहुत प्राचीन प्रधाो छोड़ नहीं। पर्फके वाद हो ऋग्वेद विवाहपद्धतिमें कनादान करने सका है। कोई भी प्रथा जब किसी भी समाजमें जड का नियम दिवाई देता है। किंतु ऋग्वेद विवाहपति- • पकड़ लेती है, तब उसका उग्वाह फेकना कठिन हो का पफ विशेष नियम यह है, कि कनादान के पूर्वक्षणों जाता है। विधादकी कई प्रागन प्रयाओंकी भालो । हवनका अनुष्ठान किया जाता है। इस सङ्कल्प यह चना करने पर यह स्पष्ट हो विदित होता है। कन्या-दान। ____ "धर्म प्रजा सम्पत्त्यय पाणिरहणं करिष्ये ।।" हिंदू विवाहपद्धतिका प्रधान काम कनादान है। ___ यह कह कर यर सहला कर हवनके लिये अग्नि- शास्त्र में कनादान की भूरिभूतिप्रशंसा की गई है। | स्थापन करता है। पांछे वर कनाका हाथ बांध कर - शास्त्रीप घोंसे फनप्रदानका प्रभूत महत्त्व दिखाई | पाक्त विधिसे कनादान किया जाता है। देता है। इन सब पचनों में प्र.म-विवाहकी प्रधानता यजुबंदको विवाह पद्धतिमें कुश द्वारा हाथ बांधने. दिखाई गई है। घरको बुला कर यथारीति उसकी पूना | का नियम नहीं। किन्तु दानके पूरक्षणहोमाग्नि. कर कनप्रदान करना ब्राह्मविवाहका लक्षण है। विवाह संस्थापनका विधान है। धैदिक मन्त्रमें कन्याको वस्त्र पद्धति, इस लक्षणके अनुसार ही कनादानका विधान | . पहनाने का नियम है। इसके पाद घर-कन्यामें जय लिखा है। फनप्रादानका पहला अन गर्शन है। परस्थर मुत्र देखा देखी होतो है, उस समय एक श्लोक कनवादान' करनेवाले पाद्यपत्रादि द्वारा यरकी पूजा पढ़ना पड़ता है। यह यह है- .किया करते हैं। इस समय पतिपुनवतो नारो घरक 'ॐ समजन्तु विश्वे देवा समायो हृदयानि नौ। दाहने हाथफे ऊपर कनाका दाहना हाथ रख कर सम्पातरिश्वा सन्धाता समुद्र िदधातु नौ ॥" मङ्गलाचार के साथ दोनों के हाथ कुशसे बांध देती थी। (१० ग० ८५ सू०४७) इस समय मो हाथ बांधने की प्रथा है सही, किंतु इस इसका अर्थ यह है, कि सब देवता हम दोनों- देशमें पतिपुलयतो नारो द्वारा यह कार्य नहीं होता। के हृदयको मिला दें, वायु धाता वादेशी हम दोनोंको पुरे हितही दोनों हाथों को बांध देते हैं। यह कार्य एक | मिला है। इसके बाद हो घर कन्याका. गांठवन्धन मुन्दर मन पढ़ कर किया जाता है- . . . होता है। तदनन्तर वर और कन्याकी ओरसे गोनो. ."ओं ब्रह्मा विष्णुभ्च द्रश्च चन्दाकविश्विनायुभी। चार होने लगता है। कारस्तुति पढ़ने के बाद कोई . ते भवामन्यनिलयं दधता शाश्वतो. समा" ग्राहण करके हाथ पर कायाका हाथ धर कर गायत्रोका सामवेदान्तर्गत कुथूमी शाखाके मतभुक्त ब्राह्मणों पाठ करता है । इसके बाद कुगसे दोनोंका हाथ बांध के विधाइम हो यह पचन पठनीय है।. .. दिया जाता है। पोछे दक्षिणाका पाक्योश्चारण इसके बाद दोनों ओरसे गोनाचार होता है। इस होता है। यह कार्य हो जाने पर वर-कन्याका धंधा फै पाद परके प्रगितामद, पितामह, पिता और उसका | हाथ खोल दिया जाता है। हाथ पर हाथ रख कन्या. माम और दुमरी मोर कनााके प्रपितामह, पितामह, पिता दानकी जो पद्धति है, यह बहुत ही उत्तम है। इसोको और कनयाका नाम ले कर यह कार्य किया जाता है। बांह धरना या 'पाणिग्रहण' कहते हैं। यही विवाद- तीन वार नामों का उल्लेख किया जाता है। पर स्वस्ति । को पहलो विधि है। कह कर फनाको ग्रहण करता है। यही कनवादानको | सामवेदो और ऋग्वेदी विवाहपद्धतिमे हम्तयंधन. के पहले हो रामस्तुति पढ़ी जाता है। इसका मंत्र - कनवादानकी विधि तीनों वेदमें एक तरह की होने | यह है:- . . ! पर भी कार्यपद्धतिमें बहुत अठगार है। भावेदमें भो। ॐक इदं करमा नदात् कामः कामायादात् कामो