पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६८

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वाणिज्य और शिजतका याणिज्य यथेष्टरूपसे चलता है । नेपालके धनपति आदि सौदागरांको वाणिज्य-पाता उक्त स्मृतिको .' इस वाणिज्यका मूलांश बंगालसे ही सम्पन्न होता है। - धोतिका है। 'अंगरेजाधिकृत भारतके कलकत्ता, मगास, धम्बई, जव ढाका, सुवर्णमाम, सप्तप्राम, चट्टगांव आदि स्थान कराची, कोलोम्यो, तिनकमली, गल, रङ्गन, मौलामन् । बङ्गालके व्यावसायिक केन्द्र थे, तब यह यात कौन आफायाध, चटगांव, कोकनाड़ा, नागपत्तन नादि प्रधान स्वीकार न करेगा, कि नाव द्वारा हो मालोको,आमदनी ।। प्रधान नगर पाणिज्यकेन्द्र हैं। इन सब जगहोंसे नदी, और रफ्तनो होतो थो। इतिहास के पढ़नेवालोंसे छिपा.-. रेल या बैलगाड़ी द्वारा पण्यद्रथ्य ला कर समुद्र-तोरके नहीं, कि वैदेशिक उसो समय जहाजा पर चढ़ कर.यहां. बन्दर जहाज पर लादा जाता है। गाये थे। जहां आज कलकत्त का भागोरधोके वक्ष.परं विस्तृत विवरण रेशपय शब्दमें देखेोः।। सैकड़ों वैदेशिक जहाज दिखाई देते हैं, वहां सन् १८०१ ।। - उन्नति और अवनतिका कारण। . . . ०में बहुसंख्यक देशो शिलानिर्मित.वाणिज्यको ना." ऋग्वेदीय युगमे हम आर्यजातिको वाणिज्यनिरत शोमा पाती थी। उस समयकी.इस दृश्यको देख कर उस. देखते हैं। उन्होंने कपड़ा धुनना हथियार बनाना और.) समयके गयरनर जनरल. लाई वेलसलोने ग्लैण्डके खती पारी करने में काफी शिक्षा पाई थी तथा घे लोग अफसरों को पन द्वारा सूचना भेजो थो कि कलकत्त के बन्दर सय द्रव्यादि की खरीद विको जानते भी थे, उक्त प्रन्से में बहुतेरी ऐसी व्यावसायिक सुन्दर नाचें मौजूद हैं, जा" इसका परिचय मिलना है । उसी पूर्वतन भार्यजातिके लण्डन तक जानेमे समर्थ है। .. . समयसे ही भारत, पाणिज्यस्रोत प्रवाहित तथा सो .. सन् १८०७६०मे कम्पना आशानुसार डाकुर युका. . . उद्देश्यसे उनका स्थलपथसे विभिन्न देशों में जाना और जन, उत्तर-भारतकं शिल्प-बणज्यको अवस्था सम्बन्ध उपनिवेश स्थापन हुना था, उसे कौन अस्वीकार करेगा में जांच-पड़ताल लिये पटना, शाहाबाद आदि स्थानी. उपनिवेश भौर,आर्य शब्द देखागा का परिदर्शन करने गपे थे। उन्होंने जो रिपार्ट तयार की, भार्थजाति उपनिवेश स्थापनसे जाना जाता है, कि उससे मालूम हुमा, कि पटने जिले में उस समय धान घे लोग समुद्गपधसे भी गमनागमन करते थे। ऋग्वेदके . रुपका. पौने दो मन मिलता था पहा २४०० यांचे . "शतारिख नाघ". शब्दमें शतपनयुक्ता समुद्रगामिनो | जमीनमें कपास तथा १८०० वाघे भूमि ऊख बोई गई. ' नौकाका उल्लेख देखा जाता है। महाभारतके जतगृह- या। " ३३०४२६ नियाँ. सून कात कर अपनी जोधिको पर्याध्यायमें यम्लयुक्ता नावोंकी वर्णना मिलता है। नदो । निर्वाह करती थी। दिन में 2 घण्टे काम करने पर भो । पाल्प यह राज्य में भी उस समय नौ निर्माणको परि- इससे.पप में १०८१००५) सश्या लाम होता.था। अंग्रेज पाटोका सभायन-धा। महावंश प्रथम पन्यासियोंके वणिकोफ निग्रहसे सूक्ष्म या बारीकसून रसना कम होने के सिलषिजयको कथा है..। रघुवंशमें रघु द्वारा नौवल साथ साथ उनके कारोवारकी अवनति और उनका जीयन . गसि भूपालयों को पराजयकथा विपत है। मुसल- कष्टकर होने लगा। उस समय वहाक बन चुननघाले . भागो सा उस गौ-निर्माणपियाको-अवनति नहीं.] जुलाहे-या. तांती साल मरका पर्च"छोड़ कर डाला मनर Raविस्यका इतिहास. पढ़तेसे उसका ... । फतुहा, गया, नवादों आदि स्थान : परियम मासूम हो जाता है। ......... प्रसिद्ध थे। शाहाबाद जिले में- ऐसा समना गलत है, किकारको ना फेवल य २॥ लाख रुपैयेका सूत काततो.: . लियो का भी। जो तांत या कर्ये चलते थे। इन - ( जोतने . . तय्यार होता. . MARAT: सयार हो -नमक और आथे। घ५