पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६८३

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विशायक-विशालदेश ५६५ . ३३३९) प्रहरीगणको पर्यायक्रमसे शयन, पहरेदारोंका विशालदा (सं० स्त्रो०) लनामेद (Alhagi Maurarum)। पारी बारोसे सोना । : । विशालदेश-विशालराज प्रतिष्ठित एक प्रायोन जनपद । विशायक ( स० पु०) लतामेद । विशाकर देखो। 1 भविष्य-ब्रह्मखण्ड में इसका विवरण इस तरह देख पडता विशायिन् (स० वि०) विशी-णिनि । . १ शयनकारी, | है- "सोनेवाला । २ जो नहीं सोता है या जाग कर पहरा देता ."गङ्गा मोर गण्डकी नदीकं वोचक भूभाग पर है। ...' विशालराजका शासनाधिकार था। इस देशके वायु विशारण ( स० क्ली० ) थि-श-णिच् न्युट्ः। मारण, कोणमें बेतिया (वेलिय), पूर्व और मधुपुर, दक्षिणमें भागो- " मारना। . :. . . . .रधी और उत्तरमें शेलम या सलामपुरया। इस प्रदेशका विशारद ( स० त्रि.) विशाल-दाक; रलयोरभेदः इति सीमाविस्तार २० योजन था । विशालदेशके आधि- । लस्य । १. विद्वान् । ( मनु ४६३) २ प्रसिद्ध, मश पासी अधिकांश ही धार्मिक थे। इस देश में और भी हर । ३ प्रगल्भ ! ४ श्रेष्ठ, उत्तम: ५ दक्ष, निपुण ६ अपनी तोन छोटे छोटे देश शामिल थे। उनमें एकका नाम क्षमता पर विश्वासवान, जिसे अपनी शक्ति पर भरोसा | चम्पारण, दूसरेका शालीमय, तीसरेका दो द्वार था। हो। विस्तृत ।।८ गर्वित, घमंडी। (०) . यह शेपोक्त देश अपेक्षाकृत छोटा होने पर भो विशाल- • वकुल, मौलसिरी1 . . . . . देशको समूची घटनाये सोफे नाम पर विगृत हैं। विशारदा (सं० स्त्री०) १क्षद्र दुरालभा, घमासा ।२। यहां एक प्रसिद्ध स्थान है, जिसका नाम फसमर है। क्रौञ्च, वाता"... ।। . . , . .. दोर्णद्वारदेशका संक्षिप्त विवरण-दीर्घद्वारके सभी यिशारदिमन् (सं० पु०) वैशारध, नैपुण्य, निपुणता। अधिवासो धर्मिष्ठ, परदारासे सदा विमुख रहनेवाले विशाल (सं० सि० विशालच । (वे शालचकटचौ ।। और कृषिका-में तत्पर रहते थे। यहां प्राह्मण पा १।२।२८ ) या विश प्रवेशने कालन् (समिविशिविहीति ।। शास्त्रनिष्ठ और धार्मिक होते थे । अधिवासियोंक ' उण १।११७) १ वृक्षत्, बड़ा। विगतः शाला स्तम्भो यस्य। हृदयमें धर्मकर्मका प्रबल अनुराग भरा रहता था। २ स्तम्भरहित । ३ विस्तृत, चौड़ा।' विण्यात, मशहर। इनमें परस्पर झगड़ा विवाद नहीं होता था। यहांके लोग ५ विस्तीर्ण, फैला हुआ। ६ जो देखने में सुन्दर और काले और गण्डमाला तथा गलगएड रोग रोगी थे। पे भव्य हो । ( पु० ७ मृगभेद । ८ पक्षिभेद । । वृक्षमेद । गण्डकी नदी में स्नान करते थे सही, फिर मी कालिक .१० एक पुराण-प्रसिद्ध रामा, श्वाकुके पुत्र ।' इन्होंने प्रमावसे इनका रोग शोक मनियार्य था । शस्पके भीतर दो विशाला नगरी स्थापित को यो। :(रामायण). यहां प्रचुर परिमाणसे धान पैदा होता। यहां तोन ११ पड़हमेद । (कात्यायनौतसू० २४१२।१६) १२ तृण.! जातियोंका नाम था-कायस्थ, ग्राह्मण और कुरमो। विन्दुका पुत्रभेद । (विपुराण ) विशालदेश देखो। . कलिके प्रारम्भमें दीर्घद्वारमें लगातार चार राजाओं के १३ वैदिश वा विदिशा नगरोके एक राजाका नाम । राजत्वकालका उल्लेख ६।। (मार्कपडेयपु० ७०।४) १४ पर्वतमेद । (मार्कपडे पपु० ५६।१२)/ दीर्घद्वारफे भईयोजन पर महादेयों सम्यिकाका अधि- पिशालक ( सं०. पु०) १ कपित्य, कैयः। २ गढ़। ठान था. राजा विशाल इन देवी प्रतिष्ठाता थे। दोर्ज

।.३ यक्षभेद ।:: . .. : :. . . . . . द्वारफे अधिवासी इनकी पूजाम तत्पर रहते थे।

विशालग्राम (सं० पु०) पुराणोक्त प्राममेद। (मार्क००)! : विशालटेश द्विजातीय पेइ-चर्चा में लगे रहते थे। बिगालता (सं० लो.) विशाल तल टाप । १. विस्तार ।। धोनमें, ध्यान में, धनमें शौ-म, सम्मान में ये विशाल २ यूहस्य, प्रकाएहता!, ३ पाचविस्तार | .::., : : मामके योग्य .थे। दोर्मद्वारफे अधियातो कलिक विशालतेलगर्भ (सं० १००) अहोठयक्ष... ....- प्रारम्भमें बञ्चक, धनहीन, स्त्रेण और माता, पिता, शाति, 'विशालत्यक (०.०) सप्तपर्णह, इतियन । ... माई-और सुहत्। संजन, यादिका धन हरण कर आम