पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६८५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विशालदेश ५६७ -दैत्योंका समावेश हुमा। भूताधेशके कारण जय प्राम- ! विशाल, होनयघू और धूम्रकेतु नामके तीन पुत्र थे। इन वासो प्राम छोड़ कर भाग गये, तब वहां के पुष्पोद्यान | तीनों में विशाल हो ज्येष्ठ थे। विशाल ही चीनके आचार • जनसमागमहीन हो कर श्रीम्रए हो गये। मादि सीखनेके लिये उत्तरदेशको गई। गण्डको । और एक ग्राम पानकपुर है । इस प्रामक अधिवासो नदी के किनारे उन्होंने एक मास तक घोर तप कर अपने • अधिकांश ही याचार अर्थात् बजनियां थे। मलिग नाम पर एक ग्राम साया था। उनके रहने के कारण पलमें, मलिनरूपसे, ही रहना उनका चिर अभ्यास था। यह स्थान वैशाल नामसे प्रसिद्ध हुआ थ। राजा शालिवाहन शाकके प्रारम्भमें इस मामका ध्वंस हुगा। विशालके पुन हेमशशी, हेमशशीके धूम्राक्ष और विशालदेशका अन्यतम प्रधान प्राम देव या देवप्राम है। धूम्राशके पुत्र संयम थे। यमादि. अष्टाङ्ग योगकी सिद्धि , पहले यहां हर नरहके वृक्ष थे। यह स्थान गमोर अरण्य प्राप्त होने के कारण इनका नाम संयम पड़ा था । संयमके मय था। इससे कोई सहज हो इसमें प्रवेश नहीं कर पुत्रका माम महायोर कृशाश्य था । इन्हीं कृशाश्वकै मौरस. । सकता था । विशालराज वंशधरने यहाँके वन से और चारशीलाके गर्भ से राजा सोमदत्तका जन्म वृको काट कर साफ करा दिया। इसके बाद यहां हुआ। • सोमदत्तने अश्वमेध यज्ञ किया । इनके पुत्रका उनके द्वारा गम्यिकाजोका मन्दिर प्रतिष्ठित हुभा। नाम सुमति भीर सुमति पुनका नाम जनमेजय था। उन्होंने अमियाजोके पूजोपचारको गच्छो व्यवस्था करा । धैगाम नगरके घायुकोणकी तरफ प्रायः पांच कोस पर दो। राजाको आज्ञा पा कर यहां गनेक माली आ कर यहयष्टि प्राम है। यहां महाराज जनमेजयने सर्पपछ घस गये । मयिकाके प्रकोपसे पह ग्राम नागसे नष्ट हुआ ! किया था। १०८ हाथफे पापाण-निर्मित नाना चित्र- इसके बाद सुवर्णग्राम, गोविन्दचक्र, वामनग्राम, मय यज्ञकुण्ड विद्यमान है। येििधके अनुसार मन्त्र- कामरको उत्तर गोवद्धन और मकेर प्राम थे। मकर प्राम यिदु ग्राह्मणांने यहां यशष्टिको स्थापना की। इसीसे चंद्रसेन राजा द्वारा न हुआ। इसके बाद शक्तिसिंह इसका यह यशयष्टि नाम हुआ । इस प्राममें पशवेदिकार्य द्वारा प्रतिष्ठित पिल्वहार, विशाल राजाका कोलिस्थान वन | निकट.राजा जनमेजयने याक्षिक ब्राह्मणोंको शतप्रासाद- कोलि नामक बड़ा प्राम, भोज राजाके समयमें प्रतिष्ठित युक स्थान दान किया। कभी कभी इन मकानांस पारशाप्राम ( यहां अकस्मात् पफ कोसके अन्दाज जल- धनरत्नपूर्ण घड़ा मिलता था। मय गमोर गदा उत्पन्न हुआ) है। और एक प्रसिद्ध विशालपत्तनसे एक पोजग पर दुर्गम घशारदुर्ग है। - स्थान तारानगर है। यहां तारा देवोका मन्दिर और इसमें तथा इसके निकट ५२ मनोरम जलाशय है। इस दलिदानरत शाक्त ग्राह्मणोंका यास है। अवगादो नामक ! दुर्गमें विशालका राजवंश रहता था। उनके द्वारा एक प्राम है। उप्रसेन राजाने यहां, सामयज्ञ किया, और प्रतिष्ठित: विष्णुमर्ति वर्तमान है। (म०माख. ४००) , इसके उपलक्ष्यमें यहां कान्यकुमसे भाये, चतुर्वेदी ___यशाली देखो। ब्राह्मणोंका मायास हुमा । गौर एक ग्राम बसन्तपुर है। पूर्वोक्त वियरणसे यह स्पष्ट जाना जाता है, कि यह - यहां विशाल-राजपुरोहितोंका आषास था। होलिका विशाल देश नाज कलके विहार प्रदेशका कुछ अंश था। नामक एक राससके उत्पातसे इस, प्रामका ध्वंस इस विवरणमे विशाल देशकी जो सीमा निर्धारित की हुभा। इस पसन्तपुरसे पूर्व मोर चार कोस पर विशाल गई है, उससे यह भी पता चलता है, कि आज कल के नगरोका ध्वंसावशेष विद्यमान है। (भविष्य ब्रह्मख०। सारन, चम्पारन और मुनाफरपुर जिलोंकी सीमा अन्त. । ३८.४६ म०). गंत ही यह, विशाल देश था। विशालदेशमे दो द्वार . विशाल का इतिहास । एक प्रदेश गिना जाता था. किन्तु कालक्रमसे आज यहां . . : भविष्य ग्रामएडमें लिखा है-... एक विशाल प्रामक रूपमें परिणत हो गया है। 'दीनं ., सूर्यवंशमें तृणयिन्दु नामके एक राजा थे। उनके द्वार' का : अपभ्रश दोघवारा है। पूर्वोक, ,विवरण Vol XXI. 150