पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६८८

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६००. .. विशिशिम-विशष्टाद्वैतवाद! विशिशिप्र ( स० वि० ) १ विगत हनू, पिना. दाढीका । , आश्रय हैं। सभी जीवात्मा प्रहाके अंश परस्पर भिन्न (पु०) २ दैत्यविशेष ।। (ऋक ॥४५॥६ सायण ) . . हैं तथा ग्रंह्मके दास हैं । जगत् ब्रह्मको शक्तिका विकाश विशिश्न्य (स.नि.) शिश्नरहित, जिसके अंकोप न चा परिणाम है, अतएव वह सत्य है। 'सत्यादि.. गुणविशिष्ट ब्रह्म सत्यत्वादि गुणविशिष्ट जगत् तथा' विशिश्रमिषु (स.नि.) १ विश्राम करनेमें इच्छुक, किञ्चिज प्रत्यः' और 'धर्माधमांदिगुणविशिए। जोवामा : माराम तलवी! (ली० ).२किसी पदार्थ के अपर अभिन्न है अर्थात् जीवात्मा और जगत् ब्रह्मसे भिन्न हो विशेष लक्ष्य रखना। कर भी भिन्न नहीं है। जीव भी ब्रह्मको तरह अभिग्न विशिष्ट (स० लि. ) विशिष-क्त, या शासक । १ युक्ता, नहीं हैं, परन्तु 'आदित्यके प्रभावको : तरह जीव ग्रहासे मिला हुआ । २ विलक्षण, अद्भुत। ३ मिन्न । ४ विशे भिन्न नहीं है, किन्तु ब्रह्म जीवसे अधिक है। जिस पतायुक्त, जिसमें किसी प्रकारको विशेषता हो । ५ अति प्रकार प्रमासे आदित्य गधिक है, उसी प्रकार' जोयसे शिष्ट, जो बहुत अधिक शिष्ट हो। ६ विस्पात, मशगर । ईश्वर अधिक है। ईश्वर सर्वशक्तिमान, समस्त कल्याण. ७ यशस्खो, कीर्तिशालो। ८सिद्ध । (पु.) सीसा गुणके मार, धर्माधर्मादिशून्य हैं । जीप । उसका विप- नामक धातु। १० विष्णु। रोत है। . . . विशिष्टचारित ( स० पु० ) योधिसत्यभेद। .: भेदाभेदवाद, द्वैताद्वैतवाद तथा' अनेकान्तवाद विशिष्टचारी ( स० पु.) घोधिसत्त्वभेद। विशिया'तवादका नामांतर मात्र है। इस मतका विशिष्टता ( स० स्त्रो०) १ विशिष्टका भाव या धर्म। स्थूल तात्पर्से यह कि, ग्रह एक भी और अनेक भी हैं। २विशेषता। वृक्ष जिस प्रकार गनेक शाखायुक्त होता है, ब्रह्म भी . विशिष्टपत्र (सपु०)प्रन्धिपणों, गठियन । उसी प्रकार अनेक शक्तिके कारण विविध कार्य सृष्टियुक्त विशिष्टवयस. ( स० वि०) पूर्णवयस्क, मरो जवानी ! हैं। अतएव ब्रह्मका पकत्व और नानात्व दोनों ही (दिव्या २३६४) सत्य हैं। वृक्ष जिस प्रकार यक्षरूपमें एक है, शाखा विशिष्टाद्वैतवाद (सं० पु०) विशिष्टरूप मढे तयाद। रूपमें अनेक है, समुद्र जिस प्रकार समुद्ररूपमें एक द्वैतवाद, भतवाद गौर विशिष्टाद्वैतवाद, ये तीनों और फेनतरङ्गादिरूपमे अनेक है, मिट्टी जिस प्रकार मिट्टो. हो मत देखने में आते हैं। प्रकृति और पुरुष , भिन्न के रूपमें एक और घट शरावादि रूपमें अनेक है, ब्रह्म होने पर भी दोनों मिलनरूप ब्रह्मवाद, हैं। "पुरुपः । भी उसी प्रकार ब्रह्मस्वरूप एक गौर जगरूपमैं अनेक स्तदतिरिक्ता प्रकृतिः किम्भूभयमिलितं ब्रह्मणकद्विदल हैं। जोवग्रामसे ' अत्यन्त भिन्न होने पर भी ग्रंशमात्र वत्, इत्यं ब्रह्मणः एकत्वं व्यवस्थितम् ।" (माधवभाष्य) नहीं हो सकता। किन्तु उपनिषदों में जीवको ब्रह्मभाव - अर्थात् पुरुष और प्रकृति मिन्न भिन्न है। किंतु दोनो कहा है। फिर जोयके भी ब्रह्म का अत्यन्त प्रभेद होनेसे मिल कर ब्रह्म हैं। जिस प्रकार चने में दो दल अलग लौकिक और शास्त्रीय सभी व्यवहार विलुप्त होते हैं । हैं और दोनों के मिलनेसे चना कहलाता है उसी प्रकार पयोंकि, समो व्यवहार 'भेदेसापेक्ष हैं। लौकिक प्रत्य. प्रकृति भोर पुरुष परस्पर भिन्न हैं, पर दोनों मिल कर क्षादि घ्यवहार, धाता, शेय और शानसाधानसे भिन्न नहीं हो सकने । धर्मानुष्ठानरूप 'शास्त्रीय 'वायहार - पैदान्तिक आचार्यों के साधारणतः अद्वैतवादी होने , और स्वर्गादि फल, फर्म, कर्ता, कर्मसाधन तथा कर्ममें , पर भी उनके मध्य प्रकारान्तरमें द्वैतवादका नितान्त अर्जनीय देवता ये सब भदेको अपेक्षा करते हैं। भेद.. असद्भाव नहीं देखा जाता वैष्णय आचार्य प्रायः । युद्धि भिन्न ये सच यावहार नहीं हो सकते। फिर समो विशिष्टाद्वैतवादी हैं। उनका मत-यह है, कि इन सब वावहारीका अपलाप भी नहीं किया जा ब्रह्म सर्वच सर्वशक्तियुक्त तथा निखिल फल्याणगुणके। समता। अतएपंजीव, जगत् और ब्रह्मान अत्यन्त