पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६९१

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विशिष्टाद्वैतवाद ६०३ तथा देशभ्रमणादि कर्शय हो सकता है। बलिक साधन. 1 प्रकार परिणामवोधक घायका भी अर्धाविशेषौ तात्पर्य सम्पत्ति इसको विरोधिनी होती है। ब्रह्म यदि मृदादिः कहना होगा। की तरह साययय होते, तो उनका एकदेश कार्याकारमें ब्रह्म पक अशर्म परिणत तथा दूसरे मशमें परिणत और एकदेश यथायदयस्थिन होता, ऐसो कल्पना की है, यह कल्पना भी समोचीन नहीं है। अभी प्रश्न हो जा सकती धो। ऐसा होनेसे द्रश्यत्वादिका उपदेश सकता है, कि कार्याकारमें परिणत ब्रह्मांग ब्रह्मसे भिन्न मार्थक होता। क्योंकि, कार्याकारमें परिणत ब्रह्मदेशके | है या अभिग्न १- यदि मिन्न है, तो ब्रह्मको कार्याकारमें अयत्नदृष्ट होने पर भी अपरिणत ग्रलांश अयत्नदृष्ट परिणत नहीं हुई। क्योंकि, कार्याकारमें परिणत ब्रह्मांश महो। किन्तु ग्रलका अययय स्वीकार नहीं किया ब्रह्म नहीं, प्रासे भिन्न है। दूसरेके परिणाम, दूसरे जाता, क्योंकि ब्रह्म निरषयव हैं, यह श्रुतिसिद्ध है। का परिणाम नहीं कहा जा सकता। मृत्तिकाके परि. ब्रह्मका अवयव स्वीकार करनेसे उस श्रुतिका विरोध । णाममें सुवर्णका परिणाम नहीं होता। फिर कार्या• उपस्थित होता है। कारमें परिणति ब्रह्मांश यदि ब्रमले मिन्न न हो अर्थात् इसके उर रमें शेयाचार्यों ने कहा है, कि ब्रह्म शास्त्र क- अमिन्न हो, तो मूलोच्छेउकी आपत्ति उपस्थित होती है। समधिगम्य है, प्रमाणान्तरगम्य नहीं। शासमें कहा । परिणत अश ब्रह्मरे अभिन्न होने पर परिणत अश है, कि ध्रमका कार्याकार में परिणाम और निरवयवत्य है तथा ब्रह्म एक वस्तु होता है । अतएव सम्पूर्ण ब्रह्मका तथा विना कार्य के प्राका अवस्थान है, मतपत्र उक्त परिणाम अस्वीकार नहीं किया जा माता । यदि कहा आपत्ति हो ही नहीं सकती। जाय, कि परिणत ब्रह्मांश प्रामने भिन्नाभिन्न है यह विशिष्टाद्वनवादियों का मत मोमें कहा गया, | अर्थात् प्रामे भिग्न भी है और भिग्न भो । परिणत किन्तु भगवान् शङ्कराचार्य इस विशिष्टाहतवादको ब्रह्मांश कारणरूपमें ब्रह्म आमन्न है तथा कार्यरूपमें म्योकार नही करते । घे निशेिषाद तयादी हैं। उन्होंने ग्रास मिग्न है। दूमरे दृष्टान्त में वहा जा सका है, कई तरहसे नाना प्रकारको श्रति अदि माणों द्वारा कि कटामुन्टादि सुवर्णरूपमें अभिन्न और नर मुकु. इस मतका खण्डन कर अपना मत सस्थापन किया है। सादिरूपमें भिन्न है। इस सम्बन्ध भो पहले ही लिखा बहुन म'क्षेपमें उनका मत नीचे लिखा जाता है। जा चुका है। ये कहने हैं, कि परिणामयाद किसी भी मत सङ्गत मेद और अमेद परस्पर विरुद्ध पदार्थ है। यह नहीं हो सकता। पोंकि, कार्याकारमें परिणाम तथा| एक समय एक यस्तुपे नहीं रह माना। कार्या कारने अपरिणत ब्रह्मका अबस्थान ये दानों परस्पर विरुद्ध हैं। परिणत मश होता है. ब्रह्मने भिन्न होगा या न तो एक समय एक यस्तुका परिणाम और भपरिणाम हो अभिग्न होगा। भिग्न भी होगा और अभिग्न भी होगा, नहीं सकता। उमी प्रकार सावयवत्व और निरयः। ऐसा हो नहीं सकता। फिर यह भी विवाग्नेकी य.त है, यस्य परस्पर विरुद्ध है। एक पक्ष एक समय साययय कि ब्रह्म स्वभावतः अमृत है, वे परिणामझामसे मत्यांना गौर निग्यश्य होगा, यह दिलकुल असम्भव है। अस. को प्राप्त होंगे, यह हो नहीं सकता। फिर मरी तोय म्मय और विरुद्धका अर्थ श्रति भी प्रतिपादन न कर, अमृत ग्रह होगा, यह भी नहीं हो सकता। अमृत मर्य ‘सके हैं। योग्यता शब्दवोधको गम्यतम कारण है।। नहीं होता और न मर्य ही अमृत होता है। किसी भी अतएव शब्द मयोग्य अर्थ प्रतिपादन करने में सक्षम है। मतसे स्वभावको अन्यथा नहीं हो सकती। जो कहते हैं, "प्रायाणः लपते पनस्पतयः सलमासत" पत्थर जलमें | किशास्त्रानुसार कर्म और शान इन दोनों के अनुष्ठान द्वारा तैरता है. वृक्षों ने यह लिया था, इस्पादि अप्तम्भावित माजोरका अमृतत्व होगा, उनका मो मत असङ्गत है। . अकि वोधक मर्थवाद यायका पिस प्रकार यथाश्रत पयोंकि, स्वभावतः अमृत ग्रहको भी यदि . मत्यता हो, अर्भासे तात्पर्य नहीं है, दूसरे अर्थसे है, उसी । तो मर्त्यजीयका कर्मशान समुच्चपसाप अमृतमाय होगा