पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६९२

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विशिष्टाद्वैतवाद

अर्थात् मोक्षावस्था स्थायी होगी, यह दुराशामान है। - मेद नहीं हो सकता। क्योंकि,श या अवयव द्वाराही भगवान् शङ्कराचार्यने इत्यादिरूपसे तबाद तथा| स्थगतभेद हुआ करता है । सद्वस्तुके अवयय नहीं है, विशिष्टाद्वैतवाद भादिको निराकरण करके ब्रह्मवियर्सवाद- क्यों कि जो सावयव है, उसकी उत्पत्ति अवश्य होगी। स्थापन किया है। उनके मतसे ब्रहा शुद्ध या निर्विशेष | सभी अवयवों के परस्पर संयोग या सग्निवेशके पहले ' है, पाञ्च सत्य नहीं है, रज्जुसादिकी तरह मिथ्या है। सावयव घस्तुको उत्पत्ति होती है, यह कहना पड़ेगा। . अतएव ब्रह्ममें कोई विशंप वा धर्म नहीं है। निर्विशेष भतएव साययय बस्तुकी उत्पत्ति है। जिसको उत्पत्ति ब्रह्म अद्वितीय है। प्रपञ्च जब मिथ्या ब्रह्मको अतिरिक्त है यह जगत्का आदिकारण नहीं हो सकता। क्योंकि . वस्तु है, इसलिये सत्य नहीं है, तब ब्रह्म मंद्वितीय है, उसकी उत्पत्ति कारणान्तरसापेक्ष है। अब यह सिद्ध इसमें जरा भी सदेह नहीं। जीव ब्रह्म-भिन्न नहीं है। हुमा कि मादिकारण या सवस्तुके अवयव नहीं है। कहा गया है कि- । जिसके अघयच नहीं, उसका स्वगतभेद असम्भव है। __ "रोकाद्धन प्रवक्ष्यामि यदुफ' अन्यकोटिभिः । ____ नाम और रूप भी सदस्तुफे अवययरुपमै कतिपत । नझसत्य' जगन्मिथ्या जीवो ब्राप फेवनम् ॥" नहीं हो सकता। नाम या घटशरायादि सपा, कए था. कोरिमन्धमें जो लिखा है, कि मैं श्लोकाद्धं द्वारा उसे | घरशरावादिका माकर, नाम और रूपके उद्भयका नाम कहूंगा । यह इस प्रकार है, ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या सृष्टि है। सृष्टिक पहले नाम और रूपका उद्भव नहीं . है, जोव ब्रह्म ही है। यह शुद्धाद्वैतवाद या निशेिषा. होता। अतएव नाम और रूपको अशरूपमें कल्पना करके द्वैतवाद भगवान् शङ्कराचार्गका अभिमत है। उससे सवस्तुका स्वगतभेद समर्थन नहीं किया जा श्रुतिमें लिखा है. कि "सदैव सौम्पेदमा आँसोदेक. सकता। मेवाद्वितीयम् ।" (भति) यह जगत् सएिफ पहले सम्मान सवस्तुका सजातीयभेद भी असम्भव है। क्योंकि . था, नाम रूप कुछ भी न था, समस्त एकमात तथा सदस्तुको सजातोय यस्तु सत्स्वरूप होगी। सत्पदार्थ अद्वितोय था। एक, एघ, अद्वितीयं इन तीन पदों द्वारा | एकमात्र है, कारण सत्, सत् . इस प्रकार एक आकारमें सदस्तुमै तीनों भेद निवारित हुए हैं । गनात्मा वा जगत् प्रतीयमान यस्तु एक हो होगा, नाना नहीं हो सकती। में तान प्रकारके भेद देखने में आते है, स्वगतभेद, सजा दो सत्पदार्थ माननेसे उनका परस्पर वैलक्षण्य मानना तोयमेद और विजातीयभेद । भवयपके साथ प्रययपोका होता है। सत्पदार्थके स्वाभाविक लक्षण्य नहीं है। भेद पगतभेद है , पन, पुष्प और फलादि साप पक्षका अतएव अन्य सत्पदा की कलानाका कोई प्रमाण नहीं जो भेद है उसे भी स्वगतभेद कहते हैं। यहां यह माना है। सत्पदाक एकमाल होनेसे, अतएव दुमरे सत्- पदाक नहीं रहनेसे सत्पदाका संजातीय भेद रहना गया, कि पुष्प गौर फलादि भी पक्षका अयपविशेष है।। विलकुल असम्भव है।

एक वृक्षका दूसरे वृक्षसे :भेद अवश्य है। इस भेदका __स्वगतभेद तथा सजातीयभेदको तरह सत्पंथार्शका नाम सजातीयमेद। क्योंकि, उस. भेदके प्रतियोगी विजातीयभेद भी नहीं कहा जा सकताषयोंकि जो सत् और अनुयोगी। दोनों ही चुक्ष जातिके हैं। शिलादि- का विजातीय है, वह सत् नहीं सत् है, जो' असत् से.पृक्षका भेद विजातीयभेद है। है, उसका अस्तित्व नहीं है, यह भेदका प्रतियोगी • अनात्म (घस्तुकी तरह आत्मवस्तुमें भी इन तीनों नहीं हो सकता। जो विद्यमान है," यह दूमरी भेदोंकी आशङ्का हो सकती है । इस माशङ्काको दूर करने वस्तुसे भिन्न है तथा' दूसरो यस्तु उससे भिन्न नहीं , के लिये एकमेवाद्वितीयं कहा गया है। -'एक' इस पद हो सकती। जिसका अस्तित्व है, वह कुछ भी नहीं। द्वारा स्वागतभेद, 'एव' पद द्वारा सजातोयभेद तथा 'अद्वि है। उस भेदका प्रतियोगी या अनुयोगी कुछ भी नहीं -तोय' इस पद द्वारा विजातीयभेद निराकृत हुआ है। हो सकता। अतएव सतपदाका विजातीयभेद भजात . जो एक है अर्थात् निरंश या निरवयप है, उसका खगत |:: पुत्र के नामकरणकी तरह अलीक है 1;...: ..