पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६९८

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६१२. विश्लिएसन्धिः- विश्व जो प्रकट हो। ४ शिथिल, थका हुआ । ५ विमुक्त, । (२) अहम् (अहङ्कार);.. इससे द्रव्य, ज्ञान और जो खुला हुआ हो। क्रियाको उत्पत्ति होती है। .. - : विशिलष्टमन्धि (स० स्त्री०) १ अस्थिभङ्गविशेष; शरीर- (३) तन्मात्र (पञ्चतन्मात्र); ये सूक्ष्म पचभूत है, : . के गङ्गों की किसी संधिका चोट आदिके कारण टूटना। इससे हो फिर स्थूलपञ्चभूतोंको (क्षिति, जल, तेजः यायु २ सन्धिमुक .भग्नरोगविशेष। लक्षण-चोट आदिके | और आकाशकी ) सृष्टि होती है। " कारण किसी सन्धिके टूटनेसे.यदि वहां सूजन पड़, जाय, (8) इन्द्रिया, यह छान और कर्मभेदसे दो प्रकारका हमेशा दर्द होता हो तथा सन्धिको क्रिया विशति हो जाये, है। उनमें नेत्र, कर्ण, नासिका, जिहा और त्यफ ये कई तो उसे विश्लिटसन्धि कहते हैं । इसकी चिकित्सा गादि-शानेन्द्रिय हैं और मुख, हाथ, पैर, पायु, उपस्थ. ये कौ.. का विषय भग्न शब्दमें लिखा जा चुका है । भग्न देखो। न्द्रिय हैं। ये इन्द्रियां ही जीवके जीवनोपाय और गतिः विश्लप (सं० पु० ) वि-श्लिप घम् । १ विधुर, अलग | मुक्ति हैं । क्योंकि इनके परिचालन द्वारा विश्व ससारमें होना। २ अपोग। ३ वियोग, विच्छेद । ४ शैथिल्य, जीयका धर्म, अधर्म, पाप, पुण्य, सुख, दुम्न, बन्ध, मुक्ति थकावट। ५ विराग, किसीके ओरसे मन हर जाना 1] प्रभृतिका प्रवर्तन होता है। · अर्थात् शास्त्रोदित सत्य. ६विकाश, प्रकाश। क्रियासे इन्द्रिय- परिचालन, धर्म, पुण्य, सुख, मुक्ति विश्लेपण ( को०) १ घायु जन्य प्रणवेदनाविशेष, आदिफे और शास्त्रविहित कार्यों में इन्द्रियपरिचालन वायुफे प्रकोपसे फाड़े या घावमें होनेवाली एक प्रकार अधर्म, पाप, दुःख और यन्ध प्रभृति के कारण है। को घेदना। २ पृथक्करण, किसी पदार्श संघजिक (५) धैकारिक (इन्द्रियाधिष्ठाता देवगण और मन द्रव्योंका अलग अलग करना। आदि) पदार्थको दृष्टि है। विश्लेपिन् ( स० लि.) विश्लेपोऽस्यास्तीति । विश्लेप (६) तमोगुण (पञ्चपळ अविद्या );' यह बुद्धिफे इनि। विच्छेदवान्, विपेगी। मावरण (प्रतिभानिधर्तक) और पिपजनक (व्याकु- विश्लोक (सं० त्रि० । १ स्तुतिके पोग्य, स्तवनीय। (पु०) लताकारक ) हैं। २छन्दोमेद। तीन तरह के यकृत घे हैं, यथा-:- विश्व (स'. क्ली०) विशति स्यकारणं इति विश :प्रयेशने (१) वनस्पति, ओपधि, लता, स्वकसार; चोरुध और . विश कान (भशूर पिटिफणोति फ्यन् । उण ११५१), द्रम पे छः प्रकारके स्थापर हैं। इनमें जो पुरुष बिनाः । १ जगत् , समार, चराचर । ( मेदिनी:) फल लगता है, वे वनस्पति, फल पकने पर जो मर जाते आघन्तशून्य स्ततम्नयस कालने जगत्फे उपादान है, यह ओषधि, जो मलाविहीन हैं अर्थात् जिसके त्वक: (निमित्त) विश्वरूपी आत्माकी सृष्टि की। अर्थात् में हो सारजन्मता है (जैसे बांस आदि।) ये त्वकसार काल के साथ साथ आत्माका प्रादुर्भाव होता है, क्योंकित हैं। वोरुध प्रायः लताको तरह ही है, किन्तु लताकी - मात्माक सिधा सष्टि, ममम्भव है। इसके : उपरान्त ! अपेक्षा इसमें काठिन्य है। जिसके पुष्पसे फल उत्पन्न अध्यक्तमूनि ईश्याने विष्णुमायोरिनन्माना होता है, उसका नाम द्रम है। ये सब स्थायर तमप्राय " विशिष्ट विश्वको (इस विश्वरूपो आमाको कालमें। (अध्यक्त चैतन्य ) हैं अर्थात् ये चैतन्य रह कर भी अध्यक्त" स्थूलरूप और पृथगभावसे प्रकाशित किया। प्रत हैं गौर ये अन्तास्पर्श ( अन्तरमें इनको स्पर्शका शान है।' और मतभाषसे साधारणतः विश्व नी तरहसे सृष्टा 1. किन्तु 'वाहर नहीं ) हैं. अपने आहार-द्रष्यको (रस)' कर उनमें प्राकृत छः प्रकार और कृतीन प्रकारात मूलसे ऊर्ध्वदेशमै आकर्षित करनेको इनमें शक्ति है। .. छा प्रकार यहा है- इससे ये 'ऊदयस्रोता:' कहलाते हैं। , . , . . (१). महत् महत): यह यात्माके गुणसे वैपाय (२) तियेकमाणी ( पशु, पक्षी, ज्यालादि) हैं। ये ५. मात्र है)...: . . ...:.:.. अपिदै (स्मृतिहीन अतीत घटनादि जिम्मान्य .