पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


वाणिज्य ६४). चाय लाह ८४) ८१) इसी तरह मन्यान्य मालों पर भी कर लगाया गया | मालको रफ्तनो उत्तरोत्तर कम होने लगो। निमलिखित - था। नीचेको फिहरिस्त देख कर आपकी आँखें खुल फिहरिस्तसे मालूम हो जायेगा, कि देशी शिल्पको भय मकती हैं। नतिका घेग किस नरह प्रबल हो उठा था। . . .' घृतकुमारी (धीकयार) सैकड़े ७०) से २८०) चिलायतमें जानेवाले भारतीय मालका हिसाव इस हींग २३३) , ६२२ पलाच १५०) , २६६)/ सई १८१८६० . १२ १२४ गांउ ! , काफी १०५) . ३७३) १८२८, . . ४१२५, मिर्च काली २६६) कपड़ा ५८०२ ॥ १४८१७ ॥ चीनी १८२६, ४३३ , ६), १००) • १८२४ ॥ १७६०७ मन कम्बल ८818) १८२६ ,, ८२५१ ॥ चटाई ____अन्यान्य मालोंको कमी होने पर भी नील और रेशम , मसलिन ३२) की रफतनी इस समय बढ़ने लगी थी। उसीफे साथ. केलियो ८१) साथ गुरुतर शुलकके लिये विलायतमें रेशमी वस्त्रको कपास प्रतिमन प्रतिपत्ति बहुत कम होने लगी। सूती कपड़ा सैकड़े ___ सन् १८१३६० तक एकमात्र ईष्टइण्डिया कम्पनी । लाह ८१) हो भारतमें माल आमदनी और रफ्तनी किया करतो रेशम २) ४) सेर थी। इसी सालसे इग्लेण्डके सभी वणि भारतीय । ___ इसके बाद रेशमी वस्त्रकी आमदनी लण्डन कतई प्यवसायको, हाधमें करने पर उद्यत , ए और फमसे यन्द कर दी गई । यदि कोई यह आमदनी करता था. तब वाजार पर अधिकार कर बैठे। मतपय भारतका बाजार . अफमर उस मालको बाजारमें आने नहीं देते थे। तुरन्त विलायती मालसे.भर',उठा । ..सन् १८२६ ई०में कुल ... ही यह माल जहाज पर चढ़ा कर भारत लौटा दिया | जाता था। प्रायः ६५ लाख पाउण्ड या साढ़े छः करोड़ रुपयेका । इधर कम्पनीकी कोठीमें देशी शिल्री बलपूर्वक | माल भारतमें भाया था । भारतीय शिलंगविज्ञानको पकड़ कर या पेशगो दे कर काम करने पर वाध्य किये | नष्ट करने के लिये कम्पनी पूर्वोक्तं उपार्योका अवलम्बन जाने लगे। फलतः देशी कारखानों को नुकसान होने कर ही शान्त न हुई, घरं उसने भारतमें देशी शिक्षा पर' लगा। उस पर देशो माल पर उल्लिखित ऊंचा कर कड़ा कर पैठा दिया था । लाई घेएिटकके जमाने में लगानेसे यहांका शिल्पयाणिज्य क्रमशः लुप्त हो गया। चिलायती कपड़ा भारतमें सेफड़े २॥) पर दे फर बेचा. इस तरह कौशलसे भारतीय शिलाका विनाश साधन | जाता था; किन्तु इम भारतमें यदि भारतीय अपने किया गया और युरोपीय यणिक राजशक्ति प्रभावसे इम पहनने के लिये कपड़े तय्यार करें तो उन्हें सैकडे १७॥) . देशमें विलायती मालकी आमदनी करने लगे। सन् रुपये कर देना पड़ता था। चमडे को धनी देशो यस्तुओं १७६४ ई०में जिस भारतमें १५६ पौएडसे अधिक पिला- पर अफसर १५) फी सदी फर घंसूल करते थे। देशी यती सूतो कपड़े की भागदनी नहीं हुई थी, सन् १८०१ चीनी पर विलायती चीनीकी अपेक्षा ५) अधिक कर देना ई०में उसो भारतमें १ लाख २८ हजार चार मौसे धधिक पड़ता था। इस तरह भारतफे २३५ तरहको विभिन्न पौण्डका कपड़ा आया था। उस समयसे फ्रमशः भारत. वस्तुओं पर , अन्तर्वाणिज्यविषयक कर (Inland घमें विलायती मालकी आमदनीकी अधिकता होने duties ) यैठाया गया था। प्रायः ६० वर्ष तक इस तरह लंगी। किन्तु पिलागत और अन्यान्य देशों में भारतीय चे दरसे कर प्रदान करने पर वाध्य किये जानेस' .