पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७१२

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के पुन । विश्यमनुस्-विश्वराघस्: १.व्याप्तमना, अत्यन्त मनखो...२ सभी वरावर पदार्था । तुम पुष्करतीर्थ में जा कर पोत्सर्ग करके अपने घर एकामना। . | लौटो। इससे तुम्हारे समो दुष्कृत नष्ट होंगे औt विश्वमनुस, (स.पु.) सभी.मनुष्य (क.६४६१५) महापुण्यका उदय होगा। तदनुसार विश्यम्भरने कार्तिक विश्वमय (स.नि.) विश्व स्वरूपा) मयर : विश्व मासमें पुष्कर जा कर लोमशर्णित विधियत् यह समाप्त स्वरूप, समय, सर्वस्वरूप। .. किया। इसके बाद इन्होंने लोमशके साथ नाना तीर्थों में: विश्यमल-बघेला वंशीय पफ राजपूत सरदार, योर धयल- . परिभ्रमण किया और अशेष- पुण्य सञ्चय कर सुखसे जोयन विताया था। इस पुण्यफे फरसे दूसरे जन्ममें विश्वमहस. ( स० लि०) विश्वं व्याप्त महस्तेजो यम्प। इनका धोरसेन राजकुल जन्मा हुमा और घे वीरपञ्चा. . प्याप्ततेजस्क, जिसका तेज चारों ओर फैला हो। : नत नामसे प्रसिद्ध हुए। (गगढ़ उत्तर० ७।४८-२२५) · (मृक् १०६२) विश्वम्भरक (स० पु०) विश्वम्भर स्वार्थे कन् । विश्यम्भर। विश्यमहेश्यर ( स० पु०) शिव, महादेव। . विश्यम्भरपुर-भोजराजका एक नगर। ... विश्यमातु ( स० स्त्री०) विश्वस्य माता। विश्वको (भविष्यव०ख०.३०८६). माता, विश्वजननी, दुर्गा। . . विश्वम्भर पिलोपाध्याय--एक कयि। कपीन्द्र चन्द्रो.', घिश्चमानुष (सं० पु०) विश्वं सनः मानुपा । सभी मनुष्य । यमै इनके रचित श्लोकादिका परिचय है, . (ऋक् ८४६४२)/ विश्वम्भरा ( स० सी०. ) विश्वम्भर-टाप् । पृथियो, विश्वामित्र (म.पु.)माणवक । (पा६३१३०) । विश्वभरणके कारण पृथियोका नाम विश्वम्भरा विश्वमिन्ध (सनि०) विश्वव्यापक । (ऋफ ११६१४) हुआ है। . विश्वमुखी (सांखो०) दाक्षायणी। । विश्वम्भराभुज ( स० पु०) विश्यम्भरां पृथियों भुनक्ति विश्वमूत्ति (स० पु०) विश्वमेय मूर्तिस्य । विश्व- भुज-फिप् । पृथिवीभोगकारी, पृथिवीपति, राजा । रूप, भगवान् विष्ण। . (राजवरङ्गिणी साRIER.). विश्यमेजय (स. पु०.) विश्यफे सभी शन मोसे, कम्प- विश्वम्भरेश्वर-हिमालयस्थ शिलिङ्गभेद । यिता । (मक् ॥३५।२). . .. (हिमवत् ८।१०६) विश्वमोहन ( स० वि०) विश्वं मोहयतीति विश्व-मुह- विश्वम्भरोपनिषद्-उपनिपभेद। . .. णिच्-त्यु । विश्वमोहनकारी, विष्णु। विश्वयशस् (स० पु०.) पिमेद । (पा ६।२।१०६.) विश्वम्भर ( स० पु०) विश्न विभीति म (संशयां महः | विश्वयु ( स० पु०) वायु । ( शन्दा ०.) . . . बजीति । पा ३२१४६ ) इति मुम्, ( भविषदिति । पा विध्ययोनि (सपु० स्त्री०) विश्वस्य योनि । १ विश्वकी ६४।६७) इति मुम् । विष्णु, परमेश्वर ।, विष्णु समस्त | | योनि अर्थात् कारण, वह जिससे समस्त विश्व उत्पन्न विश्वका भरणा करते है, इसासे धै विश्वम्भर' कहलाते है। हुआहै। . २ ब्रह्मा.।। , विश्वम्भर-राजभेद । ( ऐतरेयना० १२६ ) २ मानन्द विश्यरथ (स० पु०) १ गाधिराजके पुत्रभेद । ( हरिवंश ), लहरीशकाके प्रणेता। । २ सह्यादिवणित एक राजा ।.. .... ३ गाईपुराणयणित वैश्यभेद। देवद्विजफे प्रति विश्वरद (स.पु० ) मग वा भोजक ब्राह्मणों का एक घेदः . इनको बड़ी मक्ति रहती थी। एक दिन यमदएडके शास्त्र। इसे वे लोग अपना घेद मानता.थे। यह भयसे पे अपनी खी सत्यमेधाको ले कर तो यात्राको भारतीय आर्योके चेदोंका धिराधी थr ( Vispernd.) निकले। राहमें लोमश पिसे इनकी भेट हो गई। विश्वराज ( स० पु० )सर्याधिपति, विश्वराज देखो।:: , लोमशने इनसे कहा, 'तुम जितने पुण्यकर्म कर चुके हो, | विश्वराघस् ( स० वि० ) १ सश्यासम्पन्न, प्रभूत ये सभी एक वृपोत्सर्गके विना निष्फल है. मतपय : धनशील। (अथवं वा१1१३.सायण))... ।