पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७२३

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विश्वविद्वस-विश्वसन ६३५ ' विद्यालयोंक पुस्तक निर्वाचन और शिक्षाप्रणाली कुछ | विश्ववृत्ति ( स० स्त्रो०) साधारण ज्ञान, पयिक ज्ञान । मंशमें इङ्गलैण्डको आफ्सफोर्ड, केम्ब्रिज और स्कार- | विश्ववेद (स. पु०) आचार्य भेद । लैण्डक पहिनयराकी युनिवर्सिटियोंके अनुरूप है। विश्ववेद-ब्रह्मसूत्रभाष्यको ध्याख्या और सिद्धांतदीप ___ सन १९०६-७ ई०में भारसके राजप्रतिनिधि लाई | नामक संक्षेपशारीरकष्याख्या प्रणेता। पेमानन्दयेदः 'फर्जनने भारतीय शिक्षाविभागके संस्कारके लिये नई / शिष्य थे। विधि प्रवर्तन कर विश्वविद्यालयके इतिहासमें नये | विश्ववेदम (स त्रि०) विश्य वेत्ति विश्व-विद्-असुन् । युगको अवतारणा की है। शिक्षाविभागको उन्नतिका १ सर्वक्ष । २ इन्द्रादि देवता। ३ सर्वधन, सर्व ऐश्व- साधन ही इस विधिका मूल उद्देश है। किंतु इसको | यसम्पन्न । (ऋक् १११३६३) भित्ति बड़ी हो माइन्वरपूर्ण है। पहले जिस तरह | विश्ववेदिन ( स०नि०) १ सश। (.)२ खनित फम बर्गम विश्वविद्यालयका कार्य सम्पादित होता | राजफै मन्त्री। 'था, अब उस तरह कम खर्नामे कालेजोंके परिचालनका | विश्वव्यचस ( स० वि० ) १ विश्वव्याप्त, साध्यापी १२ उपाय नहीं रहा। प्रति कालेजमें एक बहुत बड़ी Labo- | सनत्रग, सर्गगामी। (शुक्लयजुः १८४१ महीधर ) (पु.) ratory रखना और वर्तमान प्रणाली अनुसार बहु-! ३ सूर्य । (शुक्लयजुः १३५६ मही.) तेरे अध्यापकोंको नियुक्ति बहुत ही व्ययसाध्य है। विश्वव्यापी ( स० पु०) १ईश्वर । (नि.)२ओ सारे ___ भारतको उक्त युनिवर्सिरियोंके सिवा कुछ दिनोंके विश्वमै ध्याप्त हो। भोत्तर और कितनो, हो युनिवर्सिटियां स्थापित हुई हैं। विश्वशम्भ (स.नि.) विश्वका मङ्गलयिधायक, संसा. जैसे,यङ्गालक ढाका नगरमें एक विश्वविद्यालय, रकी भलाई करनेवाला। पटनेमें पटना विश्वविद्यालय, युक्तप्रदेशमें हिंदू विश्वशम्भूमुनि-पकाक्षरनाममालिका नानी एक क्षद्र युनिवसिटी, अलीगढ़मे' मुसलिम युनिवर्सिटी, अभिधानके प्रणेता। अभिधानचिन्तामणिमें इनका आमा 'युनिवर्सिटो, लखनऊ युनियर्सिटो, मैसूर | उल्लेख है। युनिवर्सिटी, हैदरावादमें इस्लामिया युनिवर्सिटी, विश्वशस ( स० त्रि०) १ व्याप्तवल, विक्षिप्ततेजा। नागपुर युनिवर्सिटी, इनमें हिन्दू विश्वविद्यालयका | २ उत्साहयुक्त, उत्साही। नाम विशेष उल्लेखनीय है। | विश्वशर्मन्-प्रबोधचन्द्रिका नामक ध्याकरणके प्रणेता। इसका विशेष विवरण हिन्दू विश्वविद्यालयमें देखो। विश्वशारद (स. त्रि०) प्रति शरतकाल विहित । विश्वविद्वस (स० पु०) सर्वश, ईश्वर ।' . । विश्वशुच ( स० त्रि.) विश्वदापक, संसारोद्दीपक। विश्वविधात (स० वि०) विश्वस्रष्टा, सृष्टिकर्ता । . ( फ ७४१३१) विश्वविधायिन् ( स० पु०) विश्वविधाता । विश्यश्चन्द्र (स' नि०) विश्यका माहलादजनक, जिससे विश्वविमावन (सं० पु०) १ यिभ्यपालन, संसारका सभीको हर्ग हो। (ऋक ३।३१।१६) प्रतिपालन । ( भागवत ४।८।२०) २ विश्वपालक, जगत- विश्वश्रद्धाहानबल ( स० लो०) युद्धको दश शक्तियमिसे के पिता। रक्ताल्पजात प्रमाके एक मानस पुत्रका | एक शक्ति। नाम (लिमपु० १२२६) विश्वधया (स.पु.) एक मुनि जो कुयेर भीर रायण विश्वविश्रुत (स.नि.) जगद्विख्यात ।' आदिके पिता थे। विश्वविज (स.नि.) विष्णुका नामान्तर । विश्वसयनन ( संक्की.) ऐन्द्रजालिक शक्तिके वलस विश्वघिसारिन (स.नि.) विश्वश्याप्त,'जंगत्प्रसारी। मोहाभिभूत करना। विश्ववीय ( स० को०) विश्वका कुर स्वरूप, ईश्वर। विश्वसख ( स० पु०) विश्वेषां मना जगबन्धु, जगतका विश्वक्ष ( स० पु०) विष्णुफा नामान्तर ।" | सखा, विश्वका हितकारी।