पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७२४

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६३६ विश्वसत्तम-विश्वहा विश्वसत्तम (स लि०) विश्वेषामयमतिशपेन साधुः | विश्वसुविद् (सं० त्रि०) सर्व ऐश्वयिशिए, खूब धनवान् । इति विश्व-सत्-तम । १ संसार या सोंके मध्य अत्यन्त | विश्वसू (स'. त्रि०) विश्वप्रसू, ईश्वर । साधु। (पु० ) २ श्रीकृष्ण ! ( महाभारत ) विश्वसूत्रधृक् (सं० पु. ) विष्णु। विश्वसन (स' को०) १ विश्वास, पतवार । २ मुनियोंको | विश्वस (स० पु० ) ईश्वर। , विश्रामभूमि, वह स्थान जहां ऋषि मुनि विश्राम करते विश्वराज (सपु०) विश्व सृजतीति विश्व-एज-किप। १ ग्रहा। (त्रि०)२ विश्वस्रष्टा, जगदीश्वर। विश्वसनीय ( स० वि० ) विश्वसितष्य, विश्वास्य, विश्वष्टि ( स० सी०) जगदुत्पत्ति, स'सारको सृष्टि । विश्वास करनेके योग्य, जिसका एतवार किया जा | | विश्वसेन (स.पु.) अष्टादश मुहर्राभेद ।। सके। विश्वसेनरोज ( स० पु०) अवसर्पिणो शाखाके १६३' विश्वसम्भव ( स० त्रि.) विश्वस्य सम्भव उत्पत्तिय | अहत्के पिता। (हेम ) स्मात् । ईश्वर, महापुरुप । (इरिव'श) विश्वसौभग (स०नि०) सर्व ऐश्वर्याशाली, सौभाग्य विश्पसह ( स० पु०) १ सूर्णव शीव राजा ऐडविड़के | सम्पन्न । (ऋक ११४२।६) पुत्र । २ व्युपिताश्वका एक पुत्र । ( १८।२४) विश्वस्त (स० नि०) विश्वस-क्त जातविश्वास, जिसका. विश्वसहा ( स० स्त्री० ) अग्निको सात जिलामोमेसे | विश्वास किया जाय । एक जिहाका नाम । ( जराघर) विश्वस्ता (स. स्त्री०) विधवा। (अमर) विश्वसहाय (स' त्रि०) विश्वदेवा । विश्यस्था ( स० स्त्री०) विश्वतः सर्वतस्तिष्ठतीति विश्व विश्वसाक्षी (स.नि. ) सर्गदशी, ईश्वर । स्था क स्त्रियां टाप् । शतावरी, शतावर। विश्वसामन ( स० पु.) १ एक वैदिक ऋपिका नाम जो विश्वस्पश (सपु०) ईश्वर, महापुरुष। (हरियश) ' मात्र य गोत्रके थे और जो ५।२२।१ वैदिक मत्रोंके द्रष्टा | विश्वस्फटिक (सपु० ) मगधराजके पुत्रमेद।.. थे। २ समस्त सामरूप। (शक्लयजुः १८१३६ वेददीप) (विष्णूपु०) विश्वसार ( स० पु० ) विश्वेषां सारम् । १ तंत्रभेद । विश्वस्फारि-विश्वस्फटिकका नामान्तर। . २ क्षत्रौजसके पुत्रभेद। . . (विष्णुपुराण) विश्वसारक (स' क्ली०) विदर वृक्ष, कंकारी पृक्ष। । विश्वफाणि-विश्वस्फाटि देखो। विश्वसारतन्त्र--एक प्राचीन तन्न। तसार और विश्वस्फाणि-विश्वस्फरिक देखो। शक्तिरत्नाकर में इनका उल्लेख है। विश्वस्फुर्जि (सं० पु०) स्वनामख्यात मगधराज । इन्होंने पीछे विश्वसाह ( स०पु०) महसतके एक पुत्र का नाम । । पुरञ्जय नामसे प्रसिद्ध हो ब्राह्मणादि जातियोंको म्लेच्छ ., (भागवत ६।१२।७) । बतलाया था, जिससे वे पुलिन्द, मद्रक मादि हीन जाति- विश्यसिंह (स० पु०.) राजपुत्रभेद। .. यो गिने गये थे। ( भागवत १२॥१॥३४) शायद ये विश्वसिंह-कुचविहारराजके एक प्रसिद्ध राजा । इन्दोंने ही विष्णुपुराण-वर्णित विश्वस्फटिक वा विश्वस्फूर्ति गासाम देशमें कुछ निष्ठावान् ब्राह्मणों को ले जा कर - आदि नामधेय राजा है। . . . . . यसाया था तथा उन्हें यथोपयुक्त भूमि दी थी। . विश्वस्थामो-आपस्तम्बादि कथितसूत्र के एक भाष्यकार। ____ कामरूप देखो! पुरुषोत्तमने स्वकृत गोलावरमारी प्रथमें इनका, मत । विश्वसित (सत्रि०) विश्वसत । विश्वस्त, विश्वास | उद्धत किया है। करनेके योग्य । (नेपघ १।१३१). .... विश्वह (स अध्या) प्रत्यह,.रोज रोज। . विश्वसितष्य (.सं. नि०) विश्वसनीय, विश्वास करनेके | ..: (ऋक १।११।३.) । योग्य। .. .:. विश्वहा (सं० मध्य०) विभ्वा देखो। . .....