पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७२५

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. विश्वहर्त-विश्वामित्र ६३७ विश्वहन (स.लि.) सर्वस्यापहारी । (पु०)२ विश्वादि ( स० पु. ) (कपायपिशेष । सोह, सुगंधवाला, शिय। क्षेत्रपर्पटी, धोरणमूल, मोथा और रकचन्दन कुल मिला विश्वहेतु (स.पु.) १ जगत् कारण, जगत्का निदान कर २ तोला, इसे शिला पर पोसे और 5 सेर जलमें या आदिकारण। २ मभी विषयों के निमित्त या हेतु । सिद्ध करे। जब ऽ१ सेर जल रह जाय, तब उतार ले । ३ विष्णु। ठंडा होने पर वारीक कपड़े में छान डाले। तृष्णा, विभ्या (म' रसो०) विश्-फन स्त्रियां टाप। १ अतिविषा, | दाह और यमि संयुक्त ज्यरमें जलकी तौर पर थोडा मतीस। २ शतावरो, शतावर । ३ पिपुल, पीपर । ४ थोड़ा कर पीनेसे तृष्णादिको निवृत्ति हो ज्वर उतर शुण्ठो, मोठ। ५ शहिनो, चोरपुष्पो । ६ दक्षको एक आता है। इस काधका नाम है विश्वादि पाचन या कन्या जो धर्मको व्याही धो और जिससे घसु, सत्य, कपाय। अन्तु आदि दश पुत्र उत्पान हुए थे। (महाभारत १६५।१२) विश्याधायस् ( स० पु०) विश्वं दधाति पालयति धा- • ७ ' एकमान जो २० पलका होता है। णिच बासुन् पर्योदोर्मः। देवता। (सिद्धान्तकौ० ) विश्वास (स.नि.) महापुरुषः ईश्वर। | यिश्याधार ( स० पु०) जगदाधार, ब्राह्माण्ड, स्त्रप्टा, विभ्वार ( नि.) सर्वाङ्ग सम्पूर्णाङ्ग। विधातो। ___-(भय० १२।३।१०) । यिभ्याना (स' त्रि०) सर्याङ्गसम्बन्धी । (मपर्य ०६८) विश्वाधिष (सपु०) जगत्पति, विश्वपति, परमेश्वर । विश्वाचार्य-निम्बार्श सम्प्रदायके द्वितीय गुरु, श्रीनिया- (श्वेताश्वतरोप० ३।४) सानार्गफे शिष्य और पुरुषोत्तमाघार्गफे गुरु । विश्वाधिष्ठान अन्नपूर्णोपनिषद्भाष्यके प्रणेता। विश्याचो ( स० सी० ) विश्वाञ्चति अनुच् कि नियां विश्यानन्दनाथ-कौलदर्शन और कौलाचारफे रचयिता । डीप । १ भमरोविशेष। (शुक्लयजुः १५।१८) पहिपुराण | विश्वानर-वल्लभाचार्याका नामान्तर । वानर 'गणमेद नामाध्याय) २ पाहुरोग विशेष। इसमें यायो । विश्वानर ( स०पू०) १ अग्निजनक विप्रभेद । • घिगड़नेसे वाहुके ऊपर उगलियों तक सारा हाथ न तो शाद देखो। २ सयों के नेता। (ऋ ७६१) फैलाया जा सकता और न सिकोड़ा जा सकता है। विश्वान्तर (स.पु.) राजमेद। चिकित्सा-पहले यधोक्त विधानसे शिराष्पाध (कथासरित्सा० ११३।६ ) । कर पीछे यातय्याघि विहित मौपधादिका प्रयोग करना विश्वायुष् विश्यायुप् ( स०नि०) विश्यपोपक धन । • होता है। विल्यमूल, सोनाछाल, गाम्भारो, पढार, (ऋक् ११६२२) गनियारी, शालपान, पिठवन, वृहती, कण्टकारी, गोक्ष। | विश्वापसु ( स० वि०) देवताओंका माह्वानकारी, नाना- - वीजयन और उड़द, इन सय द्रष्यों के पयाथका (सायं रुपी अग्नि । पार्शिय, वैधत, जाटरादिके भेदसे अग्नि- कालमें भोजनके बाद) नस्य लेनेसे विश्वाची और गय- के अनेकरूप हैं। (ऋक् १३१४८१) पाहुक रोग गाता रहता है। (वि.) ३ सहध्यापिनी। | विश्वाभू (सपु०) सबो के भावयिता इन्द्र । (भूक : १०११३६२) ४ सर्गनगामी। (फ ७४३३) | विश्वामित (स पु०) विश्वमेव मितमस्य । (मित्र विश्वाजिन (स.पु०) पिमेद । (पा ६२।१०६ वार्शिक), चो । पा ६६।१३०) इति विश्यस्याकारस्य दधिः । विश्वातीत (सं० वि०) विश्वफे असोत, भ्यर। एक ब्राह्मर्पि। पाय-गाधिज, विशकुयाजी, गाधेय, विश्वात्मक (स'..नि.). विश्वस्वरूप, विश्वमया । कौशिक, गाधिभ्। ( शब्दरत्नावली) विश्वात्मा (सं० पु०) विश्वमेघ मात्मा यस्य विश्वस्य विश्वामिलने क्षत्रियवंशमें जन्मप्रहण कर अपने • भारमा पा। १ विष्णु। २ महादेय । ३ प्रमा। योगवलसे ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था। पीछे ये सप्त ब्रह्म विभ्वाद (सं० वि० ) विश्वं सर्व' अतीति विश्व-अदु- महपियोम अन्यतम गिने जाने लगे। ऋग्वेदके तीसरे कि। सबभुक, अग्नि (ऋक् १०१६६) • मण्डलके समूचे सूतोंके मन्त्रोंके अभिव्यक महर्षि Vol XXI. 160