पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७२९

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विश्वामित्र चल क्षत्रिय-धलकी अपेक्षा अत्यन्त अधिक है। सुनरां। था-"धिक्यलम् क्षत्रियवलम्, ब्रह्म तेजो थलो बलम्, आप अप्रमेय वलसम्पन्न हैं। मापके यलको कोई भी एकेन ब्रह्मदण्डेन ...." क्षत्रिय बलको धिक्कार है ! ब्रह्मबल सहने में समर्थ नहीं हो सकता। आप मुझको नियुक्त ही यथार्थ वल है। जिस तपसे यह ब्रह्मवल लाभ किया कीजिये, मैं अभी इस दुरात्मा विश्वामित्रका दर्प चूर्ण जाता है, मैं वही तपस्या करूंगा। यह स्थिर कर करती हूँ। वसिष्ठने शबलाको इस ज्ञानगर्भ भरी वातों विश्वामित्र पत्नीके माथ दक्षिणको ओर जा कर कठोर को सुन कर माश्वस्त हृदयसे उमसे कहा, 'तुमपर ' तपस्या करनेमें प्रवृत्त हुए । इसी समय उनके तीन पुत्र सैन्धविनाशक सैन्यको सृष्टि करो।' शबला उनकी लाम हुए-हयिष्यन्द, मधुष्य'द और दृढ़नेन। यह बात सुन कर हत्या हा रय करने लगी। उसके इस तरह घोर तपस्या निरत रह कर जब उन्होंने इस रवसे सैकड़ों पहर सैन्योंको सृष्टि हुई। उन एक हजार वर्ष बिता दिया, तय सर्वलोकपितामह ब्रह्मा- सैन्यों के विश्वामित्रके साथ युद्ध में पराजित होने पर ने उनके समीप आ कर कहा,--विश्वामित्र ! तुमने जैसी पलाने हुङ्काररयसे कम्योज, स्तनदेशसे पर्षर, योनि- कठोर तपस्या को है, उससे तुम मेरे गरसे राजर्षि पद देशसे ययन और रोम पो से हारीत और किरात आदि। लाम करोगे। यह कह कर ब्रह्मा अपने लोकको चले म्लेच्छों की सृष्टि की। इन्होंने थोड़े ही समयमै विश्वा ! गये। विश्वामित ब्रह्माका यह वर सुन कर विशेष मित्रके हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैन्यका विनाश मर्माहत हुए और सोचने लगे, कि मेरे इस तपोऽनुष्ठानसे कर डाला। यसिष्ठ द्वारा बहुतेरे सैन्यों का विनाश कुछ भी फल नहीं हुआ। अब में जिससे ब्राह्मणत्व लाम होता देख विश्वामित्र एक सौ पुनों के साथ तरह तरहके कर सकू, ऐसी दुश्वर तपस्या करूगा । मन ही मन यह अस्त्र शस्त्र ले यसिष्ठके प्रति दौड़े। यह देख शवलाने , स्थिर कर फिर यत्नके साथ तपस्वा करने में लग गये। एक ही हुङ्कारमें उनको दग्ध कर डाला । इसी समय इक्ष्वाकुवंशीय राजा त्रिशडकु सशरीर इस तरह विश्वामित्रके सैन्य आदि विनष्ट हो जाने स्वर्ण जानेको कामनासे यज्ञ करनेके लिये वसिष्ठकी शरण- पर उन्होंने हतबल और हतोत्साह हो कर ममप्र धनु- में आये। वसिष्ठने उनको प्रत्याख्यान किया। पोछे वेद लाभ करनेके लिये हिमालपके पार्श्वदेशमें जा महा त्रिशङक उनके पुत्रोंके शरणार्थी हुए, किन्तु उन्होंने देवकी कठोर तपस्या करने लगे। महादेवने उनको | भो उनका प्रत्याख्यान किया। वरं उन्होंने त्रिशङकुको तपस्यासे संतुष्ट हो उनको समन मंत्र और रहस्यक त्राएडालप्राप्तिका शाप दे दिया। उनके शापसे त्रिशंकु माथ सङ्गोपाङ्ग धनुर्वेद प्रदान किया। चाण्डालत्व प्राप्त कर विश्वामित्रके पास गये। - विश्वामित्र महादेवसे समन धनुर्वेद लाभ कर अति विश्वामित्रने उनको ऐसी दशामें देख कहा,-'राजन् ! शय दर्पित हो कर वसिष्ठफे आश्रममें जा उन पर मैं दिव्यचक्षसे देख रहा हूं, कि आप अयोध्याके राजा कई तरह के प्रस्त्र छोड़ने लगे। इन पत्रोंसे तपेविन | निशडकु है। आप शापवश चाण्डाल हुए हैं। आप माना दग्ध होने लगा और पाश्रमके सभी चारों ओर अपनी अभिलाषा प्रकट कीजिये। मैं आपका श्रेयसाधन भागने पर उद्यत हुप । उस समय वसिष्ठने कालदण्डकी, करगा। उस समय चाण्डालरूपो विशड कुने हाथ तरह ब्रह्मदएड ले कर कहा, 'रेक्षनियाधम विश्वामिन ! जोड़ कर कहा-मेरी अभिलापा है, कि मैं ऐसा यह कर तू क्षत्रिय-वलसे प्रावलको पराजित करनेका अभिलापी, जिससे सशरीर स्वर्ग गमन कर सकू। गुरुदेय हुआ है। किंतु तू देव, इस एक ब्रह्मबलसे तेरा सारा वसिष्ठ और उनके पुत्रोंके पास गया था, किन्तु उन्होंने क्षत्रियवल नाश होगा। इसके बाद वसिष्ठके ग्रझदण्डक | मेरा प्रत्याख्यान किया और अभिशाप दिया है, उसीके प्रभावसे विश्वामित्रके महाघोर भत्र, जलद्वारा अग्निको| फलसे आज मैं इस अवस्था में परिणत हुआ हूं। भव प्रशान्तिको तरद क्षणमरमें हो सम्पूर्णतः निराकृत हुए। मैं आपकी शरणमें आया है। माप मेरी अभिलापा इस तरह निगृहीत हो विश्वामित्रने यसिष्ठसे कहा| पूर्ण कीजिये।' Vol. xxI 161