पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७३०

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६४३ विश्वामित्र : • विश्वामिलने जब त्रिशर कुके लिये यहानुष्ठान किया। इस समय राजा अम्बरोपने एक यश अनुष्ठान किया। तव वसिष्ठ के पुत्रोंने उन पर दोषारोप किया। पोछे। इन्द्रने यज्ञके पशुका अपहरण कर लिया। यक्षपशु अप. जब यह वात विश्वामित्रको मालूम हुई, तय उन्हों ने हत होने पर अम्बरीपने पशुफे बदले नर-दलि देना निश्चय वसिष्टके पुत्रों को यह शाप दिया, कि जब विना दोपके कर जब ऋचीकके पुत्र शुनाशेरुका खरीद कर ले जाये, मुझ पर उन्हों ने दोषारोप किया है, तब थोड़े ही दिनमें तष इस पर वह विश्वामित्रकी शरण में गयो । विश्वा. वे सब मृत्युमुखमें पतित हो और परजन्ममें कुत्ते का मितने इसको प्राण-रक्षा के लिये मधुच्छन्दा प्रभृति अपने मांस पानेवाले तथा मुटेंके वस्त्र भाहरण करनेवाले | पुत्रों से कहा, कि तुम लोग सभी धर्मपरायण हो । चाण्डाल (डोम ) हो। विश्वामित्रके इस शापसे यह मुनि-पुत मेरो शरणमें, भाया है, अत: तुम लोग वसिष्ठके पुत्रों ने उक्त प्रकारको दुर्गति पाई। इसके प्राण वा कर मेरा प्रिय कार्य फ।। तुममें कोई इधर राजा त्रिशङ कुने विश्वामित्रफे यशफलसे स्वयं इस नर-वलिके लिये तैय्यार हो जामा जिससे उस- स्वर्गारोहण किया। किन्तु इन्द्रने, वर्गसे उनको गिरा का यक्ष पूरा हो योर इस मुनियालककी प्राणरक्षा हो। दिया। इस पर क्रोधसे वे अधीर हो उठे मोर विश्वा. ____पुत्रों ने पिताको ऐसी बात सुन कर कहा, कि माने मिलने दूसरे स्वर्गको सृष्टिको अभिलापा कर दूसरे सप्तर्षि पुत्रों को परित्याग कर परायेकी रक्षा करने में प्रवृत्त हुए है, मण्डल, सत्ताईस नक्षत्र आदिको सृष्टि की। विशङफु। यह अत्यन्त शन्याय और विगदित काणे है । विश्वामित्र उसी स्थानमें आज तक वास करते हैं। ने पुत्रों की ऐसी बात सुन फ्रोधित हो शाप दिया, कि विश, शब्दमें विशेष विवरण देखो। तुम लोग भी यसिष्ठपुत्रो'को तरह सोम हो। । पोछे विश्वामित्रने देखा कि, इच्छानुसार तपोऽनु- ऐतरेयवाह्मणसे . मालूम होता है, कि विश्वामित्र के छान हो नहीं रहा है और तपमें विघ्न हो रहा है, तो एक सौ पुत्र थे। उन्होंने अपने भांजा शुनाशेफको दक्षिणसे चले जाये। इसके बाद पश्चिमकी ओर पुष्कर ज्येष्ठ पुत्रका स्थान देनेको गर्जसे अपने सप पुत्रों की. तोरवत्ता विशाल तपोवन में प्रा शीघ्र ही ब्राह्मणत्य प्राप्ति मभिमति मांगी। इस पर छोटे पचास. पुोंने उनके के लिये विश्वामित्र दुश्चर तपस्या करने लगे। गनुकूल सम्मति दी । इस पर प्रसन्न हो कर उन्होंने उन पुलोको वर दिया कि "तुम गाय और सतान सन्ततिसे भरे पूरे रहो।" किन्तु अन्तिम ५० पुत्रों को

  • मनु १०।१०८ विश्वामित्र द्वारा चारहालके हाथसे कुत्ते - अनुकूल सम्मति न पानेसे फुद्ध हो शाप दिया, कि

की जंघा भक्षणका प्रस्ताव दिखाई देता है। महाभारतके शान्ति "नम लोगोंका वंशज पृथ्वीके दक्षिणांशमें जा कर बसे । पर्वमें भी इस घटनाका उपलेख दिखाई देता है । किन्तु विष्णु- इसके अनुसार उनके सन्तान अन्त्यज और डाकूके रूप पुराण ४१३१३.१४से मास्तूम किया जा सकता है, कि द्वादश में गिने गये। घे ही अन्ध, पुण्ड, शयर, पुलिन्द और वर्षीय अनावृष्टिमें विश्वामित्र कुक्कुर भक्षया करेंगे। इस भाशका. मृतिय कहलाते हैं। (ऐत्तरेयना० ७१८) से चायडालरूपी त्रिशंक ने उनके और उनके परिवारों के लिये | . इसके बाद शरणागत शुनाशेफसे विश्वामित्र ने कहा, गन्नातीरके न्यसाध वृक्षको शाखामें मृग मास लटका रखा। कि अम्बरीपर्क यश वलि देने के लिये जब तुम्हारे गलेमें उसी मांससे परितृप्त हो कर विश्वामित्रने राजाको स्वर्गमें स्थापित | रक्तमाल पहनाया जाये गौर तुम्हारी घेह रक्तानुलेपित' किया था। देवीभागवत ७.१३ अध्यायके अनुसार विश्वामित्र कर धैष्णव-यूपमें पाशवन्धन कर दी जाय, तय तुम दुर्भिक्षके समय जब चापडालके घर भ्वमांस भक्षणके लिये गये, || भाग्नेय मनसे अग्निका स्तव तथा यह दिव्यगाथा गान तब उनकी पत्नी और पुत्रोंने राजर्षि सत्यमत रक्षित, मृग वराह करना । इससे तुम्हें सिद्धि मिलेगी। शुनःशेफने भादिका मांस भक्षण कर जीवनरक्षा की थी। उसी कृतशतासे यथासमय धैसा हो अनुष्ठान किया । अग्निके प्रसादसे विश्वामित्रने राजाके उद्धारका उपाय किया था! ........: उनकी दोर्घायुप्राप्ति और राजाको भी यक्षसमाप्ति हुई।